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Friday, 9 April 2021

राजस्थान डायरी भाग - 4

उदयपुर क्या कहूँ इस जगह के विषय में बस दिल वहीं रह गया और हम चले आये। झीलों की नगरी उदयपुर वैसे तो मैं खुद ही झीलों की नगरी से हूँ अर्थात भोपाल से हूँ। लेकिन यह जो लहराता हुआ पानी है ना, यह खींचता है मुझे अपनी ओर फिर चाहे वह समंदर का किनारा हो या किसी नदी, झील या तालाब का किनारा मेरा मन जैसे हर छोटी बड़ी लहर के साथ डूबता उबरता रहता है इन किनारों पर, कहीं समंदर की बड़ी-बड़ी तेज आवाजों वाली लहरें और कहीं इन झीलों का शांत सा पानी।

खैर मैं विषय से भटकना नहीं चाहती। इसलिए उदयपुर की ओर वापस आती हूँ। यहाँ चार बड़ी झीलें है और कुल मिलाकर 10 दार्शनिक स्थल हैं। जिन्हें देखने के लिए आपके पास कम से कम 2 से 3 दिन का समय तो होना ही चाहिए। पर अफसोस कि हमारे पास इन सभी स्थलों को देखने का पर्याप्त समय नहीं था क्योंकि अभी हमें यहाँ से आगे जोधपुर और जैसलमेर भी घूमना था। तो हम लोग कुछ स्थल ही अच्छे से देख पाए थे। जिनके नाम थे। सिटी पेलेस, जग मंदिर, बागोर की हवेली, पिचोला झील, कार म्यूज़ियम एवं बड़ा बाज़ार  माफ कीजिएगा इस संस्मरण अंगेजी के शब्दों का समावेश कुछ अधिक मिलेगा। लेकिन क्या करें यहाँ के स्थलों के नाम ही ऐसे हैं कि अंग्रेजी का इस्तेमाल किए बिना बताए नहीं जा सकते। 

इसके अतिरिक्त यहाँ देखने के लिए जो अन्य स्थान है उनके नाम कुछ इस प्रकार है। जैसे फतेह सागर झील, बड़ी झील, दूध तलई झील, सहेलियों की बाड़ी, करणी माता का मंदिर आदि।

अब इन सबके विषय में, मैं आपको केवल जानकारी दे सकती हूँ। लेकिन अपने अनुभव नहीं बता सकती और बात तो (मेरे अनुभव) पर म्हारे अनुभव की ही होना चाहिए ना। तो भईया अब हम पहुँच गए झीलों की नगरी उदयपुर, यहां पहुँच कर सच में ऐसा लगा मानो स्वर्ग पहुँच गए। क्या आप जानते हैं उदयपुर को भारत का (वेनिस) भी कहा जाता है। यूँ तो मैंने (वेनिस) भी बहुत अच्छे से घुमा हुआ है। लेकिन फिर भी उदयपुर की बात ही अलग थी। शांत, ठंडा, मन भावन शहर है उदयपुर यदि आपको प्रकृति से प्रेम है और शांति पसंद है, तो यकीन मानिए आपके लिए उदयपुर से अच्छी और कोई जगह हो ही नहीं सकती।

उदयपुर शहर की स्थापन महाराणा प्रताप के बाद सिसोदिया वंश के सम्राट उदय सिंह (द्वितीय) ने 1559 में की थी और जब उन्होंने यह देखा कि मुगल मेवाड़ को शांति से जीने नहीं देंगे तब उन्होंने उदयपुर को अपनी नई राजधानी बनाने का निर्णय लिया। जिसके चलते जब वह इस जगह को देखने आए तो बस यहीं के होकर रह गए। पिचोला नामक गाँव के पास बनी इस झील को देखकर उन्होंने भी इसके निकट ही अपनी राजधानी बसाने का फैसला कर लिया और बस उन्होंने सबसे पहले बनाया यह सिटी पेलेस, जो कि राजस्थान का सबसे बड़ा पेलेस है। जिसे बनाने में करीब 400 साल लग गए। जिसमें उदयसिंह के अलावा आने वाले अन्य शासकों का भी योगदान रहा है।  इस महल का निर्माण 1559 में महाराणा उदयसिंह दिव्तीय ने करवाया था। इस महल के अंदर लगभग 11 सुंदर महल हैं। यह एक पहाड़ी की चोटी पर बनाया हुआ महल है। जिससे पूरे शहर का हवाई दृश्य प्राप्त होता है। आज भी इस पेलेस में राणा प्रताप के वंशज रहा करते हैं। यह बात अलग है कि महल के कुछ हिस्से को अब संग्रहालय में परिवर्तित कर दिया गया है। जहाँ शाही परिवार की तस्वीरों के अतिरिक्त महाराणा प्रताप का कवच, तलवार, भाला आदि भी रखा हुआ है। पूरा महल घूमने में आपको 2 से 3 घंटे का समय लग सकता है। 

वहीं से आप पिचोला झील को देख सकते है। यह इस शहर की सबसे पुरानी झील है, जिसमे बोटिंग करने का मज़ा ही कुछ और है। उदयपुर का मुख्य शहर इसी झील के पास स्थित है यह झील यहाँ आने वालों को अपनी सुंदरता और वातावरण से आकर्षित करती है। 





इसी झील के बीच में स्थित है, दुनिया का सबसे रोमांटिक और सबसे महंगा होटल (द ताज लेक पेलेस) 


इसी झील के किनारे पर स्थित है दुनिया का सबसे महंगा होटल (द ओबेरॉय उदय विलास होटल) 



 



इस बात का अंदाज़ आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अंबानी की बेटी की प्री वेडिंग शूट इसी जगह की गई थी। जिसमें ठहराना सब के बस की बात नहीं, तो फिर इसे बाहर से देखकर खुश हो लेना ही सही है, नहीं...! तो हमनें भी वही किया। इसी के पास एक और मशहूर होटल है (द लीला पेलेस) इसकी भी बात कुछ और ही है। पिचोला झील का नाम इस गाँव पिचोला के आधार पर ही पड़ा था और हाँ इस झील से सूर्य अस्त होता हुआ बड़ा ही सुहाना लगता है मानो डूबता सूरज अपनी सुनहरी लालिमा को इस पानी पर बिखेरता हुआ कह रहा हो जैसे देखो कहीं भूल ना जाने मेरे इस अस्तित्व को कल फिर आना हाँ...! इसलिए शायद इस अद्भुत नज़ारे को देखने का शुल्क 800 रुपये है। वरना दिन में बोटिंग शुल्क 500 रुपये है।


