मैंने कुछ दिन पहले एक पोस्ट देखी थी फ़ेसबुक पर जिसे देखकर मेरा मन बहुत खिन्न हो गया था। मैंने खुद भी उस पोस्ट को अपनी फेसबुक पर सांझा भी किया था। विषय था गरीब और भूखे बच्चों को खाना पहुंचाने वाली संस्था का प्रचार जिसे देखकर अच्छा भी लगा कि कोई संस्था तो है जिसने इस विषय में कुछ अच्छा सोचा फिर दूजे ही पल यह भी लगा कि क्या यह संस्था सच में विश्वसनीय है? क्या आज कल के इस भ्रष्टाचारी समाज में, जहां जिसको देखो वह किसी न किसी माध्यम से केवल भ्रष्टाचार मिटाओ का नारा लगता हुआ ही नज़र आता है। ऐसे हालातों में भला कोई किसी पर सहजता से कैसे विश्वास करे। वहाँ ऐसे सार्थक सोच रखने वाली कोई संस्था पूरी ईमानदारी से कार्य करेंगी। यह एक विचारणीय बात थी। ऐसे ना जाने कितने सवाल दिमाग में हलचल मचाने लगे तब लगा, कि यार जब हम फेसबुक जैसी जगह पर कुछ भी करते है। जैसे कभी किसी के सड़े हुए जोक को भी लाइक कर देते हैं। या फिर किसी भी पसंदीदा पोस्ट को सांझा कर लेते हैं। फिर भले ही वह किसी फ़िल्म का गीत ही क्यूँ न हो। या फिर नया साल हो या दिवाली दशहरा जैसे त्यौहार सभी को संदेश के जरिये न जाने कितने जाने-पहचाने और अंजाने लोगों तक को शुभकामनायें दे डालते है। तो भला ऐसे में यह सार्थक संदेश को भी क्यूँ न आमलोगों तक पहुंचाया जाये क्या पता इसे पढ़कर ही कुछ लोगों का ज़मीर जाग जाये और उन गरीब मासूम भूखे बच्चों का कुछ भला हो जाये।
वाकई जरा सोचिए कितना कुछ है हमारे आस-पास जिसके बारे में यदि ग़ौर से सोचा जाये और ध्यान दिया जाये तो बहुत सी समाज सेवायें बड़ी सरलता के साथ ही की जा सकती है। क्या अपने कभी सोचा है हमारे यहाँ कितने परिवार ऐसे हैं जिनमें परिवार के सदस्यों से अधिक खाना बनता है और फिर बच जाता है जिसे ज्यादातर या तो घर में काम कर रही बाई को दे दिया जाता है या फिर भिखारियों को या फिर अंत में जानवरों को मगर आज कल के युग में इतनी गरीबी और महंगाई होते हुए भी भिखारियों और काम करने वाली बाइयों के नखरे भी कम नहीं है और जहां तक मुझे लगता है आप सब भी मेरी इस बात से भली-भांति परिचित होंगे। बाइयाँ कहती हैं हम कोई भिखारी नहीं कि आप हमको रात का बचा हुआ खाना दो, देना है तो ताज़ा दो, वरना रहने दो और इन में से कुछ ऐसे भी है जो कह नहीं पातीं वो आपके घर से खाना ले तो जाती तो हैं। मगर बाहर जाकर या तो कूड़े में डाल देती हैं या जानवर को खिला देती है। जानवर को खिला दिया जाये तो भी ठीक लगता है। क्यूंकि वह बेचारे खुद तो कुछ कर नहीं सकते लेकिन कूड़ेदान में डाल देने से भला किसका भला होने वाला है। इस से तो अच्छा है वही खाना किसी जरूरतमंद को दे दिया जाये, बदले में आपको सैकड़ों दुआएं ही मिलेंगी भला आपका ही होगा। मगर अफसोस कि आजकल के ज़माने में ऐसी सोच रखने वाले शायद ना के बराबर ही लोगों है।
आजकल न तो ऐसे लोगों की कमी है जो इस ओर सोचते हों और ना ही अब भिखारी भी ऐसे हैं जो खाना या अनाज लेने की इच्छा रखते हो। क्यूंकि आज कल के भिखारी भी कम नहीं है उनको बोलो आटा ले लो महाराज, तो कहते है नहीं पैसा दे दो एक वो ज़माना था जब भिखारी खुद पैसों के बदले आटा, चावल या कोई भी अनाज लेना पसंद करते थे। ताकि उनके साथ-साथ उनके परिवार का पेट भी पल जाये ...और एक आज का ज़माना है कि आप सामने से अनाज दो तो भी सामने वाला भिखारी वो न लेकर पैसे मांगता है और कुछ तो अनाज भी नहीं छोड़ते ऊपर से पैसे भी मांगते है। खास कर वो जो हाथी पर बैठकर भीख मांगते हैं। देखा जाये तो इसमें उनकी भी गलती नहीं वारदाते ही आज कल ऐसी होती हैं कि एक इंसान को दूसरे इंसान पर भरोसा करने से पहले दस बार सोचना पड़ता है।
