Tuesday, 6 April 2021

राजस्थान डायरी भाग-3

अब ऐसा है कि चित्तौड़ का किला घूमने के बाद हमारे अंदर ज्यादा दम नहीं बची थी कि हम अगले दिन फिर एक और किला घूम सकें वो क्या है ना कि इतना चलने फिरने और घूमने की आदत नहीं है हमारी, पर क्या करते राजिस्थान जाकर भी यदि किले ना देखे और ना घूमे तो राजिस्थान यात्रा सफल नहीं होती। होटल पहुँचकर रात्री का भोजन कर जो सोये तो सुबह कब हुई पता ही नहीं चला। फिर वही सुबह उठकर नहा धोकर नाश्ता किया। वो क्या है ना कि मुझे खाने पीने का बहुत शौक है। यह मेरी सेहत को देखकर ही पता चलता है। तो सुबह-सुबह होटल की छत पर ठंडी ठंडी हवा के बीच नाश्ता करने का अपना एक अलग ही आनंद था। गरमा गरम पोहा, जलेबी पूड़ी आलू मटर की सब्जी, सेंडविच, भजिए आदि का नाश्ता भर पेट करने के बाद प्लान बना कुंभलगढ़ घूमने का तब हमने सोचा था चित्तौड़ से निकलने के बाद 2 से 3 घंटे में हम पहुँच जाएँगे कुंभलगढ़। 

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हमें कुछ अधिक समय लगा जिसके चलते वहाँ पहुँचते ऊपर जाने का मुख्य द्वार बंद हो चुका था। अब क्या किया जाए सबसे पहले तो द्वार बंद होने के कारण बहुत निराशा हुई। फिर हमें लगा अब आ ही गए हैं तो कुछ तो देखकर जाएँगे ही। हाँ नहीं तो ....! तो पता चला शाम को वहाँ लाइट एंड साउंड शो भी होता है। जिसमें महाराणा कुंभा और प्रताप का इतिहास बताया जाता है। तो बस तय हुआ कि यह शो देखकर ही उदयपुर के लिए रवानगी होगी। सो हमने बस टिकिट लिया और वहीं पत्थरों पर बैठकर पूरी शौर्य गाथा सुनी। सच मजा आ गया था उस रात, राजिस्थान के लगभग हर किले में अक्सर शाम को यह लाइट एंड साउंड शो होते हैं। जिन के माध्यम से बाहर से आए पर्यटकों को उस किले और वहाँ के राजा का इतिहास बताया जाता है। 

खैर वह शो देखने के बाद हम उदयपुर के लिए रवाना हो गए। वहाँ होटल पहुँचकर आराम किया और रात के भोजन में होटल की छत पर बने भोजनालय में राजिस्थानी पकवानों का आनंद लिया जैसे गट्टे की सब्जी, कढ़ी, बाजरे की रोटी आदि। फिर सुबह उठकर मजेदार नाश्ता भी किया जो अधिकतर बेसन से बना होता है जैसे ब्रैड पकोड़ा, कांदा भज्जी,फाफड़ा आदि के साथ साथ पोहा, जलेबी, सेंडविचआदि भी विदेशी पर्यटकों के लिए। उनका भी तो ध्यान रखना ज़रूरी है न भाई ...है कि नहीं। फिर हम लोग निकले कुंभलगढ़ के लिए। गयी रात देर हो गयी थी। इसलिए इस बार हम बिना देरी किए सुबह-सुबह ही निकल गए बीच में पड़ी हल्दी घाटी वीरों की माटी हल्दी घाटी किन्तु इस एतिहासिक स्थल को देखने से पूर्व इस से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण स्थल भी हैं। जिनके विषय में जानना भी बहुत ही रोचक रहा।

सबसे पहले बादशाही बाग :- यह वह स्थान था जहाँ इस युद्ध के दौरान मुगल सेना ने अपना पड़ाव डाला था। आज यहाँ एक बहुत ही सुंदर बगीचा है और गुलाब से संबन्धित व्यापार होता है जैसे गुलाब का शर्बत, गुलाब का इत्र आदि आप यहाँ से खरीद सकते हैं। यहाँ से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर है।



