Monday, 2 July 2012

ऐसा भी होता है कभी-कभी ...


यूं तो बात अनुभव की है और कई बार अनुभव परिस्थितियों पर निर्भर करते है अर्थात यदि किसी विषय विशेष को लेकर आप को अपनी ज़िंदगी में कोई अनुभव होता है तो वो अनुभव बहुत हद तक परिस्थिति पर भी निर्भर करता है कि उस वक्त परिस्थिति आपकी मांनसिकता के अनुकूल है या विपरीत है क्यूंकि यदि उस वक्त आपकी मनः स्थिति के मुताबिक परिस्थिति अनुकूल है तो आपका अनुभव सुखद रहेगा और यदि परिस्थिति विपरीत है तो अनुभव दुखद भी हो सकता है दुखद अर्थात खरा या कड़वा या फिर यूं कहिए जैसे खाने में कभी-कभी नमक का ज्यादा होना। ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी होता है कभी-कभी और क्यूँ न हो आखिर हूँ तो मैं भी एक इंसान ही इसलिए किसी-किसी बात को लेकर मेरे भी विचार बदलते रहते हैं। कभी ऐसा सोचती हूँ तो कभी वैसा।

अब  देखिये ना कामकाजी महिलाओं और गृहणियों को लेकर आज तक मैंने कितना कुछ लिखा है। लेकिन फिर भी मुझे खुद कभी-कभी ऐसा लागने लगता है कि कामकाजी होना ज्यादा अच्छा है। अब जैसे उदहारण के तौर पर यदि मैं कहूँ तो मेरे बेटे की कक्षा में उसके जितने भी दोस्त हैं उन सभी दोस्तों की मम्मियाँ जॉब करती है जिसके चलते उसे भी ऐसा लगता है कि मेरी माँ को भी जॉब करनी चाहिए क्यूंकि उसे ऐसा लगता है कि यदि मैं जॉब नहीं करती तो मैं कुछ नहीं करती अर्थात मुझे बहारी दुनिया के विषय में कोई जानकारी नहीं जिसके चलते मैं यहाँ इंगलेंड में रहने लायक नहीं हूँ। दरअसल उसकी ऐसी भावना या ऐसी सोच उसके नज़रिये से गलत नहीं है, क्यूंकि उसकी पढ़ाई यही से शुरू हुई है और जब से उसे थोड़ी बहुत समझ आयी है, तब से उसने यही देखा है उसकी माँ के अलावा बाकी सभी बच्चों की माँयें यहाँ जॉब करती है। जबकि इंडिया में उसकी दादी, नानी चाचीयाँ कोई जॉब नहीं करता। तो स्वाभाविक है उसके मन में यही छवि बननी ही थी, कि इंडिया में सभी औरते ऐसी ही होती है जो केवल घर में रहती है। इसलिए उन्हें बाहर की दुनियाँ के विषय में कोई खास जानकारी नहीं होती है।

यही सब देख कर लगता है कि यार जॉब करनी चाहिए हालांकी मैंने उसकी यह गलतफ़हमी कई बार दूर करने की कोशिश भी की, कई बार उसे समझाया भी की ऐसा नहीं है जैसा वो सोचता है। लेकिन थोड़े दिन शांति रखने के बाद फिर उसे लगने लगता है कि नहीं वो जो सोचता है वही सही है। इस सब के चलते ही मुझे भी कभी -कभी लगने लगता है कि उसे दिखाने के लिए ही सही मुझे जॉब कर लेनी चाहिए। मगर फिर दूसरे ही पल यह भी लगने लगता है कि नहीं गृहणी होने में भी कोई बुराई नहीं है। क्यूंकि मेरे जॉब कर लेने से शायद उसकी यह सोच पक्की हो जाएगी जो मैं ज़रा भी नहीं चाहिती।

यानि मुझे "पल में तोला पल में माशा" वाली स्थिति महसूस होने लगती हैं। वैसे तो मुझे अपने पति देव से कोई शिकायत नहीं, ना ही मुझे पर किसी तरह की कोई बंदिश है। मैं जब चाहूँ जो चाहूँ कर सकती हूँ। फिर चाहे वो मन चाहा कोई काम हो या पैसा खर्च करना। मैं जब चाहूँ जितना चाहूँ बेझिझक पैसा खर्च कर सकती हूँ। उन्होंने आज तक मुझे कभी नहीं रोका। अरे-अरे आप यह मत सोचिए कि मैं किसी तरह का कोई दिखावा कर रही हूँ। ऐसा ज़रा भी नहीं है, मैं तो बस अपनी बात को सही ढंग से कहने की कोशिश कर रही हूँ कि मुझ पर किसी तरह की कोई बंदिश नहीं है फिर भी कभी-कभी लगता है कि यार जॉब करनी चाहिए। जॉब करने से आत्म निर्भरता तो आती ही है साथ ही आत्म विश्वास भी बढ़ता है। यानि कुल मिलाकर एक अलग सी स्वतंत्रता का अनुभव होता है।

