Wednesday, 2 November 2011

दीया और बाती हम



“तारे हैं बराती

चाँदनी है, यह बारात

सातों फेरे होंगे अब हाथों में लेकर हाथ

जीवन साथी हम, दिया और बाती हम”


जाने क्यूँ आज सुबह से ही यह गीत मेरी ज़ुबान पर चढ़ा हुआ था और में बस यही गुनगुनाए जा रही थी। तब मन में यूंहीं एक ख्याल आया कि क्यूँ ना इस पर भी एक पोस्ट लिखी जाये सो लिख डाली।Jजैसा कि इस पोस्ट के शीर्षक से ही पता चल रहा है कि यह मेरी पोस्ट का नाम होने के साथ-साथ एक टीवी सिरियल का नाम भी है। पिछले दिनों टीवी पर आने वाले दो कार्यक्रम काफी चर्चा में रहे एक “कौन बनेगा करोड़ पति” और दूजा “बड़े अच्छे लगते है”। वैसे देखा जाये तो यह दोनों यानी मेरी पोस्ट का शीर्षक“दीया और बाती हम” और “बड़े अच्छे लगते हैं” यह दोनों ही कार्यक्रमों के नाम हिन्दी फ़िल्म के गीतों पर आधारित है। खैर इस सप्ताह के अंत में इस बार में कहीं भी बहार नहीं गई। यहाँ तक बाज़ार भी नहीं, जब की  यह हमारे हफ़्ते के अंतिम दो दिन का फिक्स प्रोग्राम होता है। मगर इस बार शायद मौसम में आये बदलाव के कारण इतनी ठंड बढ़ गई कि मेरा कहीं भी बाहर जाने का मन ही नहीं हुआ। तब मैंने घर में टाइम पास के लिए यह कार्यक्रम देखा जिसका नाम था "दिया और बाती हम" जो कि स्टार प्लस पर आता है, आप लोगों ने भी शायद देखा होगा।

इस प्रोग्राम के अंतर्गत यह दिखाने की कोशिश की गई है,कि यदि कोई पुरुष आपने परिवार के वीरुध जाकर अपनी पत्नी का आगे पढ़ने मे साथ देता है, ताकि वो अपनी पढ़ाई जारी रख सके और अपनी मन चाही  मंजिल को पासके, तो लोग उसे ना जाने क्यूँ इस मूहवारे से जोड़ने लगते है और उसे "जोरु का गुलाम" कहने लगते हैं। इस सीरियल ने मेरे मन के अंदर कई सवाल उठाये, कि आखिर ऐसा क्यूँ ? जब विवाह के वक्त दोनों पति-पत्नी एक दूसरे को जीवन के हर मोड़ पर साथ निभाने का वचन देते हैं और लेते है, फिर क्यूँ आम ज़िंदगी में आमतौर पर इस वचन का अधिकतर पालन करती केवल महिलायें ही नज़र आती हैं। बहुत कम ही यह वचन निभाते पुरुष नज़र आते है क्यूँ ?

आज तो "सदा जी" ने भी अपनी कविता में औरत को दूसरों के सुख में सुखी होने के भाव को बड़ी ही खूबसूरती के साथ उकेरा है, तो वहीं दूसरी और "प्रियंका जी" ने भी "गुड मॉर्निंग" कविता के माध्यम से औरत के दिन की शुरुवात को बड़े ही खूबसूरत अंदाज़ में प्रस्तुत किया। मगर बात यहाँ औरत या मर्द की नहीं है, बात है उस वचन की, उस वादे की, जो दो लोग विवाह के बंधन में बँधते वक्त एक दूसरे से करते है और जब निभाने की बारी है तो निभाती केवल स्त्री ही है, यदि कोई पुरुष अपने उस वचन को, उस वादे को निभाना भी चाहे, तो यह पुरुष प्रधान समाज उसे निभाने नहीं देता और "जोरु का गुलाम" कहकर उसका मज़ाक बना दिया जाता है क्यूँ ? 