फिर दूजा पड़ाव आता है रक्त तलई, यह वह स्थान है जहाँ युद्ध का दूसरा मोर्चा लड़ा गया था। जहाँ महाराणा प्रताप पर मुगलों की सेना भारी पड़ गयी थी। इसी युद्ध में महाराणा प्रताप अपने घोड़े चेतक व कुछ सैनिकों के साथ मुगलों की सेना को चीरते हुए मान सिंह की तरफ बड़े और मौका पाकर भाला भी फेंका। किन्तु मान सिंह की जगह उनका महावत मारा गया और हाथी की सूंड में लगी तलवार से यहीं से चेतक घायल हुआ था। यह सब (झाला बिदा) ने जब यह देखा की प्रताप घिर गए हैं तब उन्होने प्रताप की रक्षा हेतु वहाँ अपने कुछ सैनिकों के साथ पहुँचकर उनके मुकुट और राज्य चिन्ह को स्वयं धारण कर उन्हें वहाँ से सुरक्षित निकाल दिया और स्वयं वीरगति को प्राप्त हो गए। कहते हैं यह वह जगह है जहाँ युद्ध के बाद रक्त का तालाब बन गया था। ज़रा सोचिए कैसा रहा होगा वह दृशय जब ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से बहता हुआ रक्त इस जगह आकर एकत्रित हुआ होगा जिसमें अपने वीर राजपूतों के रक्त के साथ-साथ मुगल सैनिकों का रक्त भी शामिल था। कहते हैं इस युद्ध के बाद यहाँ बहुत तेज़ बारिश हुई थी। जिसके कारण युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए यौद्धाओं के कटे फटे शवों से बहता हुआ रक्त जब पानी मिलकर पहाड़ियों से बहता हुआ यहाँ आकर जमा हुआ होगा। कितना भयावह रहा होगा वह नज़ारा हरे भरे जंगलों के बीच खून से भरा हुआ एक लाल तालाब ,मेरे तो सोचकर ही रौंगटे खड़े हो जाते हैं। आज की तारीख में तो फिर भी यहाँ बगीचा है किन्तु पत्थरों की बागड़ बना कर उस स्थान को सुनिश्चित किया गया है और आज भी बारिश के दिनों में यह जगह पानी से भर जाती है। तो वह नज़ारा कैसा रहा होगा।यहाँ कुछ महावीरों की याद में छात्रियाँ भी बनी हुई है। जैसे (झाला बिदा) आदि।  

फिर आता है हल्दी घाटी का दर्रा:- इस दर्रे के बाहर बोर्ड भी लगा है हल्दी घाटी का दर्रा प्रारंभ, हल्दी घाटी का यह युद्ध हुआ था 1576 में, खमनोर और बलीचा गांव के बीच यह दर्रा है। बताने वाले बताते हैं यह ही है वह मुख्य स्थल जहाँ से युद्ध आरंभ हुआ था। तो पहला मोर्चा यही से आरंभ हुआ होगा पहले मोर्चे में प्रताप की सेना मुगलों पर भारी पड़ी थी जिसके चलते प्रताप ने उन्हें 3 km पीछे जाने पर मजबूर कर दिया था। यहाँ ज्यादा अंदर जाने की अनुमति नहीं है सरकार ने यह इलाका बंद कर रखा है पहले यहाँ चंदन का जंगल हुआ करता था और यहीं से आगे जाने पर वह दो सकरी घाटियां हैं जहाँ यह भयंकर युद्ध हुआ था। किन्तु अब भी वहाँ जंगल ही है और जंगली जानवरों का खतरा भी इसलिए अंदर जाना मना है। वहाँ के निवासी बताते हैं रात को यहाँ जंगली जानवरों की आवाज़ बड़ी आसानी से सुनी जा सकती है। 


फिर आती है हल्दी घाटी जो कि रास मन जिले की खमनोर घाटी:- गोगुंदा और खमनोर घाटी के बीच बनी है यह सकरी सी हल्दी घाटी 6 km में फैली हुई है यह वह रोड हैं जो सरकार द्वारा दर्रे के बाहर से निकाली गयी है और यहीं बोर्ड लगा है हल्दी घाटी का यहाँ दोनों और पाहड़ को काट कर रोड बनाई गयी है और इन पहाड़ों की मिट्टी बिलकुल हल्दी की तरह पीली है हाथ से मसलने पर लगता है मानो हाथ में हल्दी लगा ली हो। यहीं है हल्दी घाटी। इसके अतिरिक इस युद्ध में महाराणा प्रताप की ओर से केवल 20,000 सैनिक थे और मुगलों की ओर से 80,000 सैनिक थे। फिर भी वह कभी महाराणा प्रताप को बंदी नहीं बना पाये । 


