Monday, 11 June 2012

विवाहित होते हुए भी अविवाहित दिखने की होड़



विवाहित होते हुए भी अविवाहित दिखने की होड़
पिछले पाँच सालों में मुझे यह विवाहित होते हुए भी खुद को अविवाहित दिखाने की होड़ यहाँ मतलब UK में कुछ ज्यादा ही देखने को मिली। यहाँ भारतीय हिन्दू महिलायें किसी भी तरह के सुहाग चिन्ह का कोई प्रयोग नहीं करती जैसे न बिंदी, न सिंदूर, ना पाँव में बिछियेन हाथों में चूड़ियाँ और ना ही गले में मंगलसूत्र। जब मैं शुरू-शुरू में यहाँ आयी थी। तब मुझे लगा कि शायद "जैसा देश वैसा भेष" वाली कहावत को सच मानते हुये लोग ऐसा करते होंगे। ताकि वह भीड़ में अलग न दिखेँ। जबकि मेरा तो ऐसा मानना है, कि भीड़ में अलग दिखना ज्यादा दमदार बात है। खैर इस विषय को लेकर सब की अपनी-अपनी सोच और अपने-अपने विचार है। वैसे देखा जाये तो अब भारत में ही लोग इस आधुनिकता की अंधी दौड़ में अंधे बन भेड़चाल की भांति भागे चले जा रहे है। जिसके चलते अब वहाँ भी कोई सुहाग चिन्हों का प्रयोग पूरी तरह नहीं करता। तो फिर यहाँ की तो बात ही क्या, यह तो है ही परदेस।  

बात यहाँ देश या विदेश की नहीं है बात है मान्यता की मगर पता नहीं लोग अपने आप को विवाहित होते हुए भी अविवाहित क्यूँ दिखाना चाहते है। इसके पीछे मुझे तो एक ही कारण समझ आया। पहला यह कि यदि मैं यहाँ की बात करुँ तो लोग भीड़ से अलग दिखना नहीं चाहते। उसके भी दो कारण है एक यह हो सकता है कि भारतीय लोगों को पहले ही अँग्रेज़ एक अलग ढंग से देखते सुनते है। दूसरा कारण पहनावा भी हो सकता है क्योंकि एक तो यहाँ का मौसम जिसके चलते यहाँ का पहनावा ज्यादातर ऐसा होता है कि यदि आप उस पर हिन्दुस्तानी सुहाग चिन्हों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करेंगे तो जरूरत से ज्यादा ही अलग नज़र आयेंगे या यूँ कहिए उल्लू दिखेंगे। तीसरा और सबसे अहम कारण है फ़ैशन, फ़ैशन की दुनिया तो हर किसी को अपनी और आकर्षित करती है। फिर आप यहाँ रह रहे होंया फिर दुनिया के किसी भी कोने में, फ़ैशन की चमक दमक से आप बच नहीं सकते।  

इस विषय में मैंने एक दो महिलाओं से बात भी की, भई माना कि यहाँ रहकर सभी सुहाग चिन्हों का प्रयोग नहीं किया जा सकता। मगर एक दो का तो बड़ी आसानी से किया जा सकता है। जैसे माँग में थोड़ा सा सिंदूर या पाँव में बिछिये, तो मुझे जवाब मिला अरे आप भी कौन से ज़माने की बात कर रही हो, हम नहीं करते यह सब शुरू में हमको भी लगता था। इसलिये हम भी ज्यादा कुछ नहीं तो कम से कम पाँव में बिछिये तो पहनते ही थे। मगर जब यहाँ स्पोर्ट शुज़ पहनने पड़े तो बहुत परेशानी का सामना करना पड़ा इसलिए फिर हमने सब छोड़छाड़ दिया अब तो बस जब इंडिया जाते हैं तभी सब कुछ करते हैं तब ही अच्छा भी लगता है वरना यहाँ कौन देख रहा है। आप अभी नयी-नयी हो इसलिए आपको लग रहा है थोड़े साल गुज़र जाने दो आप भी हम जैसी ही हो जाओगी। यह सब सुनकर जहां एक और मुझे अजीब लगा वहीं दूसरी ओर मैं सोच में पड़ गयी कि यह मात्र दिखावा है या मन की भावनाए या फिर वक्त की मांग। यह सब सोच कर मेरे मन में कई तरह की बातें आने लगीं।

जैसे यह दिखावे की चीज़ें हैं या मान्यता की या फिर अपनी संस्कृति या परंपरा की क्योंकि मानो तो भगवान वरना पत्थर ही है। यदि मैं अपने अनुभव की बात करुँ तो बिंदी न लगाना, या सिंदूर न लगाना, या हाथों में काँच की चूड़ी का ना होना, या फिर पाँव में बिछिये का न होना मेरी माँ को तो ज़रा भी पसंद नहीं, उनके हिसाब से किसी भी सुहागन महिला के श्रिंगार में और कुछ सम्मिलित हो न हो मगर यह सब सुहाग वाली चीजें न सिर्फ उस औरत के जो की विवाहित है बल्कि मेरे श्रिंगार में भी जरूर शामिल होना ही चाहिए। इसलिए जब भी मैं उनके सामने होती हूँ तो यह सब चीज़े मेरे श्रिंगार में शामिल जरूर होती है वरना बहुत डांट पड़ती है। मगर ऐसा नहीं है कि मेरे अंदर इन चीजों को लेकर केवल दिखावा है। मैं दिल से भी इन चीजों को बहुत मान देती हूँ। इसलिए यहाँ रहकर भी मेरे हाथों में काँच की एक चूड़ी और माँग में सिंदूर और पाँव में बिछिये हमेशा रहते है। फिर चाहे मुझे कोई उल्लू समझे या दकियानूसी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता।  

अब सवाल यह उठता है कि आखिर ऐसी कौन सी वजह हो सकती है। जिसके कारण लोग खुद को हमेशा जवान और अविवाहित अर्थात कुँवारा दिखाना चाहते है। तो मेरे विचार से पूरी ज़िंदगी जवान और खूबसूरत दिखने की चाह इंसान के अंदर मरते दम तक विद्धमान रहती है और शायद कुछ हद तक पुरुषों की तुलना में महिलाओं में यह चाह ज़रा ज्यादा ही रहा करती है। मगर इसका मतलब यह नहीं कि पुरुषों में सदा जवान दिखने या अविवाहित दिखने की चाह नहीं होती। उनमें भी यह चाह कूट-कूट कर भरी होती है। इसलिए यह कहना कि जवान दिखने के लिए कोई भी इंसान बाल रंगने से लेकर पहनावे तक कुछ भी कर सकता है तो उसमें कोई अतिशियोक्ति नहीं होगी। क्योंकि जहां तक इस मामले में किसी भी इंसान का जितना वश चलता है हर कोई उतना ही जवान दिखने का प्रयास करता है फिर भले ही उस इंसान का मन खुद को जवान महसूस करे, न करेमगर तब भी वह इंसान तन से जरूर जवान दिखने की भरपूर कोशिश जरूर किया करता है। फिर चाहे वह कोई महिला हो या पुरुष। 

