Sunday, 18 November 2012

ज़िंदगी के रंग ....


ज़िंदगी भी क्या-क्या रंग दिखती है किसी को खुशी तो किसी को ग़म दिखती है बड़ा ही अजीब फलसफ़ा है ज़िंदगी का यह किसी-किसी को ही रास आती है जाने क्यूँ ऊपर वाला किसी के दामन में खुशियाँ डालता है तो किसी के दामन में कुछ कभी न खत्म होने वाले कांटे। जिन्हें सब कुछ अच्छा और आराम से मिल जाता है वह कभी खुश होकर उस ऊपर वाले का शुक्रिया तक अदा नहीं करते और कुछ लोगों को ज़िंदगी भर का ग़म मिले या किसी बात का मलाल रहे तब भी वह उस खुदा का, उस ईश्वर का शुक्र अदा करना नहीं भूलते ऐसा ही एक अनुभव मुझे भी हुआ। मेरे घर के सामने एक परिवार रहता है उनकी एक बेटी है जिसकी उम्र शायद 13-14 साल के आस पास की होगी और एक बेटा है जिसकी उम्र शायद 18 के आस पास होगी मगर वह एक मानसिक रोगी है। उनकी बेटी मेरे बेटे के स्कूल में ही पढ़ती है और हर रोज़ शाम को छुट्टी के वक्त उसके पापा और भाई उसे लेने स्कूल आते हैं।

 पिछले कुछ दिनों से मैं उस बच्चे को देख रही हूँ बड़ा ही प्यारा लड़का है उसको देखकर कभी-कभी दया भी आती है और अच्छा भी बहुत लगता है मानसिक रूप से ठीक ना होते हुए भी उसके अंदर ज़िंदगी को देखने का ,ज़िंदगी को जीने का, एक अलग ही जज़्बा है जो शायद हम आप जैसे लोगों में भी वैसा नहीं होता जैसा उस बच्चे में मुझे दिखता है। उस लड़के को मैं रोज़ देखती हूँ और उसे देखकर मुझे एक ही गीत याद आता है "तुझ से नाराज़ नहीं ज़िंदगी हैरान हूँ मैं" हांलांकी महज़ आप किसी को रोज़ देखकर उसके विषय में इतने अच्छे से नहीं जान सकते कि उसके बारे में किसी तरह की कोई राय बनाई जा सके। मगर फिर भी उस बच्चे के पिता उसके साथ बहुत खुश नज़र आते हैं मगर उसकी बहन को देखकर लगता है कि शायद उसे उसके भाई का यूं उसे लेने आना अच्छा नहीं लगता, ऐसा लगता है मगर वास्तविकता यही है या नहीं यह मैं नहीं जानती यह मेरा केवल अंदाज़ा है जो गलत भी हो सकता है और सही भी, वैसे तो मैं चाहूंगी कि ईश्वर करे इस विषय मेरा अंदाज़ा गलत ही हो मगर सब कुछ सोचो तो ऐसा लगता कि एक हम और आप जैसे समान्य लोग है जो बेटा -बेटा कर कर-कर के ही मरे जाते हैं और बेटियों से कतराते हैं जबकि बच्चे के जन्म के वक्त तो सभी की यह दुआ होनी चाहिए कि जो भी हो स्वस्थ हो मगर नहीं अपने यहाँ तो चाहे जैसे हो बस बेटा हो...

