Wednesday, 14 April 2021

राजस्थान डायरी भाग-5


उदयपुर से निकलकर हम आ पहुँचे जोधपुर। राजस्थान का लगभग हर शहर अपने अंदर न जाने कितनी शौर्य गाथाओं को समेटे हुए हैं। सच ही कहते हैं कुछ लोग यदि राजस्थान को हिंदुस्तान के नक्शे से हटा दिया जाये तो हमारे पास ऐसी कोई धरोहर नहीं जिसके इतिहास पर गौर करने के बाद यहाँ के लोग अपनी मूँछों पर ताव दे सकें। खैर इतना कुछ घूमने के बाद तबीयत बिगड़ना लाज़मी था लगातार यात्रा के दौरान हवा पानी के बदलाव से मेरा गला पूरी तरह खराब हो चुका था इसलिए अब ज्यादा घूमने की दम खम बची नहीं थी मुझ में, फिर भी यहाँ का किला घूम ही लिया मैंने और अच्छा ही हुआ जो घूम लिया वरना इतना सुंदर हस्त शिल्प का काम जिसे देखकर मेरा मन मोहित हो गया था छूट ही जाता। चलिये आपको भी घुमाकर लाते हैं जोधपुर की शान मेहरानगढ़ का किला। जिसके अंदर प्रवेश करते ही पधारो माहरे देश का लोक संगीत कानो में पढ़ता है तो बस मन मुग्ध हो उठा है वैसे तो यह एक ऐसा गीत है जिसे आप राजस्थान की जमीन पर पाँव रखते ही सुन सकते हैं किन्तु फिर भी एक अजीब सा खिचाव है इस गीत में, यहाँ की मिट्टी में, यहाँ के संगीत में और इन कलाकारों की आवाज़ में कि कुछ देर इन्हें सुने बिना आगे बढ्ने को जी नहीं चाहता है।   


मेहरानगढ़ का किला राजस्थान के जोधपुर जिले में स्थित है। इसकी नींव  13 मई 1459 में राठौर वंश के राजा राव जोधा ने करणी माता के द्वारा रखवाई थी। करणी माता बीकानेर और जोधपुर राठौर वंश की इष्ट देवी कहलाती हैं और चरण जाती की कुल देवी के रूप में पूजी जाती है। यह दुर्ग जिस पहाड़ी पर स्तिथ है पहले उस पहाड़ी को चिड़िया टूंक की पहाड़ी के नाम से जाना जाता था क्योंकि पहले यहां चिड़िया टूंक नाम के एक संत रहा करते थे । इस किले को और भी कई नामों से जाना जाता है। मेहरानगढ़, मयूरध्वज, चिंतामणि, कागमुखी एवं सूर्यगढ़ के नाम से भी जाना जाता है। इस दुर्ग में मुख्यतः तीन द्वार हैं या तीन पोल आप कुछ भी कह सकते हैं।

पहला पोल है जय पोल - जय पोल का निर्माण जोधपुर के महाराजा मान सिंह ने 1808 में कर वाया था। कारण था इस समय जोधपुर की सेना ने जयपुर और बीकानेर की सयुंक्त सेना को युद्ध में पराजित कर दिया था।

दूसरा है लोहा पोल - लोहा पोल का निर्माण जोधपुर के शासक माल देव राठौर ने सन 1548 में बनवाने का काम शुरू किया था लेकिन इसको पूर्ण करवाने का काम महाराजा विजय सिंह ने किया था। इस पोल के बाहर दो छतरियां बनी हुई है। जिनका नाम था धन्ना एयर भीवा इन छतरीयों को मामा भानजे की छतरी भी कहा जाता है। यह 10 खंभो की छतरी है और इसका निर्माण जोधपुर के शासक अजित सिंह राठौर के द्वारा करवाया गया था।  

तीसरा है फतेह पोल - इस पोल का निर्माण जोधपुर के शासक अजीत सिंह राठौर ने 1707 में मुगलों से जीतने की खुशी में करवाया था। 


