Monday, 23 June 2014

बदलाव को अपनाना ‘आसान है या मुश्किल’

अजीब है यह दुनिया और इसके प्रपंच। कुछ चीजें ‘जस की तस’ चली आ रही हैं और कुछ इतनी बदल गई हैं कि उनके वजूद में उनसे जुड़ी उनकी पुरानी छाया का दूर-दूर तक कोई अता-पता नहीं होता। फिर भी कभी-कभी कुछ चीजों को देखकर लगता है कि अब बस बहुत हो गया। अब तो बदलाव आना ही चाहिए। नहीं? किन्तु जब बदलाव आता है तब भी जाने क्यूँ हम चाहकर भी उस बदलाव को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाते। इन दोनों स्थितियों में हमारा मन अशांत ही रहता है। ऐसा शायद इसलिए भी होता है क्योंकि बदलाव को देखते वक्त हमें उसमें खुद का दुःख (खेद) या हमारे साथ अतीत में हुई नाइंसाफ़ी नज़र आने लगती है। अतीत में अपने साथ हुए दुर्व्‍यवहार का हम बदलाव के साथ तालमेल नहीं बैठा पाते। ऐसे में अकसर न्याय भी हमें अन्याय लगने लगता है। नतीजा बदलाव में भी ईर्ष्‍या उत्‍पन्‍न हो जाती है और हम जहां-तहां खड़े बदलाव भूलकर लकीर ही पीटते रह जाते हैं।

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Wednesday, 11 June 2014

ज़िंदगी और मौत, दोनों एक साथ...


ज़िंदगी को क्या नाम दें यह समझ नहीं आता। लेकिन मौत भी तो किसी पहेली से कम नहीं होती। कभी-कभी कुछ ऐसे मंजर सामने आ जाते है, जो दिल और दिमाग पर अपनी एक छाप सी छोड़ जाते है। ऐसा ही एक मंजर मैंने भी देखा। यूं तो हर खत्म होने वाली ज़िंदगी  किसी नए जीवन की शुरुआत ही होती है। फिर चाहे वो पेड़ पौधे हों या इंसानों का जीवन। लेकिन फिर भी न जाने क्यूँ जब किसी इंसान की मौत होती है तब हमें आने वाली ज़िंदगी या हाल ही में जन्म ले चुकी नयी ज़िंदगी का खयाल ही नहीं आता। ऐसा शायद इसलिए होता होगा, क्योंकि जाने वाले इंसान से फिर कभी न मिल पाने का दुःख हम पर इतना हावी हो रहता है कि हम नयी ज़िंदगी के बारे में चाहकर भी उतनी गंभीरता से नहीं सोच पाते। दिवंगत आत्मा के परिवारजनों के लिए तो यह उस वक्त संभव ही नहीं होता। लेकिन यदि मैं अन्य परिजनों की बात करुँ तो शायद हर संवेदनशील इंसान के दिमाग में उस नयी ज़िंदगी का ख़्याल आता ही है। नहीं ? मैं जानती हूँ आज के असंवेदनशील समाज में यह बात बेमानी लगेगी। मगर इस बार मेरा अनुभव कुछ ऐसा ही रहा। 
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