कहने का मतलब और कुछ न हो कम से कम कुछ भी करने से पहले ज्यादा सोचना नहीं पड़ता। क्यूंकि आप जो भी करते हो वो आपका अपना निर्णय होता है, इसलिए अंजाम की ज्यादा चिंता नहीं होती। हालांकी इसका मतलब यह नहीं है कि अंजाम की परवा होती ही नहीं है। आखिर जो भी है आपकी मेहनत भी उसमें शामिल है ऐसे में बिना सोचे समझे तो आप उस पर पानी नहीं फिरने दे सकते है ना !!! ऐसा ही शायद हर गृहणी भी सोचती है इसलिए वो भी अपने पति की कमाई को यूं ही केवल अपने शौक के लिए नहीं उड़ा देती। इसलिए पति भी बेफिक्र रहा करते है और कोई बंदिशें भी नहीं लगाते, क्यूंकि उनको पता है कि मेरी पत्नी जो भी करेगी सोच समझ कर ही करेगी। यूं ही नहीं कोई भी निर्णय लेकर अपनी मन मुताबिक पैसा पानी की तरह बहा देगी।  यानि दोनों ही सूरतों में पैसा खर्च करने से संबन्धित कोई भी निर्णय बहुत सोच समझ कर ही लिया जाता है। फिर चाहे वो कोई कामकाजी महिला का निर्णय हो या किसी गृहणी का, मगर फिर कभी -कभी दिल में ख़्याल आ ही जाता है विपरीत परिस्थिति का वो शायद इसलिए कि वो कहते है न

"पड़ोसी से के घर के आँगन की घास 
हमेशा खुद के आँगन की घास से ज्यादा ही हरी नज़र आती है"

शायद इसलिए जैसे मुझे जॉब को लेकर लगता है कभी-कभी हो सकता है ऐसा ही जॉब वाली महिलाओं को हम गृहणियों को लेकर भी लगता ही कभी-कभी, कि रोज़-रोज़ की ऑफिस की टेंशन से अच्छा है पति की कमाई पर ऐश करो :-) आखिर हैं तो वो भी इंसान ही ना। वाकई ऐसे अनुभव ज़िंदगी में ना जाने कितनी बार होते हैं जिनमे ऐसा लगता है कभी यह सही तो कभी लगता है वो सही है और फिर थोड़ी देर बाद ज़िंदगी वही अपने ढर्रे पर आ जाती है और उस क्रम में चलने लगती है जैसे पहले चल रही होती है। बस ये कमबख़्त दिमाग ही है जो एवईं यहाँ वहाँ भटकता रहता है। 

मगर फिर सोचा कि ऐसी कितनी महिलायें हैं हमारे देश में हमारे समाज में जिनको इस मामले में इतनी स्वतन्त्रता नहीं मिल पाती जितनी हमको मिली है। लोग आज भी अपनी पत्नियों के साथ कैसा-कैसा सुलूक करते है। उन महिलाओं के लिए तो जीवन जीना कठिन है फिर चाहे वो कामकाजी हो या ना हो, सामने वाले को कोई फर्क नहीं पड़ता। कई बार तो कई महिलाओं से काम कराया ही जाता है महज़ पैसे के लिए ताकि उनके पति अपने शौक और जरूरते पूरी कर सकें फिर चाहे उनकी पत्नी काम करना चाहे या ना चाहे उसकी मर्जी की कोई अहमियत नहीं हुआ करती। फिर ऐसे में बिना पति की इजाज़त पैसा खर्च करना चाहे जरूरत के लिए ही क्यूँ ना करना हो, उस स्त्री के लिए बहुत दूर की बात है और शौक का तो सवाल ही नहीं उठता।

मैं एक गृहणी हूँ मेरी मम्मी भी एक गृहणी है मेरे दादी, नानी सभी गृहणी ही रही है शायद इसलिए इसलिए मुझे कभी जॉब करने का ख़्याल भी नहीं आया न ही ज़रूरत ही महसूस हुई कभी, लेकिन कभी-कभी ऐसा कुछ हो जाता है कि कहीं दिल के किसी कोने में लगने लगता है कि जॉब करनी चाहिए। मगर जब उपरोक्त लिखी बातों को कहीं पढ़ती हूँ सुनती हूँ या देखती हूँ और जब यह ख़्याल आते हैं तो लगता है भगवान ने जिसको जो दिया वही अच्छा है उसमें ही इंसान को खुद को खुशनसीब समझना चाहिए, ना कि दूसरों को देखकर खुद को कम समझने की भूल करनी चाहिए। कामकाजी महिलाओं और गृहणियों दोनों का ही अपनी-अपनी जगह एक अलग ही महत्व है। है न ... आपको क्या लगता है