क्यूँ? क्योंकि सीधी सी बात है भेड़ों में शामिल होने के लिए सियार को भेड़ का रूप तो धारण करना ही पड़ेगा ना बस वैसा ही कुछ हाल उन लोगों का भी है जो विवाहित होते हुए भी खुद को कुँवारा अर्थात अविवाहित दिखाना चाहते है या फिर अधेड़ होते हुए भी खुद को जवान दिखाना चाहते है और जो लोग खुद को अविवाहित दिखाना चाहते है उनकी इस सोच के पीछे मुझे तो केवल एक मात्र कारण यही समझ आता है, कि यदि उन्होंने अपने सुहाग चिन्हों के माध्यम से यह जाहिर कर दिया कि वह अविवाहित नहीं विवाहित है। तो फिर कोई और जवान व्यक्ति अर्थात कुँवारा व्यक्ति उनकी और देखेगा भी नहीं जिसके कारण उनकी शान में कमी आ जायेगी, सब उन्हें उम्र दराज़ समझने लगेंगे जो उन्हें क़तई मंजूर ना होगा। लेकिन इस मामले में पुरुषों की चाँदी है क्योंकि इस पुरुष प्रधान समाज ने सारे सुहाग चिन्ह केवल औरत के लिए ही बनाए है और न सिर्फ बनाए है बल्कि उन्हें धर्म से जोड़कर सभी नारी जाती के लिए अनिवार्य भी करार दे दिया गया है। यहाँ इस बात से मुझे आपत्ति है।

माना कि इन सब चिन्हों को लगा लेने से, या पहन लेने से आप किसी कि ज़िंदगी में आने वाले मौत रूपी काल को रोक नहीं सकते। क्योंकि होनी को कोई नहीं टाल सकता है। जो होना है, वह होकर ही रहता है। फिर आप चाहे कितने भी सुहाग चिन्ह को अपने ऊपर लादे रही हैं। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। लेकिन तब भी यदि यह बात महिलाओं को ध्यान में रखकर धर्म से जोड़ी गयी है। तो इसे पुरुषों पर भी लागू किया जाना चाहिए था। मगर हाय रे यह पुरुषों का अहम और खोखला दिखावा इन्हें अपनी ऊपर ही भरोसा नहीं इसलिए अपनी अर्धांगिनी की सुरक्षा के लिए खुद ही यह नियम बना दियाकि जो कोई भी महिला विवाहित है उसके लिए यह सुहाग चिन्ह अपने ऊपर सजाना साँस लेने से भी ज्यादा अनिवार्य है ताकि कोई पर पुरुष उस पर अपनी गंदी नीयत न डाल सके।

मगर आज की तारीख़ में ऐसा नहीं है आज महिलायें पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर चल रही है इसलिए यदि पुरुष अपने विवाहित होने का कोई प्रमाण लेकर नहीं चल सकते तो भला हम महिलाएं क्यूँ चले। मगर यहाँ बात अहम के टकराव की नहीं कुछ हद तक संस्कृति, परंपरा और सुंदरता यहाँ तक की बहुत हद तक सुरक्षा की भी है। क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि एक लड़की चाहे कितनी भी खूबसूरत क्यूँ न हो, मगर यदि वह विवाहित है तो बिनासिंदूरबिंदीमंगलसूत्रचूड़ियों और बिछिये के उसका सौंदर्य हमेशा अधूरा ही लगेगा। ऐसा मुझे लगता है हो सकता है आप सब मेरी इन बातों से सहमत ना भी हों लेकिन तब भी मैं इतना जरूर कहूँगी कि "सुहागिन के सर का ताज होता है, एक चुटकी सिंदूर" क्योंकि यह अपने आप में सिर्फ एक मात्र सुहाग की निशानी ही नहीं बल्कि आपसी प्रेम और विश्वास का रंग भी लिए होता है। जो न सिर्फ बुरी नियत रखने वाले लोगों से आपकी सुरक्षा ही करता है। बल्कि आपके सौंदर्य में चार चाँद भी लगता है यही एक चुटकी सिंदूर.....इसलिए इसका सम्मान करने के साथ–साथ इसको पूरे दिल से अपनाये... इसमें कोई नुक़सान नहीं उल्टा आप ही का भला है। जय हिन्द.....
आप सब मेरा यह आलेख ज़ी न्यूज़ के इस लिंक पर जाकर भी पढ़ सकते है। धन्यवाद    http://zeenews.india.com/hindi/news/ज़ी-स्पेशल/विवाहित-होकर-भी-अविवाहित-दिखने-की-होड़/138460 

67 comments:

  1. वरिष्ठ ब्लोगर डा.श्रीमती अजित गुप्ता ने भी इसी विषय पर एक लेख लिखा था, http://sahityakar.com/wordpress/%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%A4-%E0%A4%AF%E0%A5%81%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%82-%E0%A4%86%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%B0-%E0%A4%85%E0%A4%B5/

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  2. आपने बहुत अच्छा लिखा है पल्लवी जी ....
    मुझे लगता है ...समाज की रचना हुई ही सबसे पहले स्त्री को संरक्षण देने के लिये है ....जब घर की स्त्री को संरक्षण मिलता है ...तब वो परिवर के हर पुरुष को स्नेह और वही संरक्षण देती है ...और इस प्रकार परिवार की सुचारू नींव पड़ती है ...यदि स्त्री का मन असुरक्षा की भावना लिये हुए है तो पूरे परिवार मे एक अजीब सा महौल हो जाता है |मेरे हिसाब से स्त्री ही घर,परिवार ,समाज ...सभी का स्तम्भ है |परिवार चलाने के लिये कुछ बंधनों मे बंधना अनिवार्य हो जाता है ....चूड़ी ,बिंदी आदि द्योतक हमें सर्वदा याद दिलाते रहते हैं कि हम एक सीमा से बंधे हैं ...
    शायद आपको पता हो ...ब्रह्मणों मे जब जनेयु होता है तो कुवाँरे ब्रह्मण के जनेयु के धागे कम रहते है ...ब्याह के वक़्त द्वारचार के बाद दुर्गा जनेयु की रस्म होती है जिस्मे जनेयु के धागे पत्नी के नाम के और पहनाये जाते हैं |पर अब तो बंधन मे रहना कोइ चह्ता ही नहीं हैं ....आज़ादी चाहिये सबको ...

    बहुत सुंदर आलेख है ...सुबह सुबह एक सोच दे गया ....
    आभार ...

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  3. This comment has been removed by the author.

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  4. http://ajit09.blogspot.com/2011/06/blog-post_28.html?showComment=1309240140830#c8675646854498116078

    this is the correct link

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  5. reasons
    1 many countries dont permit woman workers / employees to wear bindi / jewelry etc heathrow airport i think is one of them
    2 many woman dont believe in carrying the "tag" of being married on their head because most do this for the purpose of socially acceptable rituals
    3 suhaag ki nishani and age has no relevence because in many countries woman marry even at a age of 50 where as in india its a taboo
    4 sindur and bindi are harmful for skin and can cause cancer when used at same place again and again so its important to remain healthy , woman in past were not educated and could not understand the importance of health
    MY QUESTION
    WHY DO WOMAN ALWAYS WANT TO SHOW OFF THEY ARE MARRIED
    WHY DO THEY WANT TO REMAIN PROTECTIVE UNDER THE SO CALLED SUHAG SYMBOLS

    DOES THIS MEAN THAT WOMAN MARRY FOR SOCIAL PROTECTION ONLY ????

    and above all
    are married woman dolls that they need to be decked up and KEEP LOOKING BEAUTIFUL ALWAYS
    why should beauty be associated with woman why not intelligence / hard work and other things

    what are the symbols for those

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  6. @सुहागिन के सर का ताज होता है, एक चुटकी सिंदूर" क्योंकि यह अपने आप में सिर्फ एक मात्र सुहाग की निशानी ही नहीं बल्कि आपसी प्रेम और विश्वास का रंग भी लिए होता है। जो न सिर्फ बुरी नियत रखने वाले लोगों से आपकी सुरक्षा ही करता है। बल्कि आपके सौंदर्य में चार चाँद भी लगता है।

