Thursday, 15 October 2015

आखिर ऐसा क्यूँ होता है?

आखिर ऐसा क्यूँ होता है। आज हर कोई केवल अपनी बात कहना चाहता है किन्तु किसी दूसरे की कोई बात सुनना कोई नहीं चाहता। हर कोई ऐसा एक व्यक्ति चाहता है जो पूरे संयम और धेर्य के साथ आपकी पूरी बात सुने वह भी बिना कोई प्रतिक्रिया दिये। न सिर्फ सुने, बल्कि आपको समझने का भी प्रयास करे। मगर ऐसा कहाँ कोई मिलता है। लोग तो बात पूरी होने से पहले ही उस बात पर टीका टिप्पणी शुरू कर देते है। इतना ही नहीं बल्कि अपनी बात को ही सही साबित करने में लग जाते है। सुनना समझना और कहना तो दूर की बात है। ऐसे लोग अकसर कुतर्क ज्यादा करते है और तर्क कम। नहीं? फिर चाहे इस बहस में अहम मुद्दा ही कहीं लुप्त क्यूँ न हो जाये। इसे उन्हें कोई मतलब ही नहीं होता। 

ऐसा विचार मुझे इसलिए आया क्यूंकि न जाने क्यूँ पिछले कुछ दिनों से मुझे ऐसा लग रहा है कि कितना कुछ घट रहा है। कितना कुछ हो रहा है हमारे आस पास, हमारे देश में, हमारे शहर में, हमारे गाँव में, कितना कुछ ऐसा है जो कहीं न कहीं घुट रहा है हमारे अंदर। जिसे हम कहना चाहते है। क्यूंकि हम इस बात को स्वीकार करें या न करे कि भले ही आज इंसान बहुत स्वार्थी होगया है। देश के बारे में सोचना तो दूर अब कोई अपने अलावा और किसी के बारे में सोचना भी पसंद नहीं करता। लेकिन वास्तविकता तो यह है कि हम चाहे कितनी भी कोशिश कर लें स्वयं को इन आस पास चल रही गतिविधियों से हटाने की किन्तु चाहे न चाहे इनका असर हम पर पड़ ही जाता है। फिर चाहे वह हमारे देश से जुड़ा कोई राजनैतिक मामला हो या आस पास घटित हुई कोई गंभीर घटना। बल्कि मैं तो यह कहूँगी की गंभीर ही क्यूँ कभी कभी तो कोई साधारण सी घटना भी हमें हिला जाती है। और कभी कभी कोई बड़ी घटना का भी हम पर कोई असर ही नहीं होता। कितना अजीब है न यह सब ! लेकिन सच है। 


अब देखिये न आजकल गौ माँस पर पूरे देश में बबाल मचा हुआ है। वहाँ बहुत से ऐसे लोग है जो न हिन्दू है ना मुसलमान मगर उन्हें भी इन मामलों पर बोलना और अपनी प्रतिक्रिया देना सांस लेने जितना आवश्यक है। और जो लोग मेरी तरह हिन्दू है मगर उन्हें इन मामलों से कोई खासा फर्क ही नहीं पड़ता। या यूं कहिए फर्क तो पड़ता है। मगर किस से जाकर कहें अपने मन की बात। कोई सुनने समझने वाला भी तो होना चाहिए। लेकिन जब कोई है ही नहीं तो क्या करना है किसी से कुछ कहकर। जो हो रहा है, जो चल रहा है सो चलने दो। जबकि सभी यह जानते हैं कि गाय को पूजे जाने के बावजूद भी गाय के माँस का सबसे ज्यादा निर्यात भी हमारा देश ही करता है। फिर चाहे वह गौ माँस खाने के लिए करता हो, या फिर चमड़े से बने जूते हो सब भारत से ही बनकर जाते है और यह कोई आज की बात नहीं है। यह बरसों से होता अरहा है। गाय की पूजा करने वाले ही ना जाने ऐसे कितने व्यापारी होंगे जो धंधे के नाम पर स्वयं अपनी गायों को कसाइयों के हवाले करते है। आप खुद ही सोचिए कसाइयों के पास और बूचड़ खाने में गाय आती कहाँ से है कटने के लिए। स्वयं चलकर तो वह आएगी नहीं की लो मैं आ गई काट डालो मुझे और भर लो अपनी जेबें कोई न कोई तो उसे बेचता ही है। है ना ! तो क्या हर वो व्यक्ति मुसलमान ही होता है ? यदि आप ऐसा सोचते है तो बहुत गलत सोचते है। ऐसा नहीं है। 