फिर आता है जग मंदिर :- यह झील को बीचों बीच बना बहुत ही सुंदर महल है। जी हाँ यह एक महल है। नाम से लगता है कि यहाँ कोई मंदिर होगा। मगर ऐसा बिल्कुल नहीं है, बल्कि आधुनिक संसाधनों के साथ शाही ठाट बाट देखने का एक अच्छा जरिया है। इस सफेद संगमरमर से बने महल पर लगे झंडे आकर्षण का प्रथम केंद्र बिंदु बनते है। फिर इसके अंदर नीचे ऊपर कमरों आदि की भी व्यवस्था है और एक बड़ा सा फूलों से सुसज्जित बागीचा भी है जहां झील के किनारे टेबल कुर्सी पर बैठकर आप खाने पीने के साथ साथ झील के नज़रों और शहर की सुंदरता का भरपूर आनंद भी ले सकते हैं। 

इस सब के अतिरिकर यहाँ शादी के मंडप जैसे भी छोटे छोटे मंडप टाइप बने हुए हैं। जिसका उपयोग शायद प्री वेडिंग शूट के लिए किया जाता होगा। यूँ भी उदयपुर में ऐसी बहुत से स्थल हैं, जहाँ लोग आजकल प्री वेडिंग शूट के लिए जाते हैं। कई सारी फिल्मों की भी शूटिंग यहाँ हुई हैं। 


फिर वहाँ से लौटकर हम पहुँचे विंटेज कार म्यूज़ियम जहाँ आपको 1935 की एक से एक कारें देखने का मौका मिलता है। जिसे देखकर मेरा तो मन बहुत खुश हो गया। इतना कि उन कारों के समीप फोटो खिंचवा कर मुझे तो खुद में ही एकदम रॉयल फीलिंग आने लगी। खैर वहाँ उस ज़माने की मर्सडीज़ बेंज़ और भी ना जाने कितने तरह की कारें हैं। इतना ही नहीं सब के सब एकदम तंदुरुस्त और चालू अवस्था में है। पता है एक बग्गी भी थी वहां इतनी शानदार कि क्या कहें। आप तस्वीरों में खुद ही देख लो। दिलचसब बात तो यह है कि यहाँ उस वक़्त का एक शाही पेट्रोल पंप भी है। जो अब भी चालू अवस्था में है।

भईया इतना सब घूमने के बाद अब शाम हो चली थी मतलब ऐसी भी शाम नही पर हाँ 3 बज गए थे और हमें लगी थी जोरो की भूख तो भईया अब तो "पहले पेट पूजा बाद में काम दूजा"। तो हम जा पहुँचे एक रेस्टोरेंट में उस वक़्त, फिर क्या था, बस खाना ही खाना दिख रहा था मुझे तो उस वक़्त दाल बाटी, चूरमा, बाफले, कढ़ी गट्टे की सूखी सब्जी, गुलाब जामुन, प्याज़ की कचौड़ी, मिर्ची वड़ा, छाछ,लस्सी मतलब एक ही थाली में इतना कुछ कि मुझे तो सभी पकवानों के नाम भी ठीक से याद नहीं है।

अब भई इतना खाने के बाद किस की दम है कि और घूमा जाय। तो उस दिन हम वापस अपने होटल लौट आए और बिस्तर पर डले-डले देखते और सोचते रहे कि शाम को क्या किया जाय। तब होटल के रिसेप्शन से "बागोर की हवेली" के विषय मे पता चला। तो बस बन गया प्रोग्राम वहीं जाने का वैसे तो यह हवेली भी अपने आप में देखने लायक स्थान है। यह हवेली महाराणा शक्ति सिंह का निवास स्थान थी। 


इस हवेली को भी संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। जो मेवाड़ की संस्कृति को प्रस्तुत करता है। जो सुबह 9:30 से शाम 5:30 बजे तक खुला रहता है एवं रात को 7 से 8 बजे तक यहाँ पर्यटकों के मनोरंजन और उन्हें अपनी सभ्यता और संस्कृति को दिखाने बताने और समझाने के लिए विविध सांस्कृतिक रंगा रंग कार्यक्रम होते हैं। जैसे लोक नृत्य धरोहर, लोक संगीत,कठपुतली का तमाशा आदि स्थानीय कलाकारों की ओर से प्रस्तुत किये जाते है। जिसका मज़ा ही कुछ और होता है। यदि आप लोग भी कभी यहाँ आएँ तो इस कार्यक्रम को ज़रूर देखें। अपनी मिट्टी की सुगंध और उसके प्रति आपका प्रेम, आपका जुड़ाव, आपको यहाँ बाँधे रखेगा। उस दिन पहले ही काफी देर हो चुकी थी कर्यक्रम खत्म होते-होते लगभग 9 बज चुके थे। रात काफी हो चुकी थी और ठंड भी बहुत बढ़ चुकी थी। कुछ स्थानीय लोग अलाव जलाकर हाथ तापते देखने को मिले। पर हम वहाँ से वापस लौट गए अपने होटल।



अगले दिन सुबह वहीं छत पर झील के किनारे नाश्ता करने का आंनद तो शायद मैं कभी नहीं भूलूंगी।


फिर हम निकले निजी बाजार घूमने तो पहुँचे सीधे बड़ा बाज़ार दोस्तों उदयपुर आकर यहाँ आना तो बनता है। यहाँ दिन भर पर्यटकों का तांता लगा रहता है । इस बाज़ार में आपको पारंपरिक राजस्थानी परिधान, बंदिनी साड़ी और पारंपरिक सोने एवं चाँदी के जेवरात भी मिल जाएंगे। इसके अलावा आप मौची वाड़ा जाना भी ना भूलिएगा यहाँ आपको हाथों से बनी बेहद सुंदर जूतियां, मोजड़ी आदि सस्ते दामों में खरीदने का अच्छा अवसर प्राप्त होगा। मैने भी खरीदी थी। 


अब उन स्थलों की बारी जहाँ हम जा नहीं पाये किन्तु आपको जानकारी देना ज़रूर बनता है।

फिर आती है दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी नकली आरिटिफिशल झील जैसमन झील जो कि 14km लंबी है। इस झील को 1685 में महाराणा जयसिंह ने बनवाया था।

फिर आता है सुखाड़िया सर्किल यह जगह अपने फब्बारों की वजह से मशहूर है। यहाँ लगभग 21 फुट ऊंचा फब्बारा ही इस का मुख्य आकर्षण है जिसके चारों ओर बोटिंग की जाती है।  

फिर आता सबसे खूबसूरत बगीचा सहेलियों की बाड़ी, ऐसा कहा जाता है कि महाराणा संग्राम सिंह ने इसे अपनी रानी और उनकी दासियों के लिए भेंट स्वरूप यह स्थान बनवाया था। फतेह सागर झील के किनारे बने यह स्थान बहुत ही खूबसूरत झरने वा हरे भरे लॉन्ज आदि के लिये विख्यात है।