    आपसे अक्षरश: सहमत, बहुत ही अच्छी पोस्ट लिखी है आपने। आभार

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  7. Dear Pallaviji I totally disagree with you .संस्कृती और परम्पराको मानना और उसका आदर करना बहुत अच्छी बात है! पर आपको नहीं लगता हमारे देश में लड़के और लडकियोको के पालन-पोषण में जमीं आसमान का फर्क है ..... जहा लड़की को हमेशा ही गुलाम/डर के रहने की तालीम दी जाती है वह लडको को हर बात की छुट है .... यही कारन है की बचपन से उनके मन पे गोदा जाता है की ये सब सुहाग की निशानी है .... जब सुहाग नहीं रहे तो जिंदगी बेमानी है ...क्यू? और यही बात है की माथे से बिंदी भी उतर जाये तो विवाहित औरतो को बुरा लगता है .... क्या ये दिल की सोच है या एक साचे की घडावत है ?
    विवाह एक पवित्र बन्धन है पर वो दिखावे से जादा मन से मनाना चाहिए! जब आप विदेश में रहते हो तो अलग दिखने से जादा अपनी संस्कृती को संजोये रखकर अपने बच्चो को वो संस्कार (ना की सज सज्जा ) हिरासत में देना देना आपका फ़र्ज़ होता है लेकिन संस्कृती के नाम पर गलत बाते आने वाली पीढ़ी को देना कहा तक सही है ? The world is totally changing moving with change is practical perspective.

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  8. खूबसूरत दिखना , सिंदूरी सौंदर्य बिखेरना - सहज स्वाभाविक बात है . पर यह अविवाहित दिखने की इच्छा - राज क्या है ?

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  9. पल्लवी सुहाग चिन्हों को पहनना या ना पहनना किसी का निजी निर्णय है ...वैसे जब आप परिवार के साथ होते है तो यह निजी नहीं रह जाता

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  10. I am also agree with you mam ... मैंने तो पहले ही लिखा है की यह सब अपनी-अपनी सोच और मान्यता पर आधारित बातें हैं लेकिन मेरा कहना तो बस इतना था की यदि विवाह वाकई एक पवित्र बंधन है और इस रिश्ते को हकीकत में दिखावे से ज्यादा दिल से मानना चाहिए तो फिर मान्यता में छुपाव कैसा ? अर्थात आप विवाहित है तो दर्शाने से परहेज क्यूँ ?? हाँ मैं यह नहीं कहती कि आप सब कुछ करो। मैं खुद भी नहीं करती मगर हाँ एक आद सुहाग चिन्ह का प्रयोग तो किया ही जा सकता है। रही बात विदेश में रहकर संस्कृति को संजोय रखते हुए अपने बच्चों को वो संस्कार विरासत में देना जो हमारी संस्कृति है, तो वो केवल आप ज़बानी बोलकर नहीं दे सकते। उन संस्कारों को देने के लिए आपको स्वयं भी उन संस्कारों का पालन करना होगा। क्यूंकि बच्चे जो/जैसा देखते है आगे चलकर वैसा ही करते है। माना कि दुनिया बदल रही है और दुनिया के साथ-साथ वक्त, सोच और परम्पराएँ भी बदल रही है। मगर इसका मतलब यह तो नहीं कि हम अपनी संसकृतिक, सभ्यता और परम्पराओं एवं मान्यताओं को भूल ही जायें। बरहाल यह तो महज़ एक पोस्ट है किन्तु आप मेरे ब्लॉग पर आयीं और आपे महत्वपूर्ण विचारों से मुझे अनुग्रहित किया उसके लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया कृपया यूं ही संपर्क बनाये रखें आभार :-)

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  11. मैंने यह कब कहा कि हमेशा औरत को खूबसूरत ही दिखना चाहिए मेरे कहने का मतलब तो बस इतना था कि यदि आप विवाह को वाकई दिखावे से ज्यादा दिल से मानते है तो फिर दिखाने से परहेज क्यूँ ? फिर चाहे वो नारी हो या पुरुष मगर हमारे समाज में पुरुषों के लिए ऐसे कोई सुहाग चिन्ह बने ही नहीं है कि पता चल सके कि वह विवाहित हैं या नहीं रही बात केंसर कि तो आप ने सही कहा ऐसा हो तो ज़रूर सकता है मगर शायद 100 में एक केस वरना अभी तक तो हिंदुस्तान कि आधी आबादी ऐसे ही कम हो गई होती। और जो आपने महनत और बुद्धिमत्ता की बात कही है तो उसके लिए मैं यह कहूँगी कि इन सब चीजों को देखाने के लिए कोई प्रमाण नहीं है यदि यह सब चीज़ें सुहाग चिन्हों कि भांति दिखाई जा सकती तो मैं तो कहूँगी वो भी ज़रूर दिखाना चाहिए। अन्तः बस इतना कहना चाहुगी कि इस बार मैं आपकी कही एक भी बात से सहमत नहीं हूँ।

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  12. aap ne jo bhi likha vo sahi hai mai bhi aap ki tarah videsh mai rahti hu par maga mai sindura ,pava mai bichiya or hatha mai kacha ke kade pahnati hu or mujhe acha bhi lagata hai .

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  13. क्‍या बहस करना इन बातों पर.

    जि‍यो और जीने दो.

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  14. पल्लवी जी
    अपने नीजि विचार रख रह रही हूं सभी सहमत और असहमत हो सकते है | चूड़ी, बिंदी, बिझिया पायल इन सभी चीजो को आप ने सुहाग की निशानी और भारतीय परंपरा संस्कृति के साथ जोड़ा है और इसे लगाने को हर विवाहित स्त्री के लिए जरुरी बताया है तो क्या आप इस बात को भी सही मानती है की एक विधवा महिला को ये सारी वस्तुओ का धारण नहीं करना चाहिए क्योकि उसके पति की मृत्यु हो गई है और ये सब सुहाग की निशानी है | हमारी परम्परा तो बहुत कुछ कहती है उसके हिसाब से तो पति के मर जाने के बाद किसी स्त्री का जीवित रहना भी गलत है उसे तो सती हो जाना चाहिए नहीं तो जीवित रहते हुए भी उसे बिल्कुल सादा जीवन जीना चाहिए और फिर से विवाह की बात तो सोचनी भी नहीं चाहिए | ये मान कर चल रही हूं की आप इन सब चीजो पर विश्वास नहीं करती होंगी आप के लिए ये रुढ़िवादी विचार होगा और आप मानती होंगी की एक विधवा स्त्री को भी अपना जीवन सज कर सवर कर अपनी मर्जी से जीने का उतना ही अधिकार है जितना किसी अन्य को | तो बताइये की ये लक्ष्मण रेखा कौन खिचेगा की क्या रूढ़िवादिता है और क्या परम्परा किसका पालन सभी को करना चाहिए और किसे रुढी मान कर छोड़ा देना चाहिए | हम कोई भी बात अपने पर लागु कर सकते है पर ये नहीं कह सकते है की दूसरे ये नहीं करते है तो वो गलत है या उनके सोचने का तरीका गलत है | ये सब चीजे सुहाग की निशानी नहीं है ये बस महिलाओ लड़कियों के सजने सवरने का साधन मात्र है , जिसे कोई भी लड़की, स्त्री खुद को सुन्दर दिखने के लिए धारण कर सकती है जब वो चाहे ना की कोई सुहाग की निशानी | ( हमारी पड़ोसी की २५ साली की अविवाहित बेटी तो बिझिया भी पहनती है और एक पैर में पायल भी कहती है नया फैशन है कल को चला जायेगा तो उतर फेका देगी ) फिर कश्मीर से कन्या कुमारी तक तो हमारे देश में सुहाग की हजारो निशानिय है सभी जगह अलग अलग किसे धारण करे और किसे छोड़े | जैसा की आप भी मान रही है की पुरुषवादी सोच ने इसे जानबूझ कर विवाह से जोड़ा है ताकि स्त्रियों को इन लादे हुए गहनों से सदा याद रहे की यो किसी की पत्नी है और उनके लिए खिची गई तमाम उल जुलूल लक्ष्मण रेखाओ के बाहर ना जाये और एक विधवा के हमेसा याद रहे की वो एक विधवा है ओए उसे एक सादा जीवन जीना है ये सोचते हुए ही वो अपशकुनी है अशुभ है और ये वैधव्य उसे उसके पाप के कारण मिला है वो भी अपने दायरे से बाहर ( पुरुषो की मुठ्ठी उनकी सत्ता से बाहर ) ना जा सके |

