यूं तो हर इंसान के जीवन पर सामाजिक प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही है, क्यूँकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज के बिना नहीं जी सकता है। इसलिए शायद उसके जीवन के हर पहलू पर समाज का प्रभाव दिखना लाज़मी है। समाज क्या है, यह तो आप सभी लोग जानते ही हैं। फिर भी हमारे समाज के ढांचे को मैं इस चित्र के द्वारा दिखा रही हूँ। वैसे देखा जाये तो कुछ हद तक ठीक भी है। समाज के कायदे कानून बने ही इसलिए हैं, कि कोई भी मनुष्य उसका पालन करते हुए एक सभ्य नागरिक की ज़िंदगी गुज़ार सके, नाते रिश्तों में यह सामाजिक बंधन बहुत कारगर सिद्ध होते हैं। लोगों के मन में कहीं ना कहीं समाज का डर होता है। जिसके कारण लोग कुछ गलत काम करने से बच जाते है। क्यूँकि कुछ भी गलत काम करने से पहले एक बार तो, हर इंसान के मन में आता ही है, कि लोग क्या कहेंगे। लेकिन मुझे नहीं लगता, कि किसी भी इंसान के जीवन में हर बात को अंजाम देने से पहले यह सोचना ही चाहिए,कि लोग क्या कहेंगे।
अरे भाई "कुछ तो लोग कहेंगे" ही लोगों का काम है कहना ...

मगर मेरा ऐसा मानना है कि लोगों के डर से हर वो काम ना करना जिसको करने की आपकी बहुत इच्छा है। मगर सिर्फ लोगों में वो काम प्रायः नहीं किया जा रहा है इसलिए आप कैसे कर सकते हो, कि यह सोच गलत है।
आज कल हर जगह प्रतिस्पर्धा का ज़माना है। जहां देखो वहाँ एक दूसरे से आगे बढ़ने की होड़ लगी हुई है। जैसे तब होता है ना, जब आप बहुत सारे केंकड़ों को एक बाल्टी में भर दो और फिर देखो कितने बाहर आ पाते है, तो शायद एक भी बाहर नहीं आ पायेगा। क्यूँकि हर कोई किसी एक को आगे बढ़ने ही नहीं देता है। ठीक वैसा ही हाल हमारे सामाज का हो गया है। आजकल यदि किसी ने लीग से हटकर कुछ करने की कोशिश की तो लोग जाने क्यूँ तुरंत तरह-तरह की बातें बनाना शुरू कर देते हैं। जैसे किसी बच्चे को किसी बड़े नामचीनी स्कूल में दाखिला नहीं मिला, तो लोग बाते बनाते हैं, कोई अपनी परीक्षा में सफल नहीं हो सका, तो भी लोग बाते बनाते हैं। यदि किसी को बहुत ही बढ़िया कालेज में आसानी से दाखिला मिल जाये तब भी लोग कहने से नहीं चूकते, कहते हैं ज़रूर पैसे खिलाये होंगे माता-पिता ने दाखिले के लिए

किसी को किसी बड़ी कंपनी में नौकरी मिलते-मिलते रह जाये, तो भी लोग बाते बनाते है। यहाँ तक की जब कोई अपने पसंदीदा कपड़े एक बार के बाद दुबारा किसी दूसरी शादी में पहन ले, तब भी लोग कहें ना कहें हमारे मन में यह बात आ ही जाती है, कि हाय!!! लोग क्या कहेंगे। इसके पास एक ही जोडी कपड़े हैं, जो हर शादी में बस यही साड़ी पहन लेती है वगैरा-वगैरा ....


कुल मिला कर मेरे कहने का तात्पर्य यह है, कि सामाजिक गतिविधियों का, समाज के बनाये नियम कानूनों का, प्रभाव हमारे जीवन पर पढ़ना तो ज़रूर चाहिए। मगर इतना भी नहीं, कि हम हमारी ज़िंदगी को अपने तरीके से जीने के बजाए समाज के नज़रिये से जीना शुरू कर दें। क्यूंकि यदि ऐसा हुआ तो वह जीवन जीना नहीं, जीवन गुज़ारना कहलायेगा। जैसे किसी कैदी को जेल में अपनी सजा का वक्त गुज़ारना होता है। क्यूंकि लोगों का क्या है। जितने मुंह उतनी बातें, लोगों को हमेशा अपने घर से ज्यादा पड़ोसी के घर में क्या हो रहा है, उसकी चिंता ज्यादा रहा करती हैं। उनके घर कब कौन आता है, कौन जाता है, कितने बजे क्या होता है, सबको सब कुछ पता होता है।