फिर आता है सज्जन गढ़ पेलेस, जिसे मानसून प्लेस के नाम से भी जाना जाता है। इसे मेवाड़ के महाराणा सज्जन सिंह ने 1884 में बारिश के बादलों को पास से देखने के लिए बनवाया था। सच सफेद संगमरमर से बना यह मानसून पेलेस बारिश के दिनों में तो और भी देखने लायक जगह बन जाती होगी।

फिर आती है फतेह सागर झील, यह एक नासपाती के आकार की झील है। जिसे महाराणा फतेह सिंह द्वारा 1678 में विकसित किया गया। यह उदयपुर की चार झीलों में से एक है।

बड़ी झील, यहाँ आप सूर्य उदय का मज़ा ले सकते हैं चारों से पहाड़ियों और प्रकृतिक सुंदरता से घिरी यह झील अपने आप में देखने लायक स्थान है और आज के समय में यह भी एक प्री वैडिंग शूट के लिए एकदम  सही  स्थल है। 

दूध तलई झील, यह भी अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध एक झील है जो अपने साफ सुथरे और नीले रंग के पानी के लिए महशूर है। इसलिए इसका नाम दूध तलाई पड़ा हालांकि इस स्थल से दूध का दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं है।   

फिर आता है जगदीश मंदिर, यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यहां चार भुजाओं वाले भगवान विष्णु की काले पत्थर से बनी मूर्ति है। कहते है यह मंदिर भी लगभग चार सौ 400 साल पुराना मंदिर है। यह मंदिर भी सिटी प्लेस के पास ही स्थित है। साथ ही यह शहर के सबसे बड़े मंदिरों में से एक है। यह मंदिर महाराणा जगत सिंह द्वारा 1651में बनवाया गया था। यदि मंदिरों की बात करें तो यहाँ का एक करणी माता का मंदिर भी प्रसिद्ध ही जो कि एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है जहाँ रोप वे द्वारा जाया जाता है। तो यह था उदयपुर यात्रा का संस्मरण इसके बाद हम निकले जौधपुर की ओर लेकिन उसके अनुभव अगले भाग में तब तक आप आनंद लीजिये इस अद्भुत शहर के मेरे अनुभव का नमस्कार।

Tuesday, 6 April 2021

राजस्थान डायरी भाग-3

अब ऐसा है कि चित्तौड़ का किला घूमने के बाद हमारे अंदर ज्यादा दम नहीं बची थी कि हम अगले दिन फिर एक और किला घूम सकें वो क्या है ना कि इतना चलने फिरने और घूमने की आदत नहीं है हमारी, पर क्या करते राजिस्थान जाकर भी यदि किले ना देखे और ना घूमे तो राजिस्थान यात्रा सफल नहीं होती। होटल पहुँचकर रात्री का भोजन कर जो सोये तो सुबह कब हुई पता ही नहीं चला। फिर वही सुबह उठकर नहा धोकर नाश्ता किया। वो क्या है ना कि मुझे खाने पीने का बहुत शौक है। यह मेरी सेहत को देखकर ही पता चलता है। तो सुबह-सुबह होटल की छत पर ठंडी ठंडी हवा के बीच नाश्ता करने का अपना एक अलग ही आनंद था। गरमा गरम पोहा, जलेबी पूड़ी आलू मटर की सब्जी, सेंडविच, भजिए आदि का नाश्ता भर पेट करने के बाद प्लान बना कुंभलगढ़ घूमने का तब हमने सोचा था चित्तौड़ से निकलने के बाद 2 से 3 घंटे में हम पहुँच जाएँगे कुंभलगढ़। 

लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हमें कुछ अधिक समय लगा जिसके चलते वहाँ पहुँचते ऊपर जाने का मुख्य द्वार बंद हो चुका था। अब क्या किया जाए सबसे पहले तो द्वार बंद होने के कारण बहुत निराशा हुई। फिर हमें लगा अब आ ही गए हैं तो कुछ तो देखकर जाएँगे ही। हाँ नहीं तो ....! तो पता चला शाम को वहाँ लाइट एंड साउंड शो भी होता है। जिसमें महाराणा कुंभा और प्रताप का इतिहास बताया जाता है। तो बस तय हुआ कि यह शो देखकर ही उदयपुर के लिए रवानगी होगी। सो हमने बस टिकिट लिया और वहीं पत्थरों पर बैठकर पूरी शौर्य गाथा सुनी। सच मजा आ गया था उस रात, राजिस्थान के लगभग हर किले में अक्सर शाम को यह लाइट एंड साउंड शो होते हैं। जिन के माध्यम से बाहर से आए पर्यटकों को उस किले और वहाँ के राजा का इतिहास बताया जाता है। 

खैर वह शो देखने के बाद हम उदयपुर के लिए रवाना हो गए। वहाँ होटल पहुँचकर आराम किया और रात के भोजन में होटल की छत पर बने भोजनालय में राजिस्थानी पकवानों का आनंद लिया जैसे गट्टे की सब्जी, कढ़ी, बाजरे की रोटी आदि। फिर सुबह उठकर मजेदार नाश्ता भी किया जो अधिकतर बेसन से बना होता है जैसे ब्रैड पकोड़ा, कांदा भज्जी,फाफड़ा आदि के साथ साथ पोहा, जलेबी, सेंडविचआदि भी विदेशी पर्यटकों के लिए। उनका भी तो ध्यान रखना ज़रूरी है न भाई ...है कि नहीं। फिर हम लोग निकले कुंभलगढ़ के लिए। गयी रात देर हो गयी थी। इसलिए इस बार हम बिना देरी किए सुबह-सुबह ही निकल गए बीच में पड़ी हल्दी घाटी वीरों की माटी हल्दी घाटी किन्तु इस एतिहासिक स्थल को देखने से पूर्व इस से जुड़े अन्य महत्वपूर्ण स्थल भी हैं। जिनके विषय में जानना भी बहुत ही रोचक रहा।

सबसे पहले बादशाही बाग :- यह वह स्थान था जहाँ इस युद्ध के दौरान मुगल सेना ने अपना पड़ाव डाला था। आज यहाँ एक बहुत ही सुंदर बगीचा है और गुलाब से संबन्धित व्यापार होता है जैसे गुलाब का शर्बत, गुलाब का इत्र आदि आप यहाँ से खरीद सकते हैं। यहाँ से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर है।