अब आते है इस दुर्ग में बने विभिन्न महलों की ओर सबसे पहले आता है फूल महल - इस महल अपने पत्थरों पर बारीक कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है। इस महल का निर्माण जोधपुर के शासक अभय सिंह द्वारा करवाया गया था। इन से जुड़ा भी एक रोचक किस्सा है अभय सिंह को महल बनवाने के लिए लकड़ी की जरूरत थी ताकि चूना पिघलाया जा सके। तो उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि जाओ और लकड़ी काटकर लाओ सो गिरधर दास भंडारी के नेतृत्व में सैनिक पहुँचे खेजड़ी गाँव और उन्होंने वहाँ पहुँच कर खेजड़ी के पेड़ों को काटना शुरू कर दिया। तभी एक महिला जिसका नाम अमृता देवी विश्नोई था दौड़ी दौड़ी वहाँ गयी और जाकर पेड़ों से चिपक गयी। ताकि पेड़ ना काटा जाय फिर उसने कहा जब तक मैं जीवित हूँ इन पेड़ों को नहीं काटने दूंगी। इस पर गिधर दास भंडारी ने उस महिला के दोंनो हाथ कटवा दिए। इतना ही नहीं जब उन्होंने पेड़ बचाने के लिए अपना सिर टिका दिया तो उनका सिर भी काट दिया गया। इसी तरह उनका पूरा परिवार पेड़ बचाने के लिए शहीद हो गया और जब तक राजा को इस बात का पता चला तब तक 364 विश्नोई लोग पेड़ बचाने की खातिर अपने प्राणों का बलिदान दे चुके थे। तब राजा ने वहाँ के पेड़ ना काटे जाएँ का आदेश दिया और तब कहीं जाकर सैनिक वहाँ से लौटे। 

तब से आज भी यहाँ शहीदों की स्मृति में मेला लगता है जिसे विरक्षों का मेला कहते हैं। 

फिर हम बात करेंगे (मोती महल) की - इस महल की खासियत यह है कि यहाँ छतों और दीवारों पर सोने की बारीक कारीगिरी की गयी है। सोने का यह बारीक काम महाराजा तख्त सिंह द्वारा  करवाया गया था। लेकिन इस महल का निर्माण महाराजा सूर सिंह ने करवाया था।
फिर आती है श्रृंगार चौकी यहाँ पर जोधपुर के महाराजाओं का राजतिलक होता था। और इसे दौलत खाने में महा राजा तख्त सिंह द्वारा बनवाया गया था। ठीक इसी के बाहर कुछ बेहद सुंदर झरोखे बने हुए हैं जहां से महल में रहने वाली सभी रानियाँ महल में चल रही कार्यवाही एवं राजतिलक आदि देखा करती थी। ऐसा कहा जाता है कि उस जमाने में एक माँ को अपने बेटे का राज तिलक देखने की अनुमति नहीं हुआ करती थी इसलिए वह इन्हीं झरोखों के माध्यम से महल में चल रही कार्यवाही देखा करती थी। यह झरोखे मेरे अनुभव के अनुसार इस पूरे दुर्ग का सबसे सुंदर स्थल है। इन पर जो कारीगिरी की हुई है उसका तो कोई जवाब ही नहीं है। इन झरोखों की खास बात यह है कि यहाँ से महल के अंदर तो देखा जा सकता है किन्तु महल के अंदर से इन झोरोखों को नहीं देखा जा सकता। 

इसी दुर्ग की तलहटी में आपको सफेद संगमरमर का बना एक स्थल दिखाई देगा इसे बोलते है जसवंत थड़ा इसे राजस्थान का ताजमहल या मारवाड़ का ताजमहल भी कहते है। जोधपुर के शासक राजा सरदार सिंह ने 1906 में इसका निर्माण अपने पिता जसवंत सिंह द्वितीय की स्मृति में कराया था। इसलिए इसका नाम जसवंत थड़ा कहा जाता है। यहाँ राज परिवार के लोगों का अंतिम संस्कार किया जाता था। यहां लगा मार्बल मकराना से मंगाया गया था जो कि विश्व प्रसिद्ध है। कहते हैं ताजमहल का मार्बल भी वहीं से मंगवाया गया था इतना ही नहीं यहाँ लगी मॉर्बल कि कुछ शीट तो ऐसी भी हैं जिसमें से सूर्य की किरणे आरपार चली जाती है।