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  15. अब आते है अविवाहित दिखने की होड़ की तो बता दू की मै भी कोई भी "सुहाग" की निशानी धारण नहीं करती हूँ पर मुझे अच्छे से याद है की मैंने कभी भी अविवाहित दिखने के लिए या इस सोच के कारण इन सब को नहीं त्यागा ( असल में कभी अपनाया ही नहीं ) मै नहीं मानती हूँ की लम्बा सा सिंदूर ( वैसे आप को बता दू मै यूपी से हूँ और सिंदूर नारंगी रंग वाले को कहते है और लाला वाले को एंगुर कहते है और विवाह के समय सिंदूर लगाया जाता है और परंपरा उसे ही लगाने की है किन्तु शायद है कोई उसे लगता होगा कुछ गांवो की महिलाओ को छोड़ कर ) लगाने से मेरे पति की आयु लम्बी होगी , बिझिया पहनने से घर में सुख और शांति होगी , क्योकि मै जानती हूँ की जिनको पहनते देखा है उनके यहाँ भी ये सब नहीं है | रही बात बाहर वालो से सुरक्षा तो मुझे आप की इस बात पर आश्चर्य हो रहा है क्या आप ये कहना चाहती है की विवाहित महिलाओ से छेड़छाड़ नहीं होता उनके साथ बलात्कार नहीं होता ये कही से भी मानने वाली बात नहीं है इस बात को आप फिर से जाँच ले | जहा तक बात विवाहेतर संबंधो की है तो दो इंची का सिंदूर ना आप को और ना किसी और को आप से सम्बन्ध बनाने के लिए रोक सकता है ये आप की सोच व्यवहार पर निर्भर है | एक विवाहित स्त्री का व्यवहार ही आप को कई बार उसके विवाहित होने का पता बता देता है और उसे ये भी पता चल जाता है की किस पुरुष को अपना परिचय सिर्फ नाम से देना है और किसे ज्यादा सतर्क हो कर श्रीमती के साथ बताना है |

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  16. मेरी राय यह है कि विवाह के बाद स्त्री को सुहागिन होने की दी गई निशानियाँ कई अर्थों में स्त्री ग़ुलामी की ही निशानियाँ हैं. बाकी- ख़्याल आपना-अपना.

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  17. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार (12-062012) को चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  18. anshumala ji,जिस तरह आपने आज इस विषय पर अपने विचार यहाँ रखे उसे मुझे बहुत खुशी हुई लगा लिखना सफल हो गया। मैं खुद आपकी कही कुछ बातों से सहमत हूँ। मैंने यहाँ यह ज़रा भी नहीं कहा की यह सब सुहाग के चिन्ह माने जाते है तो केवल एक सुहागन स्त्री को ही इसका प्रयोग करना चाहिए, और ना ही मैंने किसी के साथ कोई ज़ोर ज़बरदस्ती करते हुए इन सब चीजों का प्रयोग करने पर ज़ोर डाला है। बल्कि मैंने तो पहले ही कहा है कि यह सब सबकी अपनी मान्यताओं और सोच पर निर्भर करता है रही बात विधवाओं की तो मैंने तो उनका ज़िक्र तक नहीं किया न ही मैं ऐसा कुछ मानती हूँ कि विधावा स्त्रियॉं को सुंदर दिखने का या श्रिंगार करने का कोई अधिकार नहीं है। रही बात इस सब के बीच लक्ष्मण रेखा खींचने की बात तो वो भी हमे अर्थात हमारे समाज को ही करनी होगी क्यूंकि हम समाज में रहते है और समाज, हम और आप जैसे लोगों से ही बना है। खैर अब बात आती है सुरक्षा की तो मैं क्या अद्धी से ज्यादा महिलाएं यही सोचती है, कि अगर वो सिंदूर और बिंदी के साथ सड़क पर निकल जायें तो सामने वाला कुछ भी कहने से पहले एक बार सोचेगा ज़रूर...बाकी रही बात की छेड़े बिना नहीं रहेगा तो वो उसकी मानसिकता है। अन्तः बस इतना कहना चाहूंगी कोई भी चीज़ फिर चाहे वो श्रिंगार प्रसाधन ही क्यूँ हो यदि मर्यादा में रहकर किया जाये तो शोभनीय लगता है और यदि मर्यादा से बाहर हो जाये तो अपने आप ही अशोभनिये बन जाता है फिर चाहे वो श्रिंगार हो या किसी के प्रति आपका व्यवहार तो जितना हो सके हर व्यक्ति को स्वयं को मर्यादा में रहते हुए ही जीवन यापन करना चाहिए। वरना कहने को तो राम राज में भी राम और रावण दोनों ही थे। और आज भी हैं हमे स्वयं अपने व्यवाहर और अपने चरित्र पर ध्यान देने की जरूरत है। बाकी तो जो होना है उसे तो कोई रोक ही नहीं सकता वो तो होकर ही रहता है।

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  19. खैर अब बात आती है सुरक्षा की तो मैं क्या अद्धी से ज्यादा महिलाएं यही सोचती है, कि अगर वो सिंदूर और बिंदी के साथ सड़क पर निकल जायें तो सामने वाला कुछ भी कहने से पहले एक बार सोचेगा ज़रूर

    phir to vivahit avivahit vidhvaa sabko sindur lagaa hi lena chahiyae sarkaar ki sab samsyaa khatam

    par aap kyuki videsh mae haen aur wahaan sindur lagi mahila ko vivahit maan kar avshay log yae sochtey haen " no point , they are married "

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  20. पल्लवी जी
    आप का शीर्षक है की
    "विवाहित होते हुए भी अविवाहित दिखने की होड़"