फिर दूजा पड़ाव आता है रक्त तलई, यह वह स्थान है जहाँ युद्ध का दूसरा मोर्चा लड़ा गया था। जहाँ महाराणा प्रताप पर मुगलों की सेना भारी पड़ गयी थी। इसी युद्ध में महाराणा प्रताप अपने घोड़े चेतक व कुछ सैनिकों के साथ मुगलों की सेना को चीरते हुए मान सिंह की तरफ बड़े और मौका पाकर भाला भी फेंका। किन्तु मान सिंह की जगह उनका महावत मारा गया और हाथी की सूंड में लगी तलवार से यहीं से चेतक घायल हुआ था। यह सब (झाला बिदा) ने जब यह देखा की प्रताप घिर गए हैं तब उन्होने प्रताप की रक्षा हेतु वहाँ अपने कुछ सैनिकों के साथ पहुँचकर उनके मुकुट और राज्य चिन्ह को स्वयं धारण कर उन्हें वहाँ से सुरक्षित निकाल दिया और स्वयं वीरगति को प्राप्त हो गए। कहते हैं यह वह जगह है जहाँ युद्ध के बाद रक्त का तालाब बन गया था। ज़रा सोचिए कैसा रहा होगा वह दृशय जब ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से बहता हुआ रक्त इस जगह आकर एकत्रित हुआ होगा जिसमें अपने वीर राजपूतों के रक्त के साथ-साथ मुगल सैनिकों का रक्त भी शामिल था। कहते हैं इस युद्ध के बाद यहाँ बहुत तेज़ बारिश हुई थी। जिसके कारण युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए यौद्धाओं के कटे फटे शवों से बहता हुआ रक्त जब पानी मिलकर पहाड़ियों से बहता हुआ यहाँ आकर जमा हुआ होगा। कितना भयावह रहा होगा वह नज़ारा हरे भरे जंगलों के बीच खून से भरा हुआ एक लाल तालाब ,मेरे तो सोचकर ही रौंगटे खड़े हो जाते हैं। आज की तारीख में तो फिर भी यहाँ बगीचा है किन्तु पत्थरों की बागड़ बना कर उस स्थान को सुनिश्चित किया गया है और आज भी बारिश के दिनों में यह जगह पानी से भर जाती है। तो वह नज़ारा कैसा रहा होगा।यहाँ कुछ महावीरों की याद में छात्रियाँ भी बनी हुई है। जैसे (झाला बिदा) आदि।  

फिर आता है हल्दी घाटी का दर्रा:- इस दर्रे के बाहर बोर्ड भी लगा है हल्दी घाटी का दर्रा प्रारंभ, हल्दी घाटी का यह युद्ध हुआ था 1576 में, खमनोर और बलीचा गांव के बीच यह दर्रा है। बताने वाले बताते हैं यह ही है वह मुख्य स्थल जहाँ से युद्ध आरंभ हुआ था। तो पहला मोर्चा यही से आरंभ हुआ होगा पहले मोर्चे में प्रताप की सेना मुगलों पर भारी पड़ी थी जिसके चलते प्रताप ने उन्हें 3 km पीछे जाने पर मजबूर कर दिया था। यहाँ ज्यादा अंदर जाने की अनुमति नहीं है सरकार ने यह इलाका बंद कर रखा है पहले यहाँ चंदन का जंगल हुआ करता था और यहीं से आगे जाने पर वह दो सकरी घाटियां हैं जहाँ यह भयंकर युद्ध हुआ था। किन्तु अब भी वहाँ जंगल ही है और जंगली जानवरों का खतरा भी इसलिए अंदर जाना मना है। वहाँ के निवासी बताते हैं रात को यहाँ जंगली जानवरों की आवाज़ बड़ी आसानी से सुनी जा सकती है। 


फिर आती है हल्दी घाटी जो कि रास मन जिले की खमनोर घाटी:- गोगुंदा और खमनोर घाटी के बीच बनी है यह सकरी सी हल्दी घाटी 6 km में फैली हुई है यह वह रोड हैं जो सरकार द्वारा दर्रे के बाहर से निकाली गयी है और यहीं बोर्ड लगा है हल्दी घाटी का यहाँ दोनों और पाहड़ को काट कर रोड बनाई गयी है और इन पहाड़ों की मिट्टी बिलकुल हल्दी की तरह पीली है हाथ से मसलने पर लगता है मानो हाथ में हल्दी लगा ली हो। यहीं है हल्दी घाटी। इसके अतिरिक इस युद्ध में महाराणा प्रताप की ओर से केवल 20,000 सैनिक थे और मुगलों की ओर से 80,000 सैनिक थे। फिर भी वह कभी महाराणा प्रताप को बंदी नहीं बना पाये । 


वहीं से आगे चल कर वो गुफा देखने को मिलती है जहाँ महाराणा प्रताप अपने साथियों  के साथ गुप्त मीटिंग किया करते थे। इस गुफा को प्रताप गुफा या रण मुक्तेश्वर गुफा के नाम से भी जाना जाता है। यहीं पर उनके सेनापति जो कि एक मुस्लिम थे जिनका नाम हाकिम खां सूरी था उनकी भी समाधि बानी हुई है। यह गुफा 35 किलोमीटर लंबी हुआ करती थी जो सीधे नाग द्वारे तक जाती थी। लेकिन अब सरकार द्वारा बंद कर दी गयी है। इसके थोड़ा आगे चलने पर मिलती है चेतक की समाधि ।

फिर आता है वो नाला जिसे चेतक ने पार किया था:- यहीं से आगे चलने पर आप देख सकते हैं वह नाला, जिसे महाराणा प्रताप के घोड़े चेतक ने घायल होते हुए भी अपने स्वामी की जान बचाने की खातिर लंगड़ा था और उसके बाद ही उस घोड़े की मृत्यु हो गयी थी इसलिए यही से थोड़ा आगे आपको मिलेगी चेतक की समाधि,या चेतक स्मारक जहाँ एक और चेतक की याद में उसका स्मारक बना हुआ और दुजी और एक छोटा शिव मंदिर भी है।


यह सब देखते हुए हम पहुँच गए कुंभलगढ़, और भईया वहाँ पहुँचकर जो उस विशालकाय किले को देखा तो एक मन हुआ, ना हो पाएगा इतना कौन चलेगा वो भी इतनी ऊपर रहने दो नीचे नीचे ही घूम लेते हैं। यूं भी सभी किले एक जैसे ही तो होते हैं। लेकिन फिर दूसरे ही क्षण वहाँ का इतिहास जानने और गाइड की चटपटी बातों द्वारा वहाँ कि लोक कथाएँ जानने और सुनने के लालच में हम अंदर चले ही गए, तो भईया आज हम बात करेंगे महाराणा प्रताप की जन्म स्थल कुंभलगढ़ की जिसका निर्माण महाराणा कुंभा ने करवाया था। जो कि एक अजेय किला रहा है। जिसे कभी कोई नहीं जीत ना सका। पूरे 15 साल लगे थे इस किले को बनने में और क्या आप जानते हैं इस किले में बनी दीवार जो कि 36 किलोमीटर लंबी और शायद 15 फिट चौड़ी है जिस पर 8 घौड़े एक साथ दौड़ सकते हैं और यह चीन की द ग्रेट वाल ऑफ चाइना के बाद विश्व की दूसरी सबसे बड़ी दीवार है। है ना कमाल की बात और किले में ऊपर पहुँचने के बाद जब यह दीवार वहाँ बने झरोखों से दिखाई देती है तो किसी विशालकाय अजगर की तरह प्रतीत होती है।  


