मंत्र तंत्र, टोना टोटका, काला जादू, काली विद्या, और भी ना जाने क्या क्या इसी सब में
लिप्त एक अलग ही दुनिया जिसमें विश्वास आस्था अंधविश्वास तर्क कुतर्क जैसे शब्द या
विचार कुछ क्षणों के लिए सब शून्य हो जाते है. हमारी शिक्षा हमें सही गलत में भेद
करना सिखाती है इसलिए हमारा दिमाग तर्क ढूंढता है. लेकिन यह फ़िल्म आपको एक ऐसी विस्मय
से भरी दुनिया में ले जाती है कि यह सारे शब्द मानो किसी काली गहरी स्याही में घुल
जाते है और कुछ ही समय में यह फिल्म आपको अपने ही रंग में रंग एक ऐसी दुनिया में ले
जाती है जो आपकी वास्तविक दुनिया से बिलकुल विपरीत एक बहुत अलग ही दुनिया है. जहाँ
मनुष्य तो है, लेकिन हमारे जैसे नहीं है. यूँ भी बंगाल का
काला जादू किसी परिचय का मोहताज नहीं है. जब भी काले जादू की बात होती है सबसे
पहले बंगाल का ही नाम दिमाग में आता है.
यूँ तो इस विषय पर फिल्में पहले भी बनी है और बड़े बड़े कलाकारों ने
अपने बेहतरीन अभिनय का प्रदर्शन करते हुए लोगों की रूह हिलाई है. लेकिन मुझे तो यह
फ़िल्म भी अच्छी लगी हालांकि इस तरह की फ़िल्म को देखने वाली जनता बहुत कम ही होती
है लेकिन इस फ़िल्म का गीत संगीत के साथ फिल्माए गए दृश्य एक अलग ही माहौल बना देते
है. उस वक़्त आपको ऐसा महसूस होता है की आप दर्शन नहीं बल्कि उसी समुदाय का एक हिस्सा
हो जैसे चरक महोत्सव के नाम पर दिखाया गया मेला जिसमें कुछ ऐसी बातें दिखाई गयी है
जो आदिवासी मान्यताओं और परम्पराओं को दर्शाती तो हैं लेकिन कहीं उनका नाम नहीं आता.
ऐसा मुझे लगता है यह मेरा अनुभव है, हो सकता आपको ऐसा
कुछ भी ना लगे.
लेकिन यह फ़िल्म बहुत से विषयों पर प्रश्न उठती है और अपनी इच्छा पूर्ति के नाम पर नर बली जैसे क्रूर कृत्य के विषय में बात करती है. जिसमें अबोध बच्चों की बली दी जाती है. दूसरी ओर यह फ़िल्म मातृत्व जैसे भाव पर भी प्रश्न उठती है कि क्या जन्म देने वाली माँ ही माँ कहलाती है और जो जन्म ना दें सके वो माँ नहीं हो सकती. अक्सर लोग इस वाक्य को मैया यशोदा से जोड़ देते है. लेकिन जन्म तो उन्होंने भी दिया था किसी को वंध्या तो वो भी नहीं थी. फिर जो स्त्री किसी भी कारण से संतान उत्पन्न नहीं कर सकती क्या उसमें मातृत्व की भावना निहित नहीं होती...?? हम हमेशा ऐसे मामलों में यह बात क्यों भूल जाते है कि ईश्वर ने स्त्री को पैदा ही मातृत्व की भावना के साथ किया होता है. तभी तो माँ के बाद मासी, मासी के बाद बहन भी एक पुरुष के जीवन में कभी ना कभी माँ का रोल निभा जाती है.
फिर भी आज तक हमारे समाज का एक बड़ा तपका ऐसी स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता. विशेष रूप से कम पढ़े लिखे या अशिक्षित गाँव देहात के वह लोग जो संतान प्राप्ति के लिए आज भी मेडिकल साइंस का सहारा लेने की बनिस्बत तंत्र मंत्र और जादू टोने में अधिक विश्वास रखते है और उसे ही अधिक असरदार मानते है. फिर चाहे खुद की कोख से जन्म देने के लिए, किसी दूसरे की कोख ही क्यों ना उजाड़नी पड़े, उसी चक्कर में बच्चों का अपहरण भी होता है और नर बली के नाम पर बली भी दी जाती है. साथ ही साथ आबा बाबा का कारोबार भी खूब फलता फूलता है. हालाँकि इस तरह के अपहरणों के कई और भी बड़े कारण है.