"दीया और बाती" अर्थात एक के बिना दूसरा अधूरा है। यही तो है न मतलब शादी के बंधन का भी, फिर क्यूँ लोग यह भूल जाते है और बस अपना-अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं। मुझे तो ऐसा लगता है कि जब से नारी जागरुक हुई है और जबसे उसने अपने अस्तित्व की पहचान बनना शुरू की है, तब से यह दिया और बाती की भावनायेँ, तो जैसे मर ही गई हैं, यह रिश्तों में बढ़ती दूरियाँ, यह आये दिन होते तलाक, सभी में जैसे एक दम से व्रद्धि सी हो गई है। मगर इसका मतलब यह नहीं कि में कमकाजी महिलों के वीरुध हूँ, क्यूँकि में खुद एक ग्रहणी हूँ। मगर कहीं न कहीं दोनों ही ज़िम्मेदार है इन टूटते रिश्तों के लिए। पहला समाज, दूसरा पति-पत्नी, क्यूँकि ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती, और मुझे ऐसा लगता है कि आज कल कामकाजी महिलाओं के मन में अहम ने बहुत बड़ी जगह लेली है।

जिसके चलते रिश्तों में यह दूरियाँ आने लगी हैं। बेशक बहुत से लोग इस बात से सहमत नहीं होंगे। मैं जानती हूँ क्यूंकि सारी जिम्मेदारियाँ केवल औरत ही उठाय और हर वचन का पालन भी केवल औरत ही करे यह सही नहीं है। जहां औरत ने इस सबसे इंकार कर अपनी मर्जी कि बात कि वहीं से शुरुवात हो जाती है, परिवार के बिखरने कि कई बार यूं भी होता है कि इस सबके चलते "मैं"आत्मनिर्भर हूँ और अब मुझे किसी कि जरूरत नहीं वाला अहम से भरा भाव भी आज कल बड़ी आसानी से औरतों में देखने को मिलता है। हो सकता है कुछ लोग इस अहम को आत्मनिर्भरता का नाम दें, मगर मेरे हिसाब से दोनों दो अलग-अलग बातें हैं। बाकी तो जिसकी जैसी सोच होगी उसे वही सही लगेगा। यह अपनी-अपनी सोच और नज़रीय पर निर्भर करता है।
 
 "पसंद अपनी-अपनी ख्याल अपना -अपना"     

कभी गहराई से सोचती हूँ तो यह लगता है कि शायद बुज़ुर्गों ने ठीक ही कहा था, कि औरत में कुछ गुण होना स्वाभाविक है, तो कुछ का होना बेहद ज़रूर जैसे धरती के समान सहनशीलता और अंबर जितना बड़ा ह्रदय, क्यूँकि यह मर्द तो बहुत कमज़ोर होते हैं, जो अपने दिल के आस-पास उसूलों कि दीवार तो बना लेते हैं, मगर उन्हें निभा नहीं पाते। वो शायद यह भूल जाते हैं कि दिल के रिश्ते चुप रहने से नहीं, बल्कि दिल की बात कह देने से बनते है।

वाह क्या बात है, है ना J हाँ सच में यह संवाद ही है, मगर अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण सच्ची और गहरी बात लिए हुए है। इसलिए मैंने इसका प्रयोग यहाँ किया। कुल मिलकर सब कुछ कहने का मतलब यह है कि जब औरत कि दिन रात सेवा करने पर उसे पति का गुलाम नहीं समझा जाता, तो इसी प्रकार जब कोई पति आगे आकार किसी सही कार्य में अपनी पत्नी का सहयोग करना चाहे, तो उसे "जोरु का गुलाम" कहकर अपमानित नहीं करना चाहिए। बल्कि दूसरों को भी उससे सीख लेते हुए अपनी-अपनी पत्नियों का साथ देना और निभाना चाहिए तभी यह "दीया और बाती हम" वाली बात या "बड़े अच्छे लगते है" वाली बात को सही मायने मिल सकते है। J है ना !!!!!! जय हिन्द ......