कुंभलगढ़ किला जो अरावली पर्वत पर बसा हुआ है। यह उदय पुर जिले के राज समन में बसा हुआ है। इस किले का निर्माण 15 वी शताब्दी में सन 1443 में शुरू करवाया था। और यह 1458 को यह किला बनकर तैयार हो गया था। इस किले का निर्माण महाराणा कुंभा ने करवाया था। इसका निर्माण सम्राट अशोक के पुत्र सम्प्रति के बनाये गए दुर्ग के अवशेषों पर किया गया था। इस दुर्ग को बनाने में 15 साल लगे थे। दुर्ग का निर्माण पूर्ण होने पर महाराणा कुंभा ने सिक्के भी बनवाये थे जिस पर इस दुर्ग का चित्र और उनका नाम अंकित था। यह दुर्ग कई पहाड़ियों एवं घाटियों को मिलाकर बनाया गया है। जिस से यह प्राकृतिक संरक्षण पाकर अजेय रहा है। इस दुर्ग में ऊंचे स्थानों पर महल मंदिर वा आवासीय स्थल बनाये गए हैं, साथ ही समतल भूमि का उपयोग कृषि कार्य के लिए किया गया है। इस दुर्ग के अंदर 360 से ज्यादा मन्दिर है। जिन में से 300 प्राचीन जैन मंदिर है और बाकी सभी हिन्दू मंदिर है। 

इन्हीं मंदिरों में से एक है कुंभा मंदिर जिसके अंदर 5 फिट ऊँचा शिवलिंग विराज मान है। कहते हैं उस वक़्त के राजा महाराजाओं का कद बहुत ऊँचा हुआ करता था इसलिए इस शिवलिंग का तिलक स्वयं महाराणा कुंभा जमीन पर बैठकर कर लिया करते थे। कितने ऊँचे रहे होंगे ना वह, यूं भी संग्रहालयों में रखे हुए उनके वस्त्र कवच आदि की ऊँचाई देखकर भी आश्चर्य होता है कितनी अधिक ऊँचाई के लोग होते वह आजकल तो इतना ऊंचा व्यक्ति कोई कोई होता है। मेरे लिए इस किले में देखने लायक सबसे महत्वपूर्ण स्थान वह था जहाँ जिस कक्ष में महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। कहने को वह ऊपरी मंजिल पर बना एक साधारण कक्ष ही था जहाँ एक दो जगह दीपक जलाने के लिए ताख बने हुए थे और हवा के लिए एक बड़ा झरोखा था बस एक छोटा सा कमरा लेकिन उस किले का एक महत्वपूर्ण स्थान। मैंने वहाँ कि मिट्टी भी ली थी एक सुनहरी याद के लिए। वहीं किले कि छत पर कुछ छोटे-छोटे खंभ लगे थे कुछ इस तरह जैसे खो-खो खेलने के लिए बैठा जाता है वैसे, उन खंभो को देखकर मुझे ऐसा महसूस हुआ कि महाराणा प्रताप भी यहाँ खेले होंगे शायद क्यूंकि उनका बचपन तो यहीं व्यतीत हुआ था। बाद में वह चित्तौड़ गए थे। उन खंबों को छूकर मन में वही विचार आया कभी इन खंबों को उन्होने छुआ होगा खेल खेल में काश उन हाथों कि छुअन को हम आज भी महसूस कर पाते तो कैसा होता। नहीं...! 


खैर इस दुर्ग के अंदर एक और गढ़ है जिसे कतार गढ़ के नाम से जाना जाता है। यह दुर्ग सात विशाल द्वारों से सुरक्षित है। इस के बीच के भाग में बादल महल एवं कुम्भा महल सबसे ऊपर है। महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुंभलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकट कालीन राजधानी रहा है। महाराण कुम्भा से लेकर महाराण राज सिंह तक मेवाड़ पर जितने भी हलमे हुए राज परिवार इसी दुर्ग में रहा। यहीं पर प्रथ्वीराज और महाराणा सांगा का बचपन भी बिता था। इतना ही नहीं बल्कि पन्ना दाई ने भी राणा उदय सिंह जी का पालन पोषण इसी दुर्ग में छिपाकर किया था। हल्दी घाटी के युद्ध में हार जाने के बाद स्वयं महाराणा प्रताप भी इसी दुर्ग में रहे थे। हालांकि इस हार जाना नहीं कहेंगे क्यूंकि इस युद्ध में विजय किसी की ना हुई। पर फिर भी जब उनकी जान बचाने की खातिर उनको इस युद्ध भूमि से सुरक्षित बाहर निकाल दिया गया ताकि वह जीवित रह सके। क्यूंकि उनके अतिरिक्त ऐसा कोई नहीं था जो मुगलों से मेवाड़ की रक्षा कर सकता था। केवल एक वही थे जिन्होंनें कभी मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की बाकी तो अधिकतर राजपूती राजवंशों ने उस वक़्त मुगलों की आधीनता स्वीकार कर ली थी इतना ही नहीं बादशाह अकबर की खुद की कभी हिम्मत नहीं हुई उनसे सीधा युद्ध करने की इसलिए तो इस हल्दी घाटी के महासंग्राम में भी उसने अपने सेनापति के रूप में आमेर के राजा मान सिंह को भेजा था। 

इस दुर्ग को बनवाने की कहानी भी बड़ी दिलचस्प है। कहते हैं, 1443 में इसका निर्माण शुरू करवाया गया था पर इसका निर्माण आगे नहीँ बढ़ पाया। इसके निर्माण कार्य में बहुत सारी अड़चने आने लगी। तब महाराणा कुंभा ने एक पंडित से बात की और उसने उन्हे बताया कि इसका निर्माण तभी संभव है जब कोई मनुष्य स्वेछा से अपनी बली दे तभी इसका निर्माण कार्य संभव हो सकता है। अब सवाल यह था कि इस कार्य के लिए स्वेच्छा से ऐसा कौन करेगा। इस पर साधु बोला मैं स्वयं इस नर बलि के लिये तैयार हूँ।आप बस इतना करना कि जब मैं चलना शुरु करूँ तो आप मुझे देखते रहना और जहां मैं रुक जाऊँ आप वहीं मुझे मार देना और फिर वहाँ एक मंदिर बनवा देना। फिर क्या था जब वह साधु चला तो चलता ही चला गया और 36 किलोमीटर चलने के बाद रुका जैसे ही वह रुका उसका सर धड़ से अलग कर दिया गया। जहाँ उसका सर गिरा वहाँ मुख्य द्वार हनुमान पोल है और जहाँ उसका शरीर गिरा वहाँ दुर्ग का दूसरा गेट बनवाया गया। 