खैर मैं तो उस लड़के के बारे में कह रही थी और बात बेटा-बेटी पर पहुँच गयी, बहुत शौक है उसे फुटबाल खेलने का मगर ऊंची गेंद आते देखकर बहुत डर जाता है वो, पर खेलने का जोश कम नहीं होता उसका, स्कूल के छोटे-छोटे बच्चों के साथ खेलना चाहता वो, मगर बच्चे उसे गेंद देते ही नहीं क्यूंकि उस वक्त बच्चे खुद अपनी मस्ती में इतना मग्न होते हैं कि उसकी विवशता को समझ ही नहीं पाते। समय भी छुट्टी का रहता है तो उस वक्त कोई अध्यापक भी वहाँ मौजूद नहीं होता कि बच्चों को समझा सके कि उसे भी खेलने का मौका दो मगर फिर भी उसकी अपनी तरफ से पूरी कोशिश रहती है कि वह खेले और बच्चों की तरह भागे, दौड़े, मारे मगर बेचारा कर नहीं पाता, जानती हूँ यहाँ बेचारा शब्द बहुत ही गलत लगता है। मगर जब ऐसा कुछ देखती हूँ तो खुद को बहुत असहाय सा महसूस करने लगती हूँ क्यूंकि मैं चाहकर भी उसकी मदद नहीं कर सकती। ऐसे मामलों में खुद आगे बढ़कर किसी से कुछ कहना लोगों को बुरा लग सकता है और फिर स्वयं उसके पिता आगे नहीं आते शायद वह अपने बच्चे को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हो, ऐसे मैं यदि कोई भी अंजान व्यक्ति उसकी मदद करे तो हो सकता है कि उस व्यक्ति की सहानभूति उनकी भावनाओं को आहत कर दे वैसे तो ऐसे बच्चे सदा ही अभिभावकों के दिल के ज्यादा करीब होते हैं मगर कई बार इसका उल्टा भी होता है कई बार बाकी अन्य भाई बहन अपने किसी ऐसे भाई या बहन के प्रति जो मानसिक रूप से ठीक ना हो एक अलग सी भावना रखते है। यह अभिभावकों की ज़िम्मेदारी है कि वह अपने अन्य बच्चों में उस खास बच्चे के प्रति सामान्य व्यवहार रखें ताकि बाकी बच्चे भी उससे सामान्य व्यवहार ही करें क्यूंकि बच्चे वही करते हैं जो देखते हैं। मैंने कुछ परिवारों में ऐसे बच्चों के भाई बहनो कों उस खास बच्चे के प्रति शर्म महसूस करते देखा है तो कहीं अत्यधिक प्यार जिसका एक सबसे अच्छा उदहारण थी फिल्म "अंजली" जो बहुत से ऐसे परिवारों का जीता जागता प्रमाण है।

मेरे विचार से तो यह पूरी तरह सबसे पहले अभिभावकों की और उसके बाद समाज की ज़िम्मेदारी है कि वह ऐसे बच्चों के प्रति एक सकरात्मक रवैया रखते हुए उन से साधारण बच्चों की तरह व्यवहार करें मगर होता उसका उल्टा ही है। हांलांकि इस मामले में बहुत सी समाजसेवी संस्थाएं निरंतर काम कर रही है। मगर फिर भी ऐसे खास लोगों को आम लोगों में शामिल कराना किसी एक बड़ी लड़ाई लड़ने से कम बात नहीं है। आजकल का तो पता नहीं कि अपने इंडिया में इस जैसे बच्चों के लिए अब क्या-क्या व्यवस्थायें उपलब्ध कर दी गयी हैं। मगर इस विषय में यहाँ बहुत कुछ देखने को मिलता है यहाँ ऐसे खास बच्चों के लिए हर तरह की सुविधा उपलब्ध है। जैसे यहाँ उनके साथ भी आम बच्चों की तरह ही व्यवहार किया जाता है। उन्हें साधारण बच्चों के साथ एक से ही स्कूल में एक ही कक्षा में भी पढ़ाया जाता है। पिकनिक पर ले जाया जाता है,  पुस्तकालय ले जाया जाता है, उनके लिए अलग तरह के कमरों और शौचालयों की व्यसथा होती है ताकि उन्हें किसी अडचन का सामना न करना पड़े, यहाँ तक की बसों और रास्तों पर भी उनके लिए व्यवस्था होती है। कुल मिलकर हर तरह से कोशिश कि जाती है कि वो भी समाज में आगे चलकर सामान्य नागरिकों की तरह ज़िंदगी बसर कर सके और एक हम लोग हैं जो अभी तक बेटा बेटी के भेद भाव से ही उबर नहीं पाये हैं।

हो सकता है यहाँ कुछ लोगों को ऐसा लगे कि यह सब करके सरकार खुद ही उन बच्चों को कहीं न कहीं यह एहसास दिला रही है कि वो आम लोगों से अलग है मगर जहां तक मेरी सोच कहती है यह सब उनकी सुविधा के लिए है ना कि उन्हें यह एहसास दिलाने के लिए कि वह अलग हैं खैर इस बात के पीछे भी कई कारण हो सकते हैं जैसे कि हमारा देश इतना बड़ा है कि शायद वहाँ इन बातों का ध्यान इतनी अच्छी तरह रख पाना संभव ना हो और यह हमारे देश के सामने बहुत ही छोटा सा देश है और यहाँ की जनसंख्या भी बहुत कम है इसलिए भी शायद ऐसा हो, हमारे यहाँ तो आधी आबादी खाने कमाने के चक्करों में ही खत्म हो रही ही और जो समान्य वर्ग है उनका इतना बजट नहीं कि वो ऐसे खास लोगों का बड़े स्तर पर इलाज करवा सकें वरना अगर चिकित्सा पद्धती की बात कि जाये तो वो यहाँ की तुलना में हमारे यहाँ कहीं ज्यादा अच्छी है मगर साथ ही महंगी भी बहुत है इसलिए हम चाहकर भी उसका लाभ नहीं उठा पाते। उस परिवार को देखकर जो लगा वो मैंने लिखा अंदर की बात क्या है यह तो मैं नहीं जानती। मगर बाहर जैसा दिखता है उसके मुताबिक तो मन करता है उनका उदाहरण दिखाना चाहिए ऐसे लोगों को जो बेटे की चाह में बेटी का तिरस्कार करते हैं या बेटे की चाह में बजाय एक स्वस्थ बच्चे की इच्छा रखने के केवल बेटे की इच्छा रखते हैं।  इन सब बातों को सोचने पर लगता है कि कुछ भी कहो जो अलग है वो अलग है उसे लाख कोशिश करने पर भी हम अपने जैसा नहीं बना सकते मगर इतना तो कर ही सकते हैं कि कम से कम उसे खुद में यह महसूस ना होने दें कि वो हम से अलग है। बल्कि हमारी कोशिश तो यह होनी चाहिए कि उसके अलग होने के एहसास को भी उसके सामने ऐसे रखें कि वह खुद को खास समझे हीन नहीं....मुझे तो ऐसा ही लगता है आप सब की क्या राय है ?

