Friday, 2 April 2021

राजस्थान डायरी भाग-2

अब बात आती है किले के अंदर प्रवेश करने के बाद क्या हुआ यह जानने की है ना..! आप सब भी इसी का इंतज़ार कर रहे थे। तो चलिये आपको लिए चलते हैं उस विशाल किले के अंदर जिसके अंदर एक नहीं बल्कि कई सारे महल एवं मंदिर भी हैं। जिनमें से कुछ जैन मंदिर हैं और कुछ हिन्दू मंदिर है। कहते हैं महाराणा कुंभा का राज्य मेवाड़ का स्वर्ण काल कहलाता है। इस किले मे प्रवेश करते ही सबसे पहले देखने को मिलता है। पुरातत्व कार्यालय और संग्रहालय चित्तौड़गढ़ किले के शुरुआती भाग में तोप खाना नामक स्थान है। जहां उस समय की कई बड़ी और छोटी तोपों को संग्रहित कर रखा गया है। इसके अलावा ठीक इसी के पास एक संग्रहालय और भी है जहां किले और पुराने मंदिरों की कुछ पुरानी मूर्तियों को भी संग्रहित कर के रखा गया है जो कि कभी खुदाई में मिली थी। इसलिए यह जगह इतिहासकारों की नज़र में यह एक महत्वपूर्ण स्थान हो सकता है इसके अलावा इसी किले में महारानी पद्मिनी के पति राजा रावल रत्न सिंह जी का महल भी है। उन्होने चित्रकूट यानी चित्तौड़ पर शासन भी किया था। अब यदि राजा रत्न सिंह जी की बात की जाय तो उनके विषय में अधिक जानकारी मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा लिखी गयी कविता पद्मावत में देखने को मिलती है यह कविता 1540 में रचित की गई थी।1303 इसवी में खिलजी द्वारा आक्रमण करने पर युद्ध के दौरान महाराणा रावल रतन सिंह जी वीर गति को प्राप्त हो गए थे और इस समाचार के मिलने के बाद ही महारानी पद्मिनी ने 16,000 क्षत्राणियों के साथ जौहर किया था। खैर उस विषय में हम बाद में बात करेंगे। 

इसके आलवा इस किले में दूसरे नंबर पर आता है जैन कीर्ति स्तंभ। जिसका निर्माण जैन दिगंबर संप्रदाय के बगैर वाला महाजन ने करवाया था। इसके पास ही महावीर स्वामी का एक जैन मंदिर भी बना हुआ है इस सड़क पर आगे चलने पर एक बड़ा दरवाजा दिखाई देता है। जहाँ आगे चल कर देखने पर पूरा चित्तौड़ दिखाई देता है। आस पास मृग वन भी है। जहाँ पहुँच कर हिरण से लेकर अन्य वन जीवों को देखने का आनंद प्राप्त किया जा सकता है। 


फिर तीसरे नंबर पर आता है पद्मिनी महल सूर्य कुंड के दक्षिण में राजा रावल रत्न सिंह की पत्नी महारानी पद्मिनी का महल आता है। जिसके कमरों में बड़े बड़े काँच लगे हुए हैं। जिनमें पानी के बीच में बने महल के अंदर का प्रतिबिंब नज़र आता है बाकी पद्मिनी और खिलजी का किस्सा तो सभी को पता ही है। हालांकि वहाँ के लोगो इस घटना को सत्य नहीं मानते। किन्तु फिर भी यह किस्सा इतिहास में दर्ज है। ऐसा कहा जाता है कि रानी पद्मिनी ने उसी अपने पानी वाले महल की सीढ़ियों पर बैठकर पानी में बना अपना प्रतिबिंब दूसरी और बने महल की खिड़की में लगे काँच में खिलजी को दिखाया था। जिसे देखकर वह इतना मोहित हो गया था कि हर हाल में वह उन्हें पाने की ज़िद्द कर बैठा था और उसी लालसा के चलते उसने राजा रतन सिंह को धोखे से बंदी बनाकर किले पर चढ़ाई की थी और रानी पद्मिनी के आगे यह शर्त रखी थी कि यदि वह उससे विवाह करने के लिए नहीं मानी और दिल्ली ना आई तो वह रतन सिंह जो को मार देगा। लेकिन रानी फिर भी राजी ना हुई और उन्होने गौरा और बादल के साथ मिलकर रतन सिंह जी को छुड़ाने की यौजना बनाई और वह उस यौजना में कामयाब भी रहीं। किन्तु इस लड़ाई में वीर (गोरा और बादल) अपने राजा और रानी का मान बचाने के लिए वीर गति को प्राप्त हो गए। इनकी कथा भी निराली है। 