खैर अब हम बात करेंगे इस दुर्ग में बने कुछ धार्मिक स्थलों की जिनमे से कुछ के नाम इस प्रकार है, चामुंडा माता मंदिर, नागणचि माता मंदिर,सूर मस्जिद।

चामुंडा माता मंदिर का निर्माण तो राव जोधा जी ने दुर्ग के निर्माण के साथ ही करा दिया गया था। पर इस पर भी एक बार बिजली गिरी थी और यह छतिग्रस्त हो गया था। तब इसका पुनः जीर्णोद्धार कराया था महाराजा तख्त सिंह ने।

फिर आता नागणचि मंदिर यह राठौरों की कुल देवी है। इनका मूल मंदिर यहाँ नही है अर्थात मंदिर तो है यहाँ भी लेकिन मूल रूप से यह मंदिर बाड़मेर के पाचपदरा में है।  






फिर आता है सूरी मस्जिद इसका निर्माण सन 1554 में शेर शाह सूरी ने कराया था। अब आप सोच रहे होंगे उसका भला कब अधिकार हो गया जोधपुर पर है ना ...? 1544 का सुमेलगिरी युद्ध यह तो था दुर्ग का इतिहास जिसमें धोखा धड़ी करके शेर शाह सूरी ने अपने कब्ज़े में कर लिया था और फिर ठीक एक साल बाद ही शेर शाह सूरी की मृत्यु हो गयी और वापस यहाँ माल देव राठौर का राज हो गया था।

लेकिन इसके अलावा बहुत कुछ ऐसा है जो जोधपुर घूमने आने वालों के लिए जानना बहुत जरूर है जैसे यहाँ पर मौजूद नीले पुते घरों की1 वजह से ब्लू सिटी के नाम से भी जाना जाता है। जहाँ खाने में मिर्ची वड़ा, प्याज़ की कचौरी और मावा कचोरी, माल पुआ, बेसन की बर्फी, घेवर, गुलाब जामुन प्रसिद्ध है। इतना ही नहीं यहाँ की मिर्च भी बहुत मशूहर है। विश्व का सबसे बड़ा सोलर पावर प्लांट भी जोधपुर में ही है। जोधपुर के एक जगह का नाम हक़ी मंडोर जहाँ रावण की पत्नी मंदोदरी के नाम पर पड़ा था ऐसा कहा जाता है कि रावण ने मंदोदरी के साथ सात फेरे यहीँ लिए थे इसलिए मंडोर को रावण का ससुराल भी कहा जाता है। इतना ही नहीं रावण का पहला मंदिर भी मंडोर में ही स्थिति है जहां आज भी उनके वंशज उनकी पूजा करते है और दशहरे के दिन शोक मानते हैं। इतना ही नहीं जोधपुर में ही है एशिया की सबसे बड़ी जीरा मंडी। 

दुनिया के सबसे बड़े, सब से मंहगे एक्सपेंसिव पेलेस में से एक है जोधपुर का उमेध भवन पेलेस जिसे 1929 में महाराजा उमेध सिंह ने बनवाया था जहां से प्रियंका चोपड़ा और निक जोन्स की शादी हुई थी। जो मुम्बई के ताज होटल समूह का हिस्सा भी है। इस का भी कुछ हिस्सा संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है। जिसमें राज परिवार की तसवीरों के अतिरिक्त शाही परिधानों से लेकर बर्तन, घड़ी आदि तक रखे हुए हैं। 



 है ना कमाल की जगह आप भी यहाँ ज़रूर आइये और घूमकर जाइये।

4 comments:

  1. जोधपुर के बारे में बेहतरीन जानकारी .. बहुत बढ़िया रिपोर्टिंग की है ...

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  2. उमेध या उम्मेद महल? मैं कन्फ्यूज्ड हूं.

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    1. जी मैं खुद भी कन्फ्युज हूँ। जहां तक मुझे लगता है उमेध ही है।

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