20 comments:

  1. बेटे की चाहत रखें, ऐ नादाँ इंसान ।

    अधिक जरुरी है कहीं, स्वस्थ रहे संतान ।

    स्वस्थ रहे संतान, छोड़ यह अंतर करना ।

    दे बेटी को मान, तुझे धिक्कारूं वरना ।

    बेटा बेटी भेद, घूमता कहाँ लपेटे ।

    स्वस्थ विवेकी सभ्य , चाहिए बेटी बेटे ।।

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  2. vishesh dekhbhaal samanya tarike se dawa ban jati hai

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  3. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति का लिंक लिंक-लिक्खाड़ पर है ।।

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  4. ऐसे बच्चों की विशेष देखभाल तो हो पर सामान्य तरीके से .... हर समय ऐसे ही बच्चों पर ज्यादा ध्यान यदि अभिभावक देंगे तो अपने अन्य बच्चों के साथ न्याय नहीं कर पाएंगे .... अच्छी पोस्ट

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  5. इन विशेष बच्चों के प्रति यदि आप स्नेह प्रदर्शित करते हैं तो कई बार उनके अभिभावक अजीब निगाहों से देखते हुए उन्हें दूर कर देते हैं . शायद उस परिस्थिति में आशंकाएं हो ही जाती होंगी !
    उनके लिए विशेष इंतजाम होने चाहिए जबतक की सामान्य आत्मविश्वास हासिल ना कर पाए .
    अन्तरा भी ऐसा ही लोकप्रिय धारावाहिक रहा !

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  6. प्यार उन्हें भी, प्यार हमें भी,
    बाँध रखा सबको ही प्यार..

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  7. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी ...बेह्तरीन अभिव्यक्ति ...!!शुभकामनायें.
    आपका ब्लॉग देखा मैने और नमन है आपको और बहुत ही सुन्दर शब्दों से सजाया गया है लिखते रहिये और कुछ अपने विचारो से हमें भी अवगत करवाते रहिये.

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  8. bahut achchha likha hai aapne ...aise bachchon badon ke liye man ka kona to nm ho hi jata hai...

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  9. बहुत सुन्दर बिलकुल सही लिखा है आपने ।

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  10. एक वैचारिक आलेख है ये ,और बहुत कुछ करने का टोपिक भी ,मैं अगले साल इस तरह के बच्चों के लिए कुछ योजना बनाने जा रही हूँ.

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  11. यहाँ विशेष सुविधाएँ होती हैं ऐसे बच्चों के लिए.अच्छा आलेख.

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  12. वहां इंसानों का अभाव है . यहाँ थोक के भाव हैं .
    लेकिन कुदरत भी कभी कभी बहुत दुःख दे देती है.

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  13. बहुत सम्यक दृष्टी डाली है आपने इस समस्या पर . और समाज में इस समस्या के निदान के लिए बहुत कुछ करना है अभी .

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  14. विकास की ओर बढते देश इस समस्‍या से भी जागरूक हैं, अभी भारत को समय लगेगा।

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  15. बहुत सुंदर । मेरे नए पोस्ट पर आपका हार्दिक स्वागत है।

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  16. बहुत ही अच्‍छा लिखा है आपने ... इस उत्‍कृष्‍ट प्रस्‍तुति के लिये बधाई

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  17. आपके विचारों से सहमत।
    ऐसे बच्चों के प्रति पहले अभिभावकों को ही संवेदनशील और जागरूक होना होगा।

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  18. उम्दा लेख |अच्छा टॉपिक |
    आशा

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