फिर चौथे नंबर पर आता है।  कालिका माता का मंदिर यह मंदिर जयमल और पत्ता महल के दक्षिण में सड़क के पश्चिमी किनारे पर कालिका माता का सुंदर विशाल बहुत ही प्राचीन मंदिर है। मंदिर की दीवारों पर बाहरी आकृतियों को देखते हुए ऐसा लगता है कि यह पहले शायद सूर्य मंदिर रहा होगा क्यूंकि मंदिर के बाहरी द्वार पर खुदी हुई सूर्य की मूर्ति और गर्भ गृह के बाहर आनेक भागों में स्थापित सूर्य की मूर्ति देखने को मिलती है। नवरात्रि के दिनों में यहाँ मेला लगता है और दूर दूर से यात्री यहाँ दर्शन के लिए आज भी आते हैं। 

फिर पांचवाँ आता है, महाराना कुंभा के महल जो कि एक बहुत ही प्राचीन महल है। यही महल कुंभा महल के नाम से प्रसिद्ध है। कुंभा महल के दक्षिण और पश्चिम के भाग में कवर पड़ा महल के खंडहर हैं।  जहाँ उदय सिंह का जन्म, पन्ना दाई का बलिदान और मीरा का मंदिर भी विद्यमान हैं। जहाँ महाराणा विक्रमादित्य द्वारा मीरा का विष पान कराना आदि घटनाओं का होना बताया जाता है। लेकिन इन सब स्थलों का भी अपना एक अलग ही महत्व है। जिसकी कल्पना मात्र से दिल दहल उठता है। कैसे एक माँ ने अपने राज दुलारे का बलिदान दिया होगा। एक राजकुमार को बचाने की खातिर क्या और कैसे आया होगा उनके मन में यह विचार कि ऐसा करने से वह अपने राज्य और राजा के प्रति अपनी वफादारी का प्रमाण दे सकती हैं। ऐसे बलिदान को सुनकर तो पत्थर भी टूट जाये। फिर उन्होंने ना जाने कहाँ से पायी होगी उस रोज़ इतनी हिम्मत और इस सब में उस मासूम की भला क्या गलती थी। सोच सोचकर तो मेरा कलेजा आज भी मुंह को आता है। अपने बच्चों की जान की खातिर तो जानवार भी जान पर खेल जाता है। फिर पन्ना दाई को उस वक़्त क्या हुआ था यह तो ईश्वर ही जाने शायद देश प्रेम ही ऐसी हिम्मत दे सकता है। अथवा तो एक माँ के लिए यह कतई मुमकिन नहीं शत शत प्रणाम है उस माँ को जिसने अपने राज्य की खातिर यह बलिदान दिया। 


वहीं एक ओर है मीरा बाई का वह मंदिर जहाँ उन्होने श्री कृष्ण की आराधना की उनकी भक्ति में लीन होकर विष पान तक किया। परंतु इस सब में मेरे आकर्षण का केंद्र रहे उस मंदिर के अंदर लगे वो पत्थर हैं। जो गवाह है उस चमत्कार के जो उस रोज़ हुआ होगा। हर एक पत्थर को छूकर ऐसा प्रतीत होता है मानो अभी बोल पड़ेंगे। अगर वाकई पत्थरों और मिट्टी में सोखने की शक्ति होती है तो इन पत्थरों ने भी सोख लिया होगा प्रभू के साक्षात होने का अनुभव क्यूंकि एक असीम शांति का अनुभव होता है। जैसे मानो आज भी श्री कृष्ण का वास हो वहाँ, यूं भी ऐसा कहा जाता है ना कि जहाँ कहीं भी सच्चे मन से प्रभू की वंदना हो वहाँ भगवान स्वयं हमेशा के लिए विराजमान हो जाते हैं और फिर यह तो मीरा बाई का मंदिर है। मेरा सुझाव है आप लोग यदि घूमने आए तो इस मंदिर के दर्शन और अनुभव अवश्य कर के जाये। आपको भी वही अनुभव होगा जो मुझे हुआ।