लेकिन यह फ़िल्म इसी मुद्दे को दिखाती है. यूँ देखा जाये तो आस्था का किसी धर्म कर्म से कोई खास संबंध नहीं होता. यह हर एक व्यक्ति का निजी मामला बन जाती है. जिसके नाम पर लोग अक्सर अंधे हो जाते है और आस्था के नाम पर इतना कुछ ऊल जल्लू करते है जिसे देखकर दिमाग घूम जाता है और यह पिक्चर दिमाग घुमाने वाली ही है. बहुत कुछ ऐसा है जो सच में होता है. लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जो किसी विशेष समुदाय के बारे में कहीं ना कहीं गलत संदेश भी देता है. लेकिन यदि आप भी फ़िल्म मेरी तरह घुसकर देखने वालों में से है तो यक़ीनन यह फ़िल्म आपका भी दिमाग़ घुमाकर रख देगी और आपको एक ऐसी विस्मित दुनिया में ले जायेगी कि बाहर आकर आप यह सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि क्या सच में ऐसी भी कोई दुनिया है हमारे इर्द-गिर्द या फिर हम अभी अभी एक कल्पना लोक से बाहर आये है.
अफसोस तो केवल इस बात का होता है कि ईश्वर के नाम पर लोग क्या कुछ बुरे से बुरा कुकर्म नहीं करते और जो करते है, उसमें भी उसका नाम जोड़ देते है. जिसे आम लोगों में उस परमात्मा पिता परमेश्वर के प्रति गलत संदेश ही जाता है. यह फ़िल्म हमें हमारे समाज के एक ऐसे हिस्से का चेहरा दिखाती है जो आमतौर पर कभी हमारी आँखों के सामने नहीं आता. लेकिन जब आता है, तब उस पर विश्वास करना हमारे लिए कठिन हो जाता है. इस समाज के विविध पहलू है और शायद विविध प्रकार के चेहरे भी, अब जिसका जिस पहलू से सामना होता है उसे वही पहलू ज्यादा घातक,डरावना, या घिनौना महसूस होता है. जैसे देह व्यापार के मामले, मानव तस्करी के मामले, यह फिर यह नर बली का पहलू. कुल मिलाकर विषय वस्तु कोई भी क्यों ना हो हर घिनौने कृत्य के पीछे छिपा है मनुष्य का लोभ लालच और उसका अहम कि यदि मैं नहीं तो कोई नहीं...कुछ नहीं और इस सब का किसी जाति या धर्म से कोई लेना देना नहीं है. यह हर धर्म में होता है, बस दिखाने वालों को केवल हिन्दू धर्म ही मिलता है और ऐसा क्यूँ यह बात भी किसी से छिपी नहीं है. वरना अंधविश्वास की पराकाष्ठा तो सभी धर्मों में समान है.
मैं इस फिल्म को लेकर आप सभी के मन में कोई सस्पेंस या उत्सुकता नहीं बनाना चाहती कि आप सब को भी यह फिल्म देखनी ही देखनी चाहिए. मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि कम बजट में सस्ती और अच्छी फिल्में भी बनाई जा सकती है और यह फिल्म भी उन्हीं में से एक है. जो बहुत ही साधारण किन्तु बहुत ही सटीक तरीके से अपनी बात आपके सामने रखती है कि धीरे धीरे यह फिल्म आप पर असर करने लगती है. ना इसमें कोई बड़े कलाकार है, न फालतू का कोई गीत संगीत जो भी है वो है इस फिल्म का फिल्मांकन अर्थात कहानी को दिखाने का तरीका लाइक “सीधी बात नौ बकवास” तो मुझे तो यह फिल्म अच्छी लगी यदि यह पोस्ट पढ़कर आपका को भी दिल करे कि देखनी चाहिए तो एक बार देखिएगा जरूर

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