पर जिस तरह हर किले कि कुछ अच्छी तो कुछ बुरी घटनाएं भी होती है ठीक उसी तरह इस किले की भी एक बहुत ही बुरी घटना है। जिस परम् वीर महाराणा कुंभा को कोई नहीं हरा सका उसी महाराणा को स्वयं उनके पुत्र करण उदय द्वारा राजलिप्सा के कारण इसी दुर्ग में मार दिया गया। महाराणा कुंभा के रियासत में कुल 84 जिले आते थे। जिसमें से 32 किलों का नक्शा उनके द्वारा बनाया गया था। एक मान्यता यह भी है महाराणा कुंभा इस किले के निर्माण में लगे हुए मजदूरों को रात में रोशनी प्रदान करने के लिए 50 किलो घी और 100 किलो रुई के बड़े बड़े दीप जलवाया करते थे। ताकि वह भरपूर रोशनी में सुगमता से कार्य कर सकें। कई गुणो के धनी थे महाराणा कुभा। उन्हें संगीत में भी बेहद रुचि थी। यहाँ तक के काई राग रागिनियों के रचीयता भी थे महाराणा कुंभा कहते हैं एक बार को छोड़कर यह दुर्ग हमेशा अजेय ही रहा और जब हार तब दुर्ग में पीने का पानी खत्म हो जाने के कारण जब चारों से चार राजों द्वारा घिर जाने की वजह से केवल एक बार इस किले की हार हुई थी। उन चार राजाओ में मुगल शासक अकबर, अमेर के राजा मान सिंह, मेवाड़ के राजा उदय सिंह और गुजरात के राजा थे।

इस घटना के अतिरिक्त और कभी कभी इस किले के हारने का कहीं कोई प्रमाण नहीं है। इसलिए इसे आज भी अजेय किला माना जाता है।  

Friday, 2 April 2021

राजस्थान डायरी भाग-2

अब बात आती है किले के अंदर प्रवेश करने के बाद क्या हुआ यह जानने की है ना..! आप सब भी इसी का इंतज़ार कर रहे थे। तो चलिये आपको लिए चलते हैं उस विशाल किले के अंदर जिसके अंदर एक नहीं बल्कि कई सारे महल एवं मंदिर भी हैं। जिनमें से कुछ जैन मंदिर हैं और कुछ हिन्दू मंदिर है। कहते हैं महाराणा कुंभा का राज्य मेवाड़ का स्वर्ण काल कहलाता है। इस किले मे प्रवेश करते ही सबसे पहले देखने को मिलता है। पुरातत्व कार्यालय और संग्रहालय चित्तौड़गढ़ किले के शुरुआती भाग में तोप खाना नामक स्थान है। जहां उस समय की कई बड़ी और छोटी तोपों को संग्रहित कर रखा गया है। इसके अलावा ठीक इसी के पास एक संग्रहालय और भी है जहां किले और पुराने मंदिरों की कुछ पुरानी मूर्तियों को भी संग्रहित कर के रखा गया है जो कि कभी खुदाई में मिली थी। इसलिए यह जगह इतिहासकारों की नज़र में यह एक महत्वपूर्ण स्थान हो सकता है इसके अलावा इसी किले में महारानी पद्मिनी के पति राजा रावल रत्न सिंह जी का महल भी है। उन्होने चित्रकूट यानी चित्तौड़ पर शासन भी किया था। अब यदि राजा रत्न सिंह जी की बात की जाय तो उनके विषय में अधिक जानकारी मलिक मोहम्मद जायसी द्वारा लिखी गयी कविता पद्मावत में देखने को मिलती है यह कविता 1540 में रचित की गई थी।1303 इसवी में खिलजी द्वारा आक्रमण करने पर युद्ध के दौरान महाराणा रावल रतन सिंह जी वीर गति को प्राप्त हो गए थे और इस समाचार के मिलने के बाद ही महारानी पद्मिनी ने 16,000 क्षत्राणियों के साथ जौहर किया था। खैर उस विषय में हम बाद में बात करेंगे। 

इसके आलवा इस किले में दूसरे नंबर पर आता है जैन कीर्ति स्तंभ। जिसका निर्माण जैन दिगंबर संप्रदाय के बगैर वाला महाजन ने करवाया था। इसके पास ही महावीर स्वामी का एक जैन मंदिर भी बना हुआ है इस सड़क पर आगे चलने पर एक बड़ा दरवाजा दिखाई देता है। जहाँ आगे चल कर देखने पर पूरा चित्तौड़ दिखाई देता है। आस पास मृग वन भी है। जहाँ पहुँच कर हिरण से लेकर अन्य वन जीवों को देखने का आनंद प्राप्त किया जा सकता है। 


फिर तीसरे नंबर पर आता है पद्मिनी महल सूर्य कुंड के दक्षिण में राजा रावल रत्न सिंह की पत्नी महारानी पद्मिनी का महल आता है। जिसके कमरों में बड़े बड़े काँच लगे हुए हैं। जिनमें पानी के बीच में बने महल के अंदर का प्रतिबिंब नज़र आता है बाकी पद्मिनी और खिलजी का किस्सा तो सभी को पता ही है। हालांकि वहाँ के लोगो इस घटना को सत्य नहीं मानते। किन्तु फिर भी यह किस्सा इतिहास में दर्ज है। ऐसा कहा जाता है कि रानी पद्मिनी ने उसी अपने पानी वाले महल की सीढ़ियों पर बैठकर पानी में बना अपना प्रतिबिंब दूसरी और बने महल की खिड़की में लगे काँच में खिलजी को दिखाया था। जिसे देखकर वह इतना मोहित हो गया था कि हर हाल में वह उन्हें पाने की ज़िद्द कर बैठा था और उसी लालसा के चलते उसने राजा रतन सिंह को धोखे से बंदी बनाकर किले पर चढ़ाई की थी और रानी पद्मिनी के आगे यह शर्त रखी थी कि यदि वह उससे विवाह करने के लिए नहीं मानी और दिल्ली ना आई तो वह रतन सिंह जो को मार देगा। लेकिन रानी फिर भी राजी ना हुई और उन्होने गौरा और बादल के साथ मिलकर रतन सिंह जी को छुड़ाने की यौजना बनाई और वह उस यौजना में कामयाब भी रहीं। किन्तु इस लड़ाई में वीर (गोरा और बादल) अपने राजा और रानी का मान बचाने के लिए वीर गति को प्राप्त हो गए। इनकी कथा भी निराली है। 

फिर चौथे नंबर पर आता है।  कालिका माता का मंदिर यह मंदिर जयमल और पत्ता महल के दक्षिण में सड़क के पश्चिमी किनारे पर कालिका माता का सुंदर विशाल बहुत ही प्राचीन मंदिर है। मंदिर की दीवारों पर बाहरी आकृतियों को देखते हुए ऐसा लगता है कि यह पहले शायद सूर्य मंदिर रहा होगा क्यूंकि मंदिर के बाहरी द्वार पर खुदी हुई सूर्य की मूर्ति और गर्भ गृह के बाहर आनेक भागों में स्थापित सूर्य की मूर्ति देखने को मिलती है। नवरात्रि के दिनों में यहाँ मेला लगता है और दूर दूर से यात्री यहाँ दर्शन के लिए आज भी आते हैं। 