हालांकि ऐसा कहते हैं वहाँ अब वह पूरानी मूर्ति नहीं है श्री कृष्ण की वह तो कब की सरकार द्वारा हटा दी गयी शायद वह चाँदी की रही थी। अब तो वहाँ संगमरमर की मूर्ति विराजमान है। पर तब भी मंदिर के अंदर कदम रखते ही एक अलग ही एहसास होता है एक अजीब से ठंडक जो दिल को सुकून दे जाती है एक मन भावन शांति। कुछ ऐसा जिसे शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता।  


फिर आता है छठा स्थल विजय स्तंभ 122ft ऊंचा  9 मंज़िला एक खंभ जिसमें ऊपर की और जाने के लिए 157 सीढ़ियां लगी हुई है। इस स्मारक के अंदर और बहारी भागों में कई प्रकार के पौराणिक देवी देवताओं ऋतुओं नदियों एवं जग जीवन की सुंदर आकृतियाँ बनी हुई है। इसका निर्माण  महाराजा कुंभा ने करवाया था। मडू मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी और गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन की सयुंक्त सेना पर महाराणा कुंभा की विजय की स्मृति में स्वयं महाराणा कुंभा के इस स्तंभ का निर्माण कराया था। इसलिए इसे विजय का स्वरूप माना जाता है। इसी कारण इसका नाम विजय स्तंभ रखा गया था। कहते हैं इसकी सबसे ऊपरी छत्री पर बिजली गिर जाने के कारण वे ध्वस्त हो गयी थी। जिसका जीर्ण उद्धार उदयपुर के महाराणा स्वरूप सिंह जी ने करवाया था।



 
फिर आता है वह सातवाँ स्थल जिसके विषय में सोचकर आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस स्थल का नाम है महा सती स्थल जहाँ महारानी पद्मिनी ने अपनी 16,000 क्षत्राणियों के साथ जौहर किया था। यह स्थल विजय स्तंभ और सीमितेश्वर मंदिर के बीच में बना यह स्थल है। जिसे महाराणाओं और राज्य परिवार का श्मशान स्थल भी कहा जाता था। जहाँ अनेक क्षत्राणियों ने जौहर किया था। यही वो स्थल हैं 
जहाँ जौहर स्थल का बोर्ड लगा हुआ है।
 

यहाँ पहले एक बहुत विशाल गड्ढा हुआ करता था । जहाँ महल में उपयोग की जाने वाली ज्वलंत वस्तुओं का संग्रह किया जाता था। जैसे भोजन आदि बनाने के लिए तेल, घी, पूजा के लिए चंदन की लकड़ी कपूर आदि। शायद इसलिए इस जगह को जौहर के उपयुक्त स्थान माना गया होगा क्यूंकि यहाँ रखी सामग्री समय के अभाव में जल्दी आग पकड़ सकती थी। तभी तो खिलजी द्वारा महाराणा राव रत्न सिंह जी के वीर गति को प्राप्त हो जाने की सूचना मिलने पर महारानी पद्मिनी ने इसमें जौहर किया था। जिसमें सब से पहले उन्होने ही खुद कूद कर अपनी आन बान और शान की खातिर अपने प्राणो की आहुती दी थी। उनके बाद एक एक कर उनकी सभी क्षत्राणियों ने भी इसी हवन कुंड में खुद कर अपने प्राणों का बलिदान दिया था। यही वो स्थल हैं जहाँ जौहर स्थल का बोर्ड लगा हुआ है। लेकिन उस विशाल मैदान को देखकर मन में जौहर की जो कल्पना बनती हैं उसको बयान करने के लिए मैं निशब्द हूँ यदि सच में 16000 लोगों को पंक्ति बद्ध कर इस जगह खड़ा किया जाये तो सच में इतनी जगह लगेगी जितना बड़ा यह स्थल है इतनी बड़ी और विशाल जगह पर ज़रा सोचिए कितना बड़ा हवन कुंड तैयार किया गया होगा जिसमें कूदकर उन क्षत्राणियों ने वहाँ जौहर किया उनकी उस बहादुरी को मेरा सलाम हम आप तो शायद उस मंज़र की कल्पना भी ठीक से नहीं कर सकते कि कैसा रहा होगा वह दृश्य, वह समय, वह घड़ी, वह माहौल, हजारों क्षत्राणियों का वह जय भवानी का जयकारा उनकी चीखे उनकी पीड़ा सोचकर होश उड़ जाते हैं।