अब जैसे रेलवे स्टेशन की बात ही ले लीजिए वहाँ भी अब लोग भिखारियों को भीख में खाना देना पसंद नहीं करते। क्यूंकि एक बार का एक किस्सा है। एक सज्जन को लूटने के लिए एक भिखारी ने पहले उनका दिया हुआ खाना लिया और दूजे ही पल ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाया कि मेरी तबीयत खराब हो रही है। मेरा पेट दुखने लगा इन साहब ने मुझे जाने कैसे खाना खिला दिया और जब उन सज्जन ने बात संभालने की कोशिश की तो उनसे बदले में पैसों की मांग की गई थी। शर्म आती है मुझे तो कभी-कभी यह सोचकर कि कितना बेशर्म होता जा रहा है इंसान, सब अपने बारे में सोचते हैं दूसरों के बारे में बहुत कम जब अपने घर कोई दावत होती है तब हम अपने सभी रिश्तेदारों को बुलाते हैं अच्छा से अच्छा खिलाते हैं एक से बढ़कर एक उपहार भी पाते है। मगर हममें से कितने ऐसे लोगों हैं जो सिर्फ गरीबों के लिए दावत बुलाते हों ?? देखा जाये तो शायद एक भी नहीं होगा। हाँ मगर जब किसी को दुआओं की जरूरत महसूस होती है, तभी लोगों को भूखे नगों और गरीबों की याद आती है। उसके पहले कभी नहीं आती, या फिर दूसरों को दिखाने के लिए लोग दान पुण्य करते हैं कि समाज में दिखा सकें कि देखो कितना बड़ा है हमारा दिल, इसके अलावा अपने मन की श्रद्धा से कोई कुछ नहीं करता। हालांकी मैं यह नहीं कहती कि सभी एक जैसे होते हैं कुछ इंसान अच्छे भी है जिनका बड़ा दिल है मगर वो कहावत है ना कि
"एक गंदी मछ्ली पूरे तालाब को गंदा कर देती है"
"जरूरत पड़ने पर गधे को भी बाप बनाना पड़ता है"
ऐसी ही एक संस्था है यह "चाइल्ड हेल्प लाइन" नामक संस्था जिनका कहना है कि अगर आगे से कभी आपके घर में पार्टी / समारोह हो और खाना बच जाये या बेकार जा रहा हो तो बिना झिझके आप 1098 (केवल भारत में)प र फ़ोन करें - यह एक मज़ाक नहीं है - यह चाइल्ड हेल्पलाइन है । वे आयेंगे और भोजन एकत्रित करके ले जायेंगे। कृपया इस सन्देश को ज्यादा से ज्यादा प्रसारित करें इससे उन बच्चों का पेट भर सकता है जो भूखे हैं लाचार हैं गरीब है कृपया इस श्रृंखला को तोड़े नहीं, हम चुटकुले और स्पैम मेल अपने दोस्तों और अपने नेटवर्क में करते हैं ,क्यों नहीं इस बार इस अच्छे सन्देश को आगे से आगे मेल करें ताकि हम भारत को रहने के लिए दुनिया की सबसे अच्छी जगह बनाने में सहयोग कर सकें -"मदद करने वाले हाथ प्रार्थना करने वाले होंठो से अच्छे होते हैं " -हमें अपना मददगार हाथ दें। भगवान की तसवीरें फॉरवर्ड करने से किसी को गुडलक मिला या नहीं मालूम नहीं पर एक मेल अगर भूखे बच्चे तक खाना फॉरवर्ड कर सके तो इस से ज्यादा बेहतर बात और क्या हो सकती है. कृपया क्रम जारी रखें।
एक और ऐसी ही संस्था है जिसका नाम है "राम रोटी संस्था" जो भोपाल में चलाई जाती है इस संस्था के अंतर्गत अस्पताल में गरीब रोगियों के लिए खाना भिजवाया जाता है वो भी बिना किसी शुल्क के वह आपको एक दिन पहले आकर अपना खाने का डिब्बा दे जाते है साथ ही अस्पताल का पता भी ताकि यदि आपको किसी प्रकार की कोई शंका हो तो आप वहाँ जाकर पता कर सकते हैं उस डिब्बे में आपको दो रोटी दाल सब्जी बस इतना ही खाना रखकर तैयार रखना होता है अगले दिन उस संस्था का कोई व्यक्ति आकर आपके घर से वो डब्बा लेकर चला जाता है। आपको स्वयं वहाँ जाने तक की जरूरत नहीं इन दोनों संस्थाओं के काम को देखते हुए मेरा आप सभी से भी विनम्र अनुरोध है कृपया इंसानियत को ध्यान में रखते हुए इस इंसानियत के धर्म का भी पालन करने और इस संस्थाओं के माध्यम से गरीबों बच्चों और बुज़ुर्गों की सहायता करें........जय हिन्द.