    शीर्षक से लगता है की आप चीजो को गलत रूप में देख रही है | किसी चिन्ह का ना लगाना कभी भी अविवाहित दिखने की इच्छा नहीं होती है बात है उन चीजो पर विश्वास की सहूलियत की जैसा की आप ने बाद में कहा है जब विश्वास ही नहीं है तो उनके करने का कोई अर्थ ही नहीं है पर इसके बीच में अविवाहित दिखने की होड़ वाली बात कहा से आ गई | पहले महिलाए बहुत कुछ सह लेती थी किन्तु अब वो बिझिये की चुभन को बर्दास्त करने के लिए तैयार नहीं है सब कहते है पहले होता है बाद में नहीं किन्तु उन पहले के कुछ साल भी हम क्यों उस चुबन को सहे हा जिनमे विश्वास है और जो वो करना चाहती है ख़ुशी से करे शायद ही कोई उन्हें ऐसा करने से मना करता हो शायद ही कोई उन्हें इन चीजो के लिए टोकता हो फिर ना करने वालो पर इस तरह के आरोप क्यों की वो विवाहित होते हुए भी अविवाहित दिखना चाहती है या वो चाहती है की दूसरे पुरुष उनको देखे क्या वाकई ये सारी सुहाग की निशानिय लगाने वाली स्त्री ये चाहती है की पति के अलावा कोई उसे देखे ही नहीं कहने का अर्थ है कि कोई भी स्त्री नहीं चाहती है कि कोई भी पुरुष उसे घूरे या गलत नजर से देखे | छेड़ने वाला और बलात्कारी ख़राब मानसिकता के ही होते है और उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता है की स्त्री विवाहित है या अविवाहती फिर उस जगह पर सुहाग की निशानी हमारी क्या रक्षा करेगा बाकि अच्छे लोगों के लिए तो मैंने कहा ही की स्त्री खुद अपने व्यवहार से बता देती है की वो विवाहित है या अविवाहित फिर ये निशानिय आप कि किस जगह पर और किससे रक्षा करती है | आज सुन्दर दिखने के पैमाने बदल गये है आज के नये फैशन में सुन्दर दिखने के लिए इन चीजो की जरुरत नहीं होती है तो फैशन और सुन्दर लगने के लिए भी कोई इन्हें धारण नहीं करता है हा जब हम सभी शादी विवाह आदि में भारतीय कपडे पहनते है तो उन चीजो को जरुर पहनते है क्योकि ये सब उन्ही के साथ सूट करते है वहा भी महिलाए ऐसा ही करती होंगी | विधवा वाली बात आप ने नहीं कही मै बातो का मतलब समझाने के लिए इनकी बात की कि किस बात को रुढी कहा जाये और किसे परंपरा इसलिए मैंने पहले ही कहा कि आप इसे नहीं मानती होंगी |

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  21. इस विषय पर पहले भी कई पोस्ट्स लिखी जा चुकी हैं. और इस लेख की विचारधारा से मै तो सहमत नहीं हूँ.
    अंशुमाला से पूर्णत: सहमत.

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  22. यह एक कभी न ख़त्म होने वाला मुद्दा है...:-).जाने क्यूँ अब आपका कमेंट पढ़कर लग रहा है शायद कोई गलतफेमि हो रही है हमारे बीच, या फिर शायद मैंने लिखा अर्थ है मगर लग रहा अनर्थ है। खैर अपने कहाँ मेरी पोस्ट के शीर्षक से ऐसा लगता है कि मैं चीजों को गलत ले रही हूँ तो यहाँ में यह कहना चाहूंगी कि जो होड वाली बात मैंने कही है वहाँ मैंने यह भी लिखा है कुछ भेड़चाल जैसा हिसाब किताब है लोग दूसरों को देख-देख ही अपने आप में बदलाव लाते है फिर चाहे वो बदलाव उन पर सूट करे या न करे उन लोगों को लेकर मैंने यह लिखा था कि चिन्ह न लगाने के पीछे यह कारण हो सकता है, जहां तक बात सहूलियत कि है तो मैंने यह थोड़ी न कहा कि आपको असूहीलय हो रही है तब भी आप बिछिये पहनो ही सही। वहाँ मेरे कहने का मतलब था कि बिछिये में यदि आपको असूहीलियत महसूस होती है तो आप किसी और चीज़ का चयन भी तो कर सकते है, मगर लोग वो भी नहीं करते कुछ इच्छा से तो कुछ देखा देखि अब बात आती है कि पहले औरतें बहुत कुछ सह लिया करती थी। तो यहाँ में कुछ प्रतिशत सहमत हूँ और कुछ प्रतिशत नहीं क्यूंकि मेरा ऐसा माना है कि यह ज़रूरी नहीं कि पहले औरतें जो कुछ भी करती थी वह केवल सहन करने के लिए ही किया जाता था ऐसा बिलकुल नहीं है कम से कम मैं तो नहीं मानती बाकी तो सोच अपनी-अपनी ....अब रही बात आरोप कि तो पहली बात मैंने यह पोस्ट किसी पर आरोप या प्रतयारोप लगाने के लिए नहीं लिखी बस जो अपने आस-पास के लोगों के बीच अनुभव किया खासकर प्रवासी भारतीय लोग के बीच वही लिखा। रही बात विवाहित दिखने दिखाने कि तो जिस तरह कोई इन सब चीजों को माने वाले व्यक्ति को नहीं रोकता, उसी तरह न माने वाले व्यक्तियों को भी कोई नहीं रोकता। बात बस मान्यता कि है, आप क्या मानते हो। मगर मेरा प्रश्न तो केवल यह था कि यदि आप विवाहित हैं तो दिखाने से परहेज़ क्यूँ करते हैं जबकि आज भी किसी भी इंसान के दिमाग में जब कभी एक हिन्दुस्तानी नारी कि छवि आती है तो ज़्यादातर इन सब चीजों से सजी सुंदर स्त्री की तस्वीर ही उभर कर आती है फिर चाहे वो इंसान भारतीय हो या कोई विदेशी अंग्रेज़ बाकी रही बात बलात्कारी और घ्राणित मानसिकता वाले लोगों कि तो उनका क्या है वह तो आज के जमाने में पुरुषों को भी नहीं बाक्षते तो हम तो फिर भी नारी है लेकिन आपने देखा होगा आज भी घरेलू परिवार में जब कोई लड़की घर से बाहर अकेले कहीं आना जाना चाहती है और उस वक्त यही उस घर में कोई पुरुष नहीं है तो उसकी माँ को यही लगता है कि उसके साथ उसकी भाभी या माँ स्वयं साथ हो क्यूँ ? क्या वह स्त्रियाँ नहीं है ? नहीं!!! वहाँ भी मेरे विचार से सोच वही है जो मैंने लिखना चाहा, बाकी तो मैंने और आपने हम दोनों ने ही लिखा ही है कि सुंदर दिखने के पैमाने बदल गए है। फिर क्या परदेस और क्या अपना देश in total बात केवल अपने-अपने नज़रिये की है एक बार फिर कहना चाहूंगी मानो तो भगवान वरना पत्थर ही है :)

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  23. न जाने क्या होड़ लगी है,
    किन लक्ष्यों पर दौड़ लगी है..

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  24. प्रश्न और भी हैं - सुहागिन (महिलाओं) के लिए ही ज्यादातर सुहाग चिह्न क्यों हैं?

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  25. yes after reading your comments i could understand that the center point of the post is the behavior pattern of indian married woman settled abroad

    according to you such woman who are indian and settled abroad try and project themselfs as unmarried and dont wear any thing which announces their married status

    in other countries woman wear ring { band } on finger which denotes they are married , but there , their husbands also do the same . the couple happily flaunts their married status

    indian woman abroad , when they are married , are safe because they have many symbols on them like bindi , bichhiyaa , sindur so on so forth . they are safe from man of the resident country because indian woman image जबकि आज भी किसी भी इंसान के दिमाग में जब कभी एक हिन्दुस्तानी नारी कि छवि आती है तो ज़्यादातर इन सब चीजों से सजी सुंदर स्त्री की तस्वीर ही उभर कर आती है फिर चाहे वो इंसान भारतीय हो या कोई विदेशी अंग्रेज़

    you might be having such experience there and when i travel abroad i also feel woman who wear sari / suit are treated differently then those who wear western outfit

    the basic reason being that INDIAN WOMAN ARE THOUGHT TO BE CONSERVATIVE BY NATURE


    all the readers here who have given long comments including me would have surely reacted different had you explained the context in the begning of the post

    you can check the link given by sanjay and me which is what we all thought you were also writing same thing

    anyways discussions always open our thoughts
    keep writing but be a little more clear to avoid confusion

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  26. विवाहित होते हुए भी अविवाहित दिखने की होड़............हर किसी की अपनी अपनी पसंद हैं ...