कहते हैं यहाँ खुदाई के वक़्त राख़ और हड्डियों के अवशेष भी पाये गए थे जो सबूत थे इस बात का यह कोई कहानी नहीं बल्कि एक सच्ची घटना थी। आज उस स्थल को देखकर जब कल्पना की दृष्टि से वह दृश्य आँखों में बनता है तो आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।

मुझे नहीं पता कि इन सब बातों में कितनी सत्यता है। लेकिन फिर भी इन कहानियों को सुकर पढ़कर यहाँ की मिट्टी को प्रणाम करने का मन करता है और मैंने ऐसा किया भी, एक अजीब सा सुकून एक आजीब सा गर्व एक अलग ही अनुभव था उस रोज़ उस मिट्टी को गले लगा के माथे पे सजाने का जब दिल से प्रणाम निकला उस रोज, ऐसा लगा मानो कल की ही बात हो। उस उद्यान में खिले फूलों में से एक पूल तोडकर मैंने सहज लिया। इस पवित्र स्थल की निशानी जानकार। ऐसा नहीं कि केवल एक यही जौहर हुआ था यहाँ पर इसके अतिरिक्त और भी दो जौहर हुए हैं यहाँ पर सबसे ज्यादा प्रचलित जौहर यही है।

इसके बाद आता है आठवाँ स्थल, जिसे गोमुख कुंड  के नाम से जाना जाता है  चित्तौड़ गढ़ किले पर बने इस गो मुख कुंड में जो गाय के मुख की तरह दिखाई देता है, से लगातार प्राकृतिक तरीके से शिवलिंग पर एक झरने के रूप में गिरता रहता है। यहाँ से बाहर आने पर दक्षिण की और जाने वाले रास्ते के दोनों ओर जलाशय दिखाई देते हैं जहाँ एक और हाथी का कुंड है जहाँ पहले हाथी पानी पिया करते थे और दूसरी और बावड़ी के रूप में एक जलाशय है। तो यह था चित्तौड़ का वह एतिहासिक किला। 

आगे मिलेंगे महारणा प्रताप के जन्म स्थल कुंभलगढ़ के किले में, तब तक के लिए नमस्कार 

11 comments:

  1. बहुत सुन्दर यात्रा प्रसंग।

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  2. शानदार लेखन और बढ़िया शब्दों का चयन।

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  3. आपके यात्रा संस्मरणों के दो भाग पढे हैं. इनके बारे में सुना था और कुछ पढ़ा था। लेकिन आपकी लेखनी से निकले विवरण ने इतिहास की कई कथाओं को जीवित कर दिया। किसी जगह को देखने की आरती का भोग तभी प्राप्त होता है जब उसे लिख दिया जाए। बहुत ख़ूबसूरत वर्णन।

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    1. सच कहा आपने अंकल इसलिए तो लिख रही हूँ।आप जुड़े रहियेगा अभी बहुत से भाग आने बाकी है।

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  4. यात्रा संस्मरण अपने आप में अनूठा अनुभव है और आपने चित्तौड़गढ़ के बारे में जो लिखा है पल्लवी बेहद शानदार और बारीकी से मैंने दोनों भाग पढ़े हैं, आपके लिखे को और चित्तौड़गढ़ की तस्वीरों को देख देख कर मैं अभिभूत हुई जा रही हूं। बहुत-बहुत शुभकामनाएं

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    1. मुझे पता था, आपको यह संस्मरण जरूर पसंद आयेगा। आप बनी रहिये मेरे साथ, जल्द ही तीसरा भाग पोस्ट करने जा रही हूँ।

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  5. बहुत अच्छे ढंग से वर्णन कर रही हैं आप।

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  6. बहुत सुंदर बहुत प्रभावी ढंग से चित्तौड़ दुर्ग का खाका खींचा है आपने! वाह!
    विश्व इतिहास में ऐसा दुर्ग दूसरा नही जो वीरता,त्याग,बलिदान,दान, सौंदर्य और भक्ति के अद्वितीय मिसालें एक ही स्थल से जुड़ी हो। तभी तो कहते हैं गढ़ तो गढ़ चित्तौड़गढ़ बाकी सब गढ़ैया

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