वहीं से आगे चल कर वो गुफा देखने को मिलती है जहाँ महाराणा प्रताप अपने साथियों  के साथ गुप्त मीटिंग किया करते थे। इस गुफा को प्रताप गुफा या रण मुक्तेश्वर गुफा के नाम से भी जाना जाता है। यहीं पर उनके सेनापति जो कि एक मुस्लिम थे जिनका नाम हाकिम खां सूरी था उनकी भी समाधि बानी हुई है। यह गुफा 35 किलोमीटर लंबी हुआ करती थी जो सीधे नाग द्वारे तक जाती थी। लेकिन अब सरकार द्वारा बंद कर दी गयी है। इसके थोड़ा आगे चलने पर मिलती है चेतक की समाधि ।

फिर आता है वो नाला जिसे चेतक ने पार किया था:- यहीं से आगे चलने पर आप देख सकते हैं वह नाला, जिसे महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक ने घायल होते हुए भी अपने स्वामी की जान बचाने की खातिर लंगड़ा था और उसके बाद ही उस घोड़े की मृत्यु हो गयी थी इसलिए यही से थोड़ा आगे आपको मिलेगी चेतक की समाधि,या चेतक स्मारक जहाँ एक और चेतक की याद में उसका स्मारक बना हुआ और दुजी और एक छोटा शिव मंदिर भी है।


यह सब देखते हुए हम पहुँच गए कुंभलगढ़, और भईया वहाँ पहुँचकर जो उस विशालकाय किले को देखा तो एक मन हुआ, ना हो पाएगा इतना कौन चलेगा वो भी इतनी ऊपर रहने दो नीचे नीचे ही घूम लेते हैं। यूं भी सभी किले एक जैसे ही तो होते हैं। लेकिन फिर दूसरे ही क्षण वहाँ का इतिहास जानने और गाइड की चटपटी बातों द्वारा वहाँ कि लोक कथाएँ जानने और सुनने के लालच में हम अंदर चले ही गए, तो भईया आज हम बात करेंगे महाराणा प्रताप की जन्म स्थल कुंभलगढ़ की जिसका निर्माण महाराणा कुंभा ने करवाया था। जो कि एक अजेय किला रहा है। जिसे कभी कोई नहीं जीत ना सका। पूरे 15 साल लगे थे इस किले को बनने में और क्या आप जानते हैं इस किले में बनी दीवार जो कि 36 किलोमीटर लंबी और शायद 15 फिट चौड़ी है जिस पर 8 घौड़े एक साथ दौड़ सकते हैं और यह चीन की द ग्रेट वाल ऑफ चाइना के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी दीवार है। है ना कमाल की बात और किले में ऊपर पहुँचने के बाद जब यह दीवार वहाँ बने झरोखों से दिखाई देती है तो किसी विशालकाय अजगर की तरह प्रतीत होती है।  


कुंभलगढ़ किला जो अरावली पर्वत पर बसा हुआ है। यह उदय पुर जिले के राज समन में बसा हुआ है। इस किले का निर्माण 15 वी शताब्दी में सन 1443 में शुरू करवाया था। और यह 1458 को यह किला बनकर तैयार हो गया था। इस किले का निर्माण महाराणा कुंभा ने करवाया था। इसका निर्माण सम्राट अशोक के पुत्र सम्प्रति के बनाये गए दुर्ग के अवशेषों पर किया गया था। इस दुर्ग को बनाने में 15 साल लगे थे। दुर्ग का निर्माण पूर्ण होने पर महाराणा कुंभा ने सिक्के भी बनवाये थे जिस पर इस दुर्ग का चित्र और उनका नाम अंकित था। यह दुर्ग कई पहाड़ियों एवं घाटियों को मिलाकर बनाया गया है। जिस से यह प्राकृतिक संरक्षण पाकर अजेय रहा है। इस दुर्ग में ऊंचे स्थानों पर महल मंदिर वा आवासीय स्थल बनाये गए हैं, साथ ही समतल भूमि का उपयोग कृषि कार्य के लिए किया गया है। इस दुर्ग के अंदर 360 से ज्यादा मन्दिर है। जिन में से 300 प्राचीन जैन मंदिर है और बाकी सभी हिन्दू मंदिर है। 