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  27. अरे अविवाहित दिखने की नहीं...जवां दिखने की होड ज़रूर है..................
    :-)

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  28. जबकि मेरा तो ऐसा मानना है, कि भीड़ में अलग दिखना ज्यादा दमदार बात है।
    बात केवल अपने-अपने नज़रिये की है .... एक बार फिर कहना चाहूंगी मानो तो भगवान वरना पत्थर ही है ....

    बिलकुल सही .... सहमत हूँ आपसे ....

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  29. VASTAV ME KAI BAR SUVIDHA KE ANUSAR BAHUT SARI BATON KO PICHE CHODNA PADTA HAI ....AUR AK BAT AVASHAY KHUNGI MANO TO DEV NHI TO PATHAR....

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  30. चर्चा में कई सरे विचारो से अवगत हुआ . लेकिन एकमत राइ नहीं बन सकी वहां . विषय ही ऐसा है . सुन्दर चर्चा आयोजन .

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  31. pallvi ji
    bahut hi sarthak lekh likha hai aapne .
    aaj kal to ye ssri cheejen jaise panvo me bichhue na panna maang me sidu na lagana aadi
    -aadi sab ek maatr faishon ban kar rah gaya hai .pata hi nahi chalta ki kuon vivahit hait aur koun avivahit.
    jabki mujhe to ye saari chhijen bahut hi achhi lagti khas kar puja -paath ya tyohaar me .vaise mere bhi yahi manahai ki sada jivan -uchch vichhar .main faishon se dur hi rahti hun.sadgi mujhe pasand hai par is mamle me nahi---
    bahut bahut hi achha aalekh
    dhanyvaad sahit
    poonam

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  32. aapka lekh accha laga. par mera dil bhi is baat ko nahi manta ki suhag chinha ka prayog karna jaroori hi hai ya kisi se jabarjasti karwaya jana chahiye. haan main karti hu jyada kuch nahi karti ya jeans sanskruti ke karan kar nahi paati par bichiya pahanti hu aur hath me kada bhi.par sab samay aur paristhti ke anusaar .sari pahanti hu to duniya bhar ke saare shringaar/suhag chinha use karti hu. wese ye sabki apni niji soch hai kyunki mera itna karna bhi kai logo ke lie bahut kam hai aur kuch log hai jinhe ye bhi odd lagega.ye meri apni bhawnaein jo nibha sakti hu nibha leti hu jo nahi kar paati theek hai.

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  33. ek chutki sindur ka mol tum kya jano.......:)
    waise ek vivahit stri sindur ke sath hi khubsurat deekhti hai..

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  34. आपकी बात से सहमत हूं ... बहुत ही सार्थक एवं सटीक लिखा है आपने ...

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  35. शीर्षक से विषय कुछ भटक गया है - यहाँ पर होना चाहिए सुहाग चिह्नों के प्रति विश्वास या उनका औचित्य . विदेश में जब वेशभूषा बदल जाती है तो ये चिह्न भी बेमानी हो जाते हें. मेरे परिवार के कई लोग यु एस में बसे हुए हें और वे साड़ी कभी कभी ही त्यौहार या किसी खास मौके पर ही पहनती हें और जब पहनती हें तो वे सिन्दूर चूड़ियाँ, बिछिये सब पहनती हें. शुद्ध भारतीय रूप में . जब वे पाश्चात्य वेशभूषा में होती हें तो ये भारतीय परंपरा से जुड़े सुहाग चिह्नों को उसके साथ तादात्म न हो पाने की दलील देते हें. मुझे भी विवाहित लड़की या बहू सुहाग चिह्नों के साथ ही अच्छी लगती है लेकिन परिधान भी वही होना चाहिए. ये पीढ़ी के बदलने के साथ सोच भी बदल रही है, आज की पीढ़ी इसको अहमियत तो देते हें लेकिन उसको पूर्वाग्रह के रूप में नहीं लेते हें. वे जब कहीं खुद को विशेष मौके पर प्रजेंट करती हें तो पूरी भारतीय रूप में. सभी धर्मों में सुहाग चिन्हों की अनिवार्यता नहीं होती है लेकिन विवाहित होना एक अहसास है. जो कुछ धार्मिक परम्पराओं के पूरा होने के साथ ही मन में पैदा होता है.

    विवाहित और अविवाहित दिखने का तो नजरिया अलग है. इसके पीछे छिपे मनोविज्ञान को अगर देखा जाय तो यही है , पुरुष के अपनी ओर आकर्षित होने या फिर तारीफ सुनने की मनोवृत्ति सभी में होती है. हाँ कहीं यह पति से सुनने तक सीमित होती है और कहीं अपने कार्यक्षेत्र से लेकर और भी देखने वालों की नजर से सुनना और देखना चाहती हें. अपने घर वालों के सामने या पति के सामने ये कहते सुना है - कोई विश्वास ही नहीं करता कि मैं शादीशुदा हूँ. तो खुद को युवा दिखने की या उम्र से कम दिखने की लालसा के बारे में तो नारी वैसे ही बदनाम है कि उसकी उम्र कभी नहीं पूछनी चाहिए ऐसे ही उसके विवाहित या अविवाहित होने की बात कह सकते हैं. कभी स्त्रियाँ अपनी उम्र कम बताती बगैर ये जाने कि उम्र के कम बताने से क्या फर्क पड़ जाता है. ये सारी बाते अपने सोचने की हैं कि विवाहित या अविवाहित होने से बुरी नज़रों से नहीं बचा जा सकता है क्योंकि जिनकी नज़रों में खोट है उन्हें सिर्फ और सिर्फ स्त्री लिंग दिखाई देता है.
    --

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  36. मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ, पल्लवी दी...
    आप अमेरिका की बात कर रही हो..? मैं तो हिंदुस्तान की कहानी कह रही हूँ...यहाँ देल्ही में भी यही हाल है...जो थोडा सिंदूर लगा, माथे पर बिंदिया सजा के घुमे...वो तो गंवार होती है लोगो की नजर में...और तो और पति भी चाहते हैं कि उनकी अर्धागिनी नए स्टाइल में रहे..पर सच में नारी का रंग तो लाल रंग के सिंदूर से ही खिलता है..आपकी एक एक बत से सहमत हूँ सौ प्रतिशत...:)
    बाकी अपने सब लिख ही दिया है...:)

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  37. कारण ढूंढते हुये आपने नब्ज पकड़ी हैं....
    सार्थक चिंतन...सादर।

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  38. अगर हम हिन्दुस्तानी आज विकसित देश के होते तो वो शायद हमारी नक़ल कर रहे होते... बहरहाल आपने बहुत अच्छी पोस्ट लिखी है. जो सुख अपनी जड़ों से जुड़े रहने में है वो कहीं और कहाँ...

