Monday, 7 July 2014

जाने कब समझेंगे हम…!


बात उस समय कि है जब इंसान अपनी निजी एवं अहम जरूरतों के लिए सरकार और प्रशासन पर निर्भर नहीं था। खासकर पानी जैसी अहम जरूरत के लिए तो ज़रा भी नहीं। उस वक्त शायद ही किसी ने यह सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा जब पानी भी बेचा और खरीदा जायेगा। हाँ यह बात अलग है कि तब जमींदारों की हुकूमत हुआ करती थी। निम्नवर्ग का जीना तब भी मुहाल था और आज भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि तब जमींदार गरीबों को लूटा करते थे। आज यह काम सरकार और प्रशासन कर रहे हैं। रही सही कसर बैंक वाले पूरी कर रहे हैं। तो कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि तब से आज तक गरीब किसान की किस्मत में सदा पिसना ही लिखा है। आगे पढ़ने के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें ...
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Tuesday, 1 July 2014

पागल होना,शायद सामान्य होने से ज्यादा बेहतर है...!

यूं तो एक पागल व्यक्ति लोगों के लिए मनोरंजन का साधन मात्र ही होता है। लोग आते हैं उस पागल व्यक्ति के व्यवहार को देखते है। उस पर हँसते और उसका परिहास बनकर अपने-अपने रास्ते निकल जाते है। इस असंवेदनशील समाज से और उम्मीद भी क्या की जा सकती है। कभी-कभी सोचती हूँ तो लगता है कैसा होता होगा पागल होना। क्या महसूस करता होगा कोई पागल। भले ही कोई पागल हो किन्तु उसका दिमाग तो फिर भी काम करता ही है। क्या सोचता होगा वह इंसान जिसे दुनिया की नज़रों में पागल घोषित कर दिया गया हो।

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