इन्हीं मंदिरों में से एक है कुंभा मंदिर जिसके अंदर 5 फिट ऊँचा शिवलिंग विराज मान है। कहते हैं उस वक़्त के राजा महाराजाओं का कद बहुत ऊँचा हुआ करता था इसलिए इस शिवलिंग का तिलक स्वयं महाराणा कुंभा जमीन पर बैठकर कर लिया करते थे। कितने ऊँचे रहे होंगे ना वह, यूं भी संग्रहालयों में रखे हुए उनके वस्त्र कवच आदि की ऊँचाई देखकर भी आश्चर्य होता है कितनी अधिक ऊँचाई के लोग होते वह आजकल तो इतना ऊंचा व्यक्ति कोई कोई होता है। मेरे लिए इस किले में देखने लायक सबसे महत्वपूर्ण स्थान वह था जहाँ जिस कक्ष में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। कहने को वह ऊपरी मंजिल पर बना एक साधारण कक्ष ही था जहाँ एक दो जगह दीपक जलाने के लिए ताख बने हुए थे और हवा के लिए एक बड़ा झरोखा था बस एक छोटा सा कमरा लेकिन उस किले का एक महत्वपूर्ण स्थान। मैंने वहाँ कि मिट्टी भी ली थी एक सुनहरी याद के लिए। वहीं किले कि छत पर कुछ छोटे-छोटे खंभ लगे थे कुछ इस तरह जैसे खो-खो खेलने के लिए बैठा जाता है वैसे, उन खंभो को देखकर मुझे ऐसा महसूस हुआ कि महाराणा प्रताप भी यहाँ खेले होंगे शायद क्यूंकि उनका बचपन तो यहीं व्यतीत हुआ था। बाद में वह चित्तौड़ गए थे। उन खंबों को छूकर मन में वही विचार आया कभी इन खंबों को उन्होने छुआ होगा खेल खेल में काश उन हाथों कि छुअन को हम आज भी महसूस कर पाते तो कैसा होता। नहीं...! 


खैर इस दुर्ग के अंदर एक और गढ़ है जिसे कतार गढ़ के नाम से जाना जाता है। यह दुर्ग सात विशाल द्वारों से सुरक्षित है। इस के बीच के भाग में बादल महल एवं कुम्भा महल सबसे ऊपर है। महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुंभलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकट कालीन राजधानी रहा है। महाराण कुम्भा से लेकर महाराण राज सिंह तक मेवाड़ पर जितने भी हलमे हुए राज परिवार इसी दुर्ग में रहा। यहीं पर प्रथ्वीराज और महाराणा सांगा का बचपन भी बिता था। इतना ही नहीं बल्कि पन्ना दाई ने भी राणा उदय सिंह जी का पालन पोषण इसी दुर्ग में छिपाकर किया था। हल्दी घाटी के युद्ध में हार जाने के बाद स्वयं महाराणा प्रताप भी इसी दुर्ग में रहे थे। हालांकि इस हार जाना नहीं कहेंगे क्यूंकि इस युद्ध में विजय किसी की ना हुई। पर फिर भी जब उनकी जान बचाने की खातिर उनको इस युद्ध भूमि से सुरक्षित बाहर निकाल दिया गया ताकि वह जीवित रह सके। क्यूंकि उनके अतिरिक्त ऐसा कोई नहीं था जो मुगलों से मेवाड़ की रक्षा कर सकता था। केवल एक वही थे जिन्होंनें कभी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की बाकी तो अधिकतर राजपूती राजवंशों ने उस वक़्त मुगलों की आधीनता स्वीकार कर ली थी इतना ही नहीं बादशाह अकबर की खुद की कभी हिम्मत नहीं हुई उनसे सीधा युद्ध करने की इसलिए तो इस हल्दी घाटी के महासंग्राम में भी उसने अपने सेनापति के रूप में आमेर के राजा मान सिंह को भेजा था। 

इस दुर्ग को बनवाने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। कहते हैं, 1443 में इसका निर्माण शुरू करवाया गया था पर इसका निर्माण आगे नहीँ बढ़ पाया। इसके निर्माण कार्य में बहुत सारी अड़चने आने लगी। तब महाराणा कुंभा ने एक पंडित से बात की और उसने उन्हे बताया कि इसका निर्माण तभी संभव है जब कोई मनुष्य स्वेछा से अपनी बली दे तभी इसका निर्माण कार्य संभव हो सकता है। अब सवाल यह था कि इस कार्य के लिए स्वेच्छा से ऐसा कौन करेगा। इस पर साधु बोला मैं स्वयं इस नर बलि के लिये तैयार हूँ।आप बस इतना करना कि जब मैं चलना शुरु करूँ तो आप मुझे देखते रहना और जहां मैं रुक जाऊँ आप वहीं मुझे मार देना और फिर वहाँ एक मंदिर बनवा देना। फिर क्या था जब वह साधु चला तो चलता ही चला गया और 36 किलोमीटर चलने के बाद रुका जैसे ही वह रुका उसका सर धड़ से अलग कर दिया गया। जहाँ उसका सर गिरा वहाँ मुख्य द्वार हनुमान पोल है और जहाँ उसका शरीर गिरा वहाँ दुर्ग का दूसरा गेट बनवाया गया। 