फिर भले ही एक बार को आपको ना पता हो, कि आपके घर का कौन सा सदस्य कहाँ जाता और क्या कर रहा है। मगर पड़ोसियों को सब पता होता है। खास कर आपके घर में यदि 15-16 साल की लड़की हैं, तो बस आपको उसके बड़े होने की खबर हो ना हो, पड़ोसियों को आपसे कहीं ज्यादा चिंता रहती है कि आपकी बेटी अब बड़ी हो गई है।

इस सब चक्करों में हमारी ज़िंदगी की बहुत सी छोटी-छोटी खुशियाँ कहीं गुम सी हो जाती हैं। जैसे कई बार लोगों के कहने में आकर हम अपने ही बच्चों पर नज़र रखने लगते हैं। उन पर से हमारा विश्वास उठने से लगता है, जो सही नहीं है। मगर समाज के इन लोगों के डर से कई बार हम वो करने से चूक भी जाते हैं, जिसका असर हमारी आने वाली ज़िंदगी पर बहुत गहरा प्रभाव डाल सकता है। बच्चों पर अभिभावक ज़ोर डालते हैं, यदि तुम परीक्षा में अच्छे नंबरों से पास नहीं हुये, तो "लोग क्या कहंगे", इनका बच्चा इतना गधा है।

अभिभावकों पर समाज ज़ोर डालता रहता है, कि प्रतियोगिता का ज़माना है, साथ नहीं चलोगे तो पीछे छूट जाओगे और सारी ज़िंदगी लोगों की बातें सुननी पड़ेंगी। यहाँ तक की, एक साड़ी खरीदने से लेकर, नई कार करीदनी हो, या नया मकान, या फिर किसी को उपहार में ही कोई भेंट ही क्यूँ ना देनी हो, या फिर आपने किसी को अपने घर खाने पर बुलाया हो और उसके लिए कोई पकवान बनाने या खिलाने की बात ही क्यूँ ना हो, आपके मन में सदैव सबसे पहले यही बात आती है, कि फलाना क्या कहेगा, कि यह क्या खिला दिया, हमें तो यह पसंद नहीं, या फिर ढिकाना क्या सोचेगा, लोग क्या कहंगे। यह सब सोच कर ही आप लोगों को ध्यान में रखते हुए सभी कार्य करते हो, बल्कि यह सब काम तो ऐसे हैं, जिनमें लोगों की पसंद कम और आपकी पसंद ज्यादा मायने रखती है, कि आप खुद क्या चाहते हो और उसके हिसाब से आपकी क्षमता कितनी है।
कहने का मतलब यह, कि हर छोटी से छोटी बातें जो हमारे जीवन से जुड़ी है। जो कि बहुत ही साधारण सी बातें हैं, जिनसे शायद लोगों का कोई लेना देना नहीं है, फिर भी दिखावे के चक्कर में हम पहले लोगों के बारे में सोचते हैं, बाद में यदि गुंजाइश रही तो अपने बारे में ऐसा क्यूँ ???? दो प्यार करने वाले कई बार समाज के डर से एक नहीं हो पाते हालांकी अब वो ज़माना नहीं रहा। मगर आज भी एक बार तो उनके मन में भी आता ही है, कि कुछ तो लोग कहंगे। यह बात अलग है कुछ काम किए ही इसलिए जाते हैं कि कुछ तो लोग कहें

माना कि समाज का डर होना भी ज़रूर है। मगर इतना भी नहीं, कि कोई भी इंसान अपनी ज़िंदगी अपने तरीके से जीना ही छोड़ दे, शायद इसलिए आज कल के बच्चे इतने बेबाक होते हैं। क्यूंकि उनको समाज की फिक्र नहीं होती, कि लोग क्या कहंगे, कौन क्या सोचेगा। बल्कि उनको सिर्फ अपनी ज़िंदगी से प्यार होता है, कि हमको अपने जीवन में क्या करना है। लोगों को जो सोचना है, सोचने दो। आखिर कुछ भी हो हम चाह कर भी कभी किसी की सोच पर कोई पाबंदी तो लगा नहीं सकते...और वैसे भी लोगों का क्या है, थोड़े दिन कहंगे फिर चुप जो जाएँगे...मगर उनके लिए अपनी ज़िंदगी से जुड़े फैसलों का समझौता करना आजकल की पीढ़ी को कतई गवारा नहीं

और शायद यही सही भी है ...आपको क्या लगता है।