हालांकी इन मामलों में कुछ किया नहीं जा सकता है। सिवाए इसके की हम काटे जाने वाले जानवरो को दी जा रही प्रताडना में कुछ हद तक कमी ला सकें तो शायद यह भी एक प्रकार का पुण्य ही हो जाये। क्यूंकि अब इंसान इतना गिर चुका है कि पैसा कमाने के लिए वह जो करे वह कम है मैंने कहीं पढ़ा था या शायद किसी से सुना था कि गायों को काटने से पहले उन्हें कई दिनों तक भूखा रखा जाता है। क्यूंकि भूखा रहने के कारण उनका हेमोग्लोबिन बढ़ जाता है, जो माँस खाने वाले के लिए बहुत फायदेमंद होता है। कितनी घटिया सोच है यह! मगर कुछ किया नहीं जा सकता। क्यूंकि जब तक मांग है तब तक सप्लाई भी होगी ही। यह संसार में चल रहे हर व्यापार का एक सबसे अहम नियम है जिस से हम इंकार नहीं कर सकते।        
इसी तरह पुणे में पिछले दिनों यहाँ एक और घटना घटित हुई, जब एक ६८ साल पुरुष ने अपनी पत्नी का गला काट कर उसकी हत्या कर दी और उसका सिर लेकर सड़कों पर निकल पड़ा। क्यूंकि उसे अपनी पत्नी पर संदेह था कि उसकी पत्नी के उसके दामाद के साथ नाजायज़ संबंध है। यह समाचार भी जंगल में आग की तरह फैला। और लगभग सभी समाचार पत्रों ने इसे छापा। लेकिन इस से हुआ क्या ? लोगों ने दो दिन बात की और फिर वही हुआ जो हमेशा से होता आया है। अर्थात सभी की ज़िंदगी अपने-अपने रास्ते। 





अभी आज ही १२ अक्टूबर २०१५ के समाचार पत्र में ही ऐसी ही एक और घटना ज़िक्र है जिसमें एक माँ ने अपने पाँच साल के बेटे की हाथों की नस काट कर उसकी हत्या कर दी और स्वयं भी चौथी या शायद पाँचवी मंज़िल से कूद कर आत्महत्या कर ली। समाचार पत्रों में छापे तथ्य के अनुसार दो दिन बाद महिला का जन्मदिन था जिसे मनाए जाने को लेकर पति और पत्नी में कुछ विवाद हो गया और महिला ने अपने बेटे सहित ऐसा दर्दनाक और दुखद कदम उठा लिया। मगर सोचने वाली बात है न इतनी मामूली सी बात पर भी भला कोई इंसान ऐसा भयानक कदम उठा सकता है क्या ? खुद के लिए कोई ऐसा कुछ कर भी ले तो एक पल को फिर भी बात समझ आती है लेकिन अपने साथ साथ अपने छोटे से बच्चे की यूं बेरहमी से जान ले लेना कोई मज़ाक नहीं है। फिर इतनी बड़ी घटना पर यह पेपर वाले इतना साधारण सा तर्क कैसे दे सकते है। यह बात मेरी समझ से तो बाहर है। इस पर क्या कहेंगे आप। कहना तो सभी बहुत कुछ चाहते है। मगर पचड़ों में कौन पड़े सोचकर कह कुछ नहीं पाते। और कई मामले तो ऐसे होते है जिसमें स्त्री पुरुष की सोच आड़े आ जाती है। मेरी तो यह समझ में नहीं आता की जब एक स्त्री और एक पुरुष एक इंसान है तो फिर दोनों की सोच इतनी अलग क्यूँ हो जाती है। उपरोक्त लिखे दोनों ही मामलों में हत्या का शिकार एक महिला ही हुई है। इसलिए महिलाओं की सोच इस विषय पर अलग है और पुरुषों की अलग। आखिर ऐसा क्यूँ ?

8 comments:

  1. गंभीर मुद्दा भी एक दिन छपकर खबर बन कर रह जाती है उसकी तह तक कोई नहीं जाने की किसी को फुर्सत नहीं। मसाला चाहिए ख़बरों का बस। .
    चिंतनशील प्रस्तुति हेतु आभार!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शूुक्रवार (16-10-2015) को "अंधे और बटेरें" (चर्चा अंक - 2131) पर भी होगी।
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    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  3. आज सभी अपनी अपनी सोच को सार्वभौमिक सत्य मान कर चल रहे हैं. दूसरों का द्रष्टिकोण जानने की न तो इच्छा है न प्रयास. बढ़ती हुई असहनशीलता निश्चय ही चिंतनीय है. बहुत सारगर्भित आलेख...

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  4. पल्‍लवी जी आपने अपने लेख में जो कुछ लिखा है। बहुत से लोग इसे पचा नहीं पाएंगें। देश का हर अच्‍छा इंसान और नागरिक ऐसा ही सोचता है। हमारे देश का दुर्भाग्‍य है कि यहां सत्‍ता की खातिर धर्म विशेष को निशाना बनाया जाता है और दूसरा दुर्भाग्‍य है कि जिस धर्म विशेष को निशाना बनाया जाता है। उस कौम के बहुसंख्‍य लोग भी मुख्‍यधारा में खुद को शामिल करते हुए पूरी मुखरता के साथ अपनी बात कहने से हिचकते हैं। हमारा देश किसी के लिए आस्‍था और किसी के लिए भूख के बीच कहीं अटक सा गया है। अच्‍छे लेख के लिए बधाई आपको।

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    1. शुक्रिया जमशेद जी।

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