पर जिस तरह हर किले कि कुछ अच्छी तो कुछ बुरी घटनाएं भी होती है ठीक उसी तरह इस किले की भी एक बहुत ही बुरी घटना है। जिस परम् वीर महाराणा कुंभा को कोई नहीं हरा सका उसी महाराणा को स्वयं उनके पुत्र करण उदय द्वारा राजलिप्सा के कारण इसी दुर्ग में मार दिया गया। महाराणा कुंभा के रियासत में कुल 84 जिले आते थे। जिसमें से 32 किलों का नक्शा उनके द्वारा बनाया गया था। एक मान्यता यह भी है महाराणा कुंभा इस किले के निर्माण में लगे हुए मजदूरों को रात में रोशनी प्रदान करने के लिए 50 किलो घी और 100 किलो रुई के बड़े बड़े दीप जलवाया करते थे। ताकि वह भरपूर रोशनी में सुगमता से कार्य कर सकें। कई गुणो के धनी थे महाराणा कुभा। उन्हें संगीत में भी बेहद रुचि थी। यहाँ तक के काई राग रागिनियों के रचीयता भी थे महाराणा कुंभा कहते हैं एक बार को छोड़कर यह दुर्ग हमेशा अजेय ही रहा और जब हार तब दुर्ग में पीने का पानी खत्म हो जाने के कारण जब चारों से चार राजों द्वारा घिर जाने की वजह से केवल एक बार इस किले की हार हुई थी। उन चार राजाओ में मुगल शासक अकबर, अमेर के राजा मान सिंह, मेवाड़ के राजा उदय सिंह और गुजरात के राजा थे।

इस घटना के अतिरिक्त और कभी कभी इस किले के हारने का कहीं कोई प्रमाण नहीं है। इसलिए इसे आज भी अजेय किला माना जाता है।  

15 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (07-04-2021) को  "आओ कोरोना का टीका लगवाएँ"    (चर्चा अंक-4029)  पर भी होगी। 
    --   
    मित्रों! कुछ वर्षों से ब्लॉगों का संक्रमणकाल चल रहा है। परन्तु प्रसन्नता की बात यह है कि ब्लॉग अब भी लिखे जा रहे हैं और नये ब्लॉगों का सृजन भी हो रहा है।आप अन्य सामाजिक साइटों के अतिरिक्त दिल खोलकर दूसरों के ब्लॉगों पर भी अपनी टिप्पणी दीजिए। जिससे कि ब्लॉगों को जीवित रखा जा सके। चर्चा मंच का उद्देश्य उन ब्लॉगों को भी महत्व देना है जो टिप्पणियों के लिए तरसते रहते हैं क्योंकि उनका प्रसारण कहीं हो भी नहीं रहा है। ऐसे में चर्चा मंच विगत बारह वर्षों से अपने धर्म को निभा रहा है। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --  

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  2. बहुत अच्छी रिपोर्टिंग ... चित्र भी बहुत खूबसूरत हैं .

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  3. बहुत विशद वर्णन, बहुत सुंदर ऐतिहासिक स्थान है, आप की मेहनत को दाद देनी होगी, आप की नजरों से बहुत कुछ देखा, राधे राधे

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  4. इतने सुंदर छायाचित्रों के साथ इतना सुंदर वर्णन किया है आपने कि पढ़कर जी कर रहा है कि उड़कर राजस्थान चला जाऊं और इनमें से प्रत्येक स्थान पर जाकर उस मिट्टी, उस वायु के स्पर्श का सुख पाऊं ।

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  5. बेशक सरल, सरस और सुंदर भाषावली ने आपके ब्लॉग को पठनीय बना दिया है

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  6. Shalinee sharma7 April 2021 at 14:25

    आपका ब्लॉग पढ़ कर लग रहा है जैसे हम खुद वहाँ घूम कर आये हैं। वाह बहुत सुंदर ट्रैवल ब्लॉग। keep sharing ����

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  7. बहुत ही सुन्दर यात्रा वृत्तांत

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  8. बहुत ही बढ़िया यात्रा का वर्णन

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  9. विस्तार से आँखों देखी लिखा आपने। बहुत रोचक जानकारी मिली। आपकी यात्रा के साथ हम भी यात्रा कर रहे।

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    1. जी ज़रूर बस यूं ही साथ बना रहे यही कामना है।

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