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  39. संस्कृति हमें जोड़ती है , उन्नत बनाती है चाहे जो भी क्षेत्र हो और असंस्कृति बिध्वंस की ओर ले जाती है ! झगड़े - फसाद की जड़ है ! सुन्दर लेख ! सोने का रंग कभी नहीं बदलता !

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  40. सुहाग की निशानियाँ, सिन्दूर. चूड़ियां, बिंदी इत्यादि विदेशों में पहनना इतना आसान नहीं है, ख़ास करके अगर आप नौकरी करतीं हैं, ऑफिस वालें नहीं चाहते कि आप लोगों से अलग दिखें..आप ख़ुद भी नहीं चाहेंगी कि आप लोगों से अलग दिखें...ख़ास करके ऐसे देशों में जहाँ कोई किसी को देखता ही नहीं है और अचानक सब आपको घूरने लगें...
    ज्यादातर offices में ड्रेस कोड होता है, अब तो फिर भी यहाँ के लोगों को मालूम हो गया सिन्दूर के बारे में, पहले जब मैं एक दो बार लगा कर गई, पता नहीं कितने लोगों ने टोक दिया you have red mark on your forehead , बिंदी के लिए भी लोग टोकते रहे, चूड़ियों की आवाज़ लोगों को disturb करती हैं..ऑफिस का माहौल बहुत अलग है यहाँ, फिर किसी को भी आपके ऐसे पहनने से परेशानी हो सकती हैं...
    जहाँ तक भावना का सवाल है, ये मन की बात है, ये सारी चीज़ें आप दूसरों को दिखाने के लिए लगातीं है तो बात ही अलग है, वरना भावना शुद्ध होनी चाहिए बस, बालों के अन्दर आप सिंदूर लगा सकतीं हैं और एक दो चूड़ियाँ पहन सकतीं हैं, बिंदी लगाना इतना आसान नहीं, नौकरी करना है तो नियम मानना ही होगा...
    हाँ आप इनको आप अपनी धार्मिक या सांस्कृतिक ज़रुरत की बात की तरह से अपने ऑफिस में कर सकतीं हैं, ऑफिस मान जाए तो बहुत अच्छा है, जैसे मैंने अपनी साड़ी के लिए ले किया था..
    इसमें अविवाहित दिखने जैसी कोई बात नहीं है...

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  41. This comment has been removed by the author.

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  42. सबसे पहले तो आपका तहे दिल से शुक्रिया कि आप आज पहली बात मेरे ब्लॉग पर आयी। रही बात इस विषय कि, तो मैं कुछ हद तक आपकी बात से पूरी तरह सहमत हूँ। मेरे कहने का तात्पर्य केवल यह था कि जितना संभव हो उतना तो किया ही जा सकता है न ? ना मैंने यह कहा कि रोज़ हाथ भर-भर के चूड़ियाँ पहना चाहिए या माग भर-भर के सिंदूर लगाना चाहिए मैं खुद यह सब नहीं करती तो भला दूसरों को क्यूँ नसीहत दूँगी मगर मेरे कहने का मतलब था कि जो सहूलियत के साथ किया जा सकता है कम से कम वो तो हर विवाहित स्त्री को करना ही चाहिए भई शादी के है तो छुपाना क्यूँ यह जुमला उनके लिए जो जान बूचकर चुपाते है कि हम शादी शुदा है जिनकी कोई मजबूरी नहीं है बस दिखावा है मगर हाँ जिनकी मजबूरी है जैसा आपने खुद ही कहा कि यहाँ ड्रेस कोड होता है सभी चीज़ allow नहीं होती मैं सहमत हूँ। मगर मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि आप एक एक कंगन तो पहन ही सकते हैं बिंदी न सही थोड़ा सा या छोटा सा सिंदूर तो लगा ही सकते और भी संभव नहीं तो कम से बिछये तो पहन ही सकते अर्थात जो सहूलियत के मुताबिक आसानी से किया जा सकता है वो तो आप कर ही सकते है न....मगर लोग उतना भी नहीं करते बाकी रही बात दिखावे कि तो यहाँ मेरा मनाना है कि मानो तो भगवान है वरना पत्थर ही है। इसलिए जो लोग लगाते हैं न तो उन्हे यह कहा जा सकता है कि वो दिखावा कर रहे है और न ही जो लोग किसी मजबूरी के चलते नहीं कर पाते उन्हे ही यह का जा सकता है वो खुद को दिखना ही अविवाहित चाहते हैं। मगर मैंने पहले ही लिखा है मैंने उन महिलों कि तरफ इशारा किया था जो एक दूसरे कि देखा देखी यह सब नहीं करती या फिर हम अलग नज़र आएंगे सिर्फ इस डर से नहीं करती। ऐसी महिलाएं न तो भावना को ही महत्व देती है और ना ही उनकी कोई मजबूरी होती है। बस सामने वाला भी यहाँ विदेश में रहकर नहीं करता या नहीं कर रहा है तो हम क्यूँ करें जिसके चलते कहीं हम गवार न लगें या कहलायें सिर्फ इस बेतुकी सोच को लेकर वह कुछ नहीं किया करती।

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  43. कुछ स्पेलिंग मिस्टेक्स हो गयीं हैं इसलिए दोबारा कमेन्ट कर रही हूँ...
    एक बात और जब आप नौकरी लेतीं हैं तो आप कोंट्राक्ट साइन करती हैं कि आप ड्रेस कोड का पालन करेंगी...

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  44. भारत मेन लड़कियों के मन में बचपन से ही इन चिह्नों के प्रति भावनाएं भर दी जाती हैं .... आज जब लड़कियां नौकरी करती हैं तो काम पर जाते हुये इन सबका ध्यान भी नहीं रहता .... वैसे मैं इसे व्यक्तिगत सोच मानती हूँ ... जिसमें जिसकी आस्था हो बस .... रेखा जी की बात से सहमत हूँ ।

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  45. agar hindu dharm ki jar mein ja kar dekha jaye to har dharmik cheej ke peeche koi na koi vaigyanik mat jaroor hota hai, hindu suhag chinhon ke peeche bhi accupressure hai, jaise nak kan chedne se bichuye ,choori aur angoothi pehnne se sharir ke kuch points par pressure padta hai, aur ye swasth ki drashti se thik rehta hai, par aaj jaha videshi yuvtiyan hamari in cheezo ko apna rahe hain wahi ajj ki adhunik hindu so called modern ladkiyan inhe bhoolti ja rahi hain.

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  46. चिंतन का विषय है ...
    शुभकामनायें आपको !

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  47. भई हम इतने समर्थ और विद्वानों की राय से सहमति रखते हैं। हां अगर महिलाओं को कुछ दिखाना पड़ता है तो पुरुषों को भी दिखाना चाहिए।

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  48. पत्थर अपनी जगह भारी होता है
    अपनी संस्कृति का पालन भी अपनी धरती पर होता है .
    विदेश में आदमी आधा तितर आधा बटेर मानकर रह जाता है .

    Please see
    सारी समस्याओं का समाधान पार्ट 1 Solution for every problem
    http://charchashalimanch.blogspot.in/2012/06/1-solution-for-every-problem.html

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  49. सुहागिन के सर का ताज होता है एक चुटकी सिंदूर क्योंकि यह अपने आप में सिर्फ एक मात्र सुहाग की निशानी ही नहीं बल्कि आपसी प्रेम और विश्वास का रंग भी लिए होता है।

    सही लिखा है आपने।

    अविवाहित दिखने की कोशिश करना फैशन की अंधी दौड़ के सिवा कुछ नहीं।

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  50. मुझे तो यह सदा जवान रहने की आकाक्षाओं से जुडा लगता है फिर चाहें वह पुरुष हों या स्त्रियाँ.