फिर पांचवाँ आता है, महाराना कुंभा के महल जो कि एक बहुत ही प्राचीन महल है। यही महल कुंभा महल के नाम से प्रसिद्ध है। कुंभा महल के दक्षिण और पश्चिम के भाग में कवर पड़ा महल के खंडहर हैं।  जहाँ उदय सिंह का जन्म, पन्ना दाई का बलिदान और मीरा का मंदिर भी विद्यमान हैं। जहाँ महाराणा विक्रमादित्य द्वारा मीरा का विष पान कराना आदि घटनाओं का होना बताया जाता है। लेकिन इन सब स्थलों का भी अपना एक अलग ही महत्व है। जिसकी कल्पना मात्र से दिल दहल उठता है। कैसे एक माँ ने अपने राज दुलारे का बलिदान दिया होगा। एक राजकुमार को बचाने की खातिर क्या और कैसे आया होगा उनके मन में यह विचार कि ऐसा करने से वह अपने राज्य और राजा के प्रति अपनी वफादारी का प्रमाण दे सकती हैं। ऐसे बलिदान को सुनकर तो पत्थर भी टूट जाये। फिर उन्होंने ना जाने कहाँ से पायी होगी उस रोज़ इतनी हिम्मत और इस सब में उस मासूम की भला क्या गलती थी। सोच सोचकर तो मेरा कलेजा आज भी मुंह को आता है। अपने बच्चों की जान की खातिर तो जानवार भी जान पर खेल जाता है। फिर पन्ना दाई को उस वक़्त क्या हुआ था यह तो ईश्वर ही जाने शायद देश प्रेम ही ऐसी हिम्मत दे सकता है। अथवा तो एक माँ के लिए यह कतई मुमकिन नहीं शत शत प्रणाम है उस माँ को जिसने अपने राज्य की खातिर यह बलिदान दिया। 


वहीं एक ओर है मीरा बाई का वह मंदिर जहाँ उन्होने श्री कृष्ण की आराधना की उनकी भक्ति में लीन होकर विष पान तक किया। परंतु इस सब में मेरे आकर्षण का केंद्र रहे उस मंदिर के अंदर लगे वो पत्थर हैं। जो गवाह है उस चमत्कार के जो उस रोज़ हुआ होगा। हर एक पत्थर को छूकर ऐसा प्रतीत होता है मानो अभी बोल पड़ेंगे। अगर वाकई पत्थरों और मिट्टी में सोखने की शक्ति होती है तो इन पत्थरों ने भी सोख लिया होगा प्रभू के साक्षात होने का अनुभव क्यूंकि एक असीम शांति का अनुभव होता है। जैसे मानो आज भी श्री कृष्ण का वास हो वहाँ, यूं भी ऐसा कहा जाता है ना कि जहाँ कहीं भी सच्चे मन से प्रभू की वंदना हो वहाँ भगवान स्वयं हमेशा के लिए विराजमान हो जाते हैं और फिर यह तो मीरा बाई का मंदिर है। मेरा सुझाव है आप लोग यदि घूमने आए तो इस मंदिर के दर्शन और अनुभव अवश्य कर के जाये। आपको भी वही अनुभव होगा जो मुझे हुआ।

हालांकि ऐसा कहते हैं वहाँ अब वह पूरानी मूर्ति नहीं है श्री कृष्ण की वह तो कब की सरकार द्वारा हटा दी गयी शायद वह चाँदी की रही थी। अब तो वहाँ संगमरमर की मूर्ति विराजमान है। पर तब भी मंदिर के अंदर कदम रखते ही एक अलग ही एहसास होता है एक अजीब से ठंडक जो दिल को सुकून दे जाती है एक मन भावन शांति। कुछ ऐसा जिसे शब्दों में नहीं पिरोया जा सकता।  


फिर आता है छठा स्थल विजय स्तंभ 122ft ऊंचा  9 मंज़िला एक खंभ जिसमें ऊपर की और जाने के लिए 157 सीढ़ियां लगी हुई है। इस स्मारक के अंदर और बहारी भागों में कई प्रकार के पौराणिक देवी देवताओं ऋतुओं नदियों एवं जग जीवन की सुंदर आकृतियाँ बनी हुई है। इसका निर्माण  महाराजा कुंभा ने करवाया था। मडू मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी और गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन की सयुंक्त सेना पर महाराणा कुंभा की विजय की स्मृति में स्वयं महाराणा कुंभा के इस स्तंभ का निर्माण कराया था। इसलिए इसे विजय का स्वरूप माना जाता है। इसी कारण इसका नाम विजय स्तंभ रखा गया था। कहते हैं इसकी सबसे ऊपरी छत्री पर बिजली गिर जाने के कारण वे ध्वस्त हो गयी थी। जिसका जीर्ण उद्धार उदयपुर के महाराणा स्वरूप सिंह जी ने करवाया था।



 
फिर आता है वह सातवाँ स्थल जिसके विषय में सोचकर आज भी मेरे रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उस स्थल का नाम है महा सती स्थल जहाँ महारानी पद्मिनी ने अपनी 16,000 क्षत्राणियों के साथ जौहर किया था। यह स्थल विजय स्तंभ और सीमितेश्वर मंदिर के बीच में बना यह स्थल है। जिसे महाराणाओं और राज्य परिवार का श्मशान स्थल भी कहा जाता था। जहाँ अनेक क्षत्राणियों ने जौहर किया था। यही वो स्थल हैं 
जहाँ जौहर स्थल का बोर्ड लगा हुआ है।
 

यहाँ पहले एक बहुत विशाल गड्ढा हुआ करता था । जहाँ महल में उपयोग की जाने वाली ज्वलंत वस्तुओं का संग्रह किया जाता था। जैसे भोजन आदि बनाने के लिए तेल, घी, पूजा के लिए चंदन की लकड़ी कपूर आदि। शायद इसलिए इस जगह को जौहर के उपयुक्त स्थान माना गया होगा क्यूंकि यहाँ रखी सामग्री समय के अभाव में जल्दी आग पकड़ सकती थी। तभी तो खिलजी द्वारा महाराणा राव रत्न सिंह जी के वीर गति को प्राप्त हो जाने की सूचना मिलने पर महारानी पद्मिनी ने इसमें जौहर किया था। जिसमें सब से पहले उन्होने ही खुद कूद कर अपनी आन बान और शान की खातिर अपने प्राणो की आहुती दी थी। उनके बाद एक एक कर उनकी सभी क्षत्राणियों ने भी इसी हवन कुंड में खुद कर अपने प्राणों का बलिदान दिया था। यही वो स्थल हैं जहाँ जौहर स्थल का बोर्ड लगा हुआ है। लेकिन उस विशाल मैदान को देखकर मन में जौहर की जो कल्पना बनती हैं उसको बयान करने के लिए मैं निशब्द हूँ यदि सच में 16000 लोगों को पंक्ति बद्ध कर इस जगह खड़ा किया जाये तो सच में इतनी जगह लगेगी जितना बड़ा यह स्थल है इतनी बड़ी और विशाल जगह पर ज़रा सोचिए कितना बड़ा हवन कुंड तैयार किया गया होगा जिसमें कूदकर उन क्षत्राणियों ने वहाँ जौहर किया उनकी उस बहादुरी को मेरा सलाम हम आप तो शायद उस मंज़र की कल्पना भी ठीक से नहीं कर सकते कि कैसा रहा होगा वह दृश्य, वह समय, वह घड़ी, वह माहौल, हजारों क्षत्राणियों का वह जय भवानी का जयकारा उनकी चीखे उनकी पीड़ा सोचकर होश उड़ जाते हैं।

कहते हैं यहाँ खुदाई के वक़्त राख़ और हड्डियों के अवशेष भी पाये गए थे जो सबूत थे इस बात का यह कोई कहानी नहीं बल्कि एक सच्ची घटना थी। आज उस स्थल को देखकर जब कल्पना की दृष्टि से वह दृश्य आँखों में बनता है तो आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं ।

मुझे नहीं पता कि इन सब बातों में कितनी सत्यता है। लेकिन फिर भी इन कहानियों को सुकर पढ़कर यहाँ की मिट्टी को प्रणाम करने का मन करता है और मैंने ऐसा किया भी, एक अजीब सा सुकून एक आजीब सा गर्व एक अलग ही अनुभव था उस रोज़ उस मिट्टी को गले लगा के माथे पे सजाने का जब दिल से प्रणाम निकला उस रोज, ऐसा लगा मानो कल की ही बात हो। उस उद्यान में खिले फूलों में से एक पूल तोडकर मैंने सहज लिया। इस पवित्र स्थल की निशानी जानकार। ऐसा नहीं कि केवल एक यही जौहर हुआ था यहाँ पर इसके अतिरिक्त और भी दो जौहर हुए हैं यहाँ पर सबसे ज्यादा प्रचलित जौहर यही है।

इसके बाद आता है आठवाँ स्थल, जिसे गोमुख कुंड  के नाम से जाना जाता है  चित्तौड़ गढ़ किले पर बने इस गो मुख कुंड में जो गाय के मुख की तरह दिखाई देता है, से लगातार प्राकृतिक तरीके से शिवलिंग पर एक झरने के रूप में गिरता रहता है। यहाँ से बाहर आने पर दक्षिण की और जाने वाले रास्ते के दोनों ओर जलाशय दिखाई देते हैं जहाँ एक और हाथी का कुंड है जहाँ पहले हाथी पानी पिया करते थे और दूसरी और बावड़ी के रूप में एक जलाशय है। तो यह था चित्तौड़ का वह एतिहासिक किला। 

आगे मिलेंगे महारणा प्रताप के जन्म स्थल कुंभलगढ़ के किले में, तब तक के लिए नमस्कार 

Wednesday, 31 March 2021

राजस्थान डायरी भाग -1


आइये आज से आपको अपने साथ थोड़ा राजस्थान घुमाते हैं। आज बहुत दिनों बाद एक पुरानी डायरी हाथ लगी, पढ़ने पर कुछ ऐसा मिला जिसे पढ़कर इस बात का आश्चर्य हुआ कि आज तक इसे ब्लॉग पर क्यूँ नहीं डाला गया। इसे तो बहुत पहले ही लिख दिया जाना चाहिए था। पर अक्सर ऐसा होता है कि कई बार लैपटाप से ज्यादा डायरी लिखना अधिक सुखद लगता है, इसलिए शायद यह अब तक डायरी के पन्नो में ही रहा। किन्तु अब ऐसा नहीं होगा। राजस्थान से कौन वाकिफ नहीं है। अपनी लोक संस्कृति और कला को अपने आप में आज भी समेटे एक अद्भुत राज्य है राजस्थान । बहुत कम ऐसे स्थल रह गए हैं, जिन्होंने आज भी अपनी संस्कृति को बचाकर रखा हुआ है वरना तो आजकल आधुनिकरण ने पुरानी सभ्यताओं और संस्कृतियों को बहुत हद तक धूमिल कर दिया है। 

लेकिन राजस्थान में ऐसा नहीं है। वहाँ के लोगों में आज भी उनके पहनावे, उनकी बोली, उनके लोक नृत्य और संगीत में उनकी पहचान बखूबी दिखायी देती है। जिसकी जितनी भी प्रशंसा की जाये कम है। उसी राज्य का एक छोटा सा शहर चित्तौड़गढ़ जो ना जाने अपने अंदर कितनी ही गौरव गाथाओं को समेटे हुए है। यूं तो इसका इतिहास आपको इंटरनेट पर ढूँढने से भी मिल जायेगा। किन्तु मैं यहाँ अपने राजस्थान भ्रमण की यात्रा के कुछ अनुभव सांझा करने जा रही हूँ। लेकिन खुद को उस गौरव शाली इतिहास का अंश मात्र भी समझने के लिए, उसे महसूस करने के लिए और उस पर गर्व से सर उठाकर यह कहने के लिए कि आप उस देश के वासी हैं, जहां भारत माता के ऐसे सपूतों ने जन्म लिया, जिनका नाम भर सुनने मात्र से आपके के मन में देश भक्ति की भावना जागृत हो उठती है। 

महाराणा प्रताप के पिता जी उदयसिंग जी का शहर चित्तौड़गढ़, रानी पद्मावती का गढ़ चित्तौड़गढ़ और क्या कहूँ बस यादें ही घूम रही है आँखों में इस वक़्त।   

खैर बात 2016 की है जब हम ने राजस्थान घूमने का तय किया दिसंबर का महिना था। घर से निकलते ही अर्थात हमें अपने शहर पुणे से निकलर मुंबई जाना था। यूं तो हम हवाई यात्रा भी कर सकते थे पर मुझे अधिकतर रेल यात्रा ही पसंद आती है। उस रोज़ भी हमें मुंबई से ट्रेन पकडनी थी रात में ही ना जाने कहाँ खो गया था मन, इसी बीच मुंबई पुणे हाइवे पर वाहनों की आवा जाही को देखते हुए भी महसूस हुआ ईश्वर का नाम और उसके प्रति लोगों का अटूट विश्वास देखकर ही मन में यह विचार आया कि वाहन आदि पर अंकित ईश्वर का नाम या फिर उन महानुभाव का नाम को आम जन के लिए ईश्वर तुल्य हैं, सिर्फ दिखावे या अंधविश्वास का प्रतीक नहीं होते। बल्