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  51. रचना जी! समय के साथ कई विकल्पों ने हमारी परम्पराओं की पवित्रता को नष्ट कर दिया है। बिन्दी और सिन्दूर से कैंसर की संभावनायें कम चर्म रोग होने की अधिक हैं..यह मानता हूँ पर यह स्दा ही ऐसा नहीं था क्योंकि आज की बिन्दी और सिन्दूर रासायनिक हैं। वास्तविक सिन्दूर जो हमारे यहाँ प्रयुक्त होता था वह BIXA ORILLANA के बीजों से निकाला हुआ वनस्पतिक रंग हुआ करता था।

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  52. हम कभी अकेले नहीं होते, कभी परिवार होता है तो कभी समाज। पहनावा हमारी सामाजिक और परिवेशजन्य आवश्यकताओं के अनुसार निर्धारित होता है..इसलिये इसमें समाज और परिवेश के अनुरूप परिवर्तन सम्भव है पर अपनी पृथक पहचान के लिये हमें अपने मूल रिवाज़ों को अपनाना पड़ता है, आवश्यक है यह। इंग्लैण्ड में जाकर हम अपनी भारतीय पहचान कैसे प्रदर्शित करेंगे ? निजता का सम्मान किया जाना चाहिये पर निजता को भी अपनी मर्यादाओं का ध्यान रखना चाहिये।

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  53. अंशुमाला जी ! सिन्दूर सिर्फ़ BIXA ORILLANA के बीजों से निकला एक चूर्ण होता है। जो सिन्दूर अभी प्रचलन में है वह व्यापारियों द्वारा प्रस्तुत किया गया विषैला विकल्प है, उसका रंग सिन्दूरी हो सकता है पर वह सिन्दूर नहीं है।

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  54. सहमत नहीं हूँ। मैंने इज़्राइली लड़कियों को ऋषिकेश में बिन्दी, चूड़ी और बिछिया पहने देखा है।

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  55. हूँ ..मंजूषा जी! तो आपकी बात पर गौर किया जा सकता है। ऑफ़िस में विदेशी घर में स्वदेशी। पर कुछ तो होना चाहिये जो हमारी अपनी पृथक पहचान बता सके। वस्तुतः, ग्लोबलाइज़ेशन के युग में अभी तक कोई अधिकृत सार्वभौमिक ड्रेस कोड नहीं बना है। जहाँ तक मैं समझ रहा हूँ पल्लवी जी की चिंता भारतीय परम्पराओं की गरिमा के संरक्षण को लेकर है,जिसे अनुचित नहीं कहा जा सकता।

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  56. sindoor ,churi yeh sab apne man ki bhavna hai isme sab ka alag mat ho sakta hai.......

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  57. sindoor ,churi yeh sab apne man ki bhavna hai isme sab ka alag mat ho sakta hai.......

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  58. बहुत ही अच्छी पोस्ट ,,,,, ,

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  59. तृप्ति जी! संस्कृति के नाम पर गलत बातें विरासत में दिये जाने के विरुद्ध हैं आप। इस सम्बन्ध में विनम्र निवेदन है कि जो गलत है वह 'संस्कृति' नहीं है, और जो 'संस्कृति' है वह गलत नही हो सकती। 'संस्कृति' 'रूढ़ि' नहीं है, एक सार्थक परम्परा है , समाज के लिये हितकारी है ...उपादेय है। 'संस्कृति' हमारे सामूहिक विचारों और व्यवहारों का परिष्कृत रूप है। विचार हमारे अन्दर का बौद्धिक भाव है जो व्यवहार में प्रकट होता है किंतु यह किसी क्रियात्मक घटना के परिणामस्वरूप ही परिलक्षित हो पाता है। बिना घटना की स्थिति में दूर से विचारों की घोषणा करना मनुष्य का स्वभाव है जिसकी लिये उसे कुछ प्रतीकों का सहारा लेना पड़ता है। विश्व की सभी सभ्यताओं में ऐसा किसी न किसी स्तर पर होता रहा है, आज भी हो रहा है ...कल भी होता रहेगा। इसलिये प्रतीकों की उपेक्षा नहीं की जा सकती। कल्पना कीजिये, सारे प्रतीकों को समाप्त कर दिया जाय तो जीवन कैसा होगा ? करेंसी पर कितने सारे प्रतीक होते हैं, शिक्षा विभाग का अलग प्रतीक है, बैंकों के अपने-अपने प्रतीक हैं, ध्वजों के अपने प्रतीक हैं .....प्रतीक विहीन है क्या? इन्हें समाप्त कर दिया जाय तो विश्व के सारे काम बहुत कठिन हो जायेंगे, बहुत गड़बड़ हो जायेगी। तो हमारे सामाजिक जीवन से सम्बन्धित कोई प्रतीक अप्रासंगिक क्यों मान लिया जाय ? यह बात अलग है कि ब्रिटेन के मौसम के अनुरूप भारतीय परिधान और प्रतीकों को अधिक व्यावहारिक न पाया जाता हो पर प्रतीकों को पूरी तरह महत्वहीन नहीं माना जा सकता। मौसम के अनुरूप उसमें कुछ पारिवर्तन किया जा सकता है ...ताकि सांस्कृतिक परम्परा बनी रहे। ध्यान रहे, संस्कृति और रूढ़ में अंतर है। जो परम्परा औचित्यहीन, अतार्किक और अनुपयोगी है वही रूढ़ है। जब तक उसमें औचित्य, तर्क और उपयोगिता के तत्व बने रहेंगे वह रूढ़ नहीं बल्कि संस्कृति कहलायेगी।

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  60. यदि अविवाहित दिखने की इच्छा है तो यह निश्चित ही दाम्पत्य सम्बन्धों की दुर्बलता और उपेक्षा के साथ-साथ उच्छ्रंखलता का प्रतीक है।

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  61. Ughhhh! What a twisted thinking. I really do not understand people like this blogger, who sit drenched in their holier-than-thou attitude and pass judgement on the rest of the world. A woman wearing or not wearing sindoor is her own business. And whether she wants to wear it in a foreign land is AGAIN her own business. Who are we to pass judgement on her?
    And if all the women living in a foreign land would have smeared sindoor in their heads, I am sure the writer would have been very very happy because then all the women comply to her twisted definition of a perfect bhartiya nari.
    //I feel no matter how beautiful a woman is, if she is married, then without any sindoor, mangalsutra, bangles and bichiye, her beauty is incomplete.
    One word – Bullshit!
    //sindur in itself, is not just a symbol of suhaag, but the colour of mutual love and trust.
    Really? Mutual love and trust? Wait a sec then. It seems I cannot trust my wife because she never puts Sindoor in her head? I should be suspicious about her activities because she might be trying to attract men by not showing off that she is married?
    Please read the comments here also - indianhomemaker.wordpress.com/2012/09/07/when-married-indian-women-strive-to-look-unmarried

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  62. 100% sindoor ke peeche toxic chemicals and cancer hai :-)

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  63. My Question is :why do you want to show exclusively you are married .If you know you are married and committed to your relationship, is it required to show?

    Why men hide they are married , why dont they show by some symbol , do you mean they strive to show they are not married by not putting a symbol or they are not committed in relationship ???

    have you spent your life only bothering who shows and who doesnt show and keep on being judging them for that. Cant you just accept anyone wish ??

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  64. men dont need that Vigyan in any form of symbol ??? They have their traditions even in villages I dont see men in Indian Dress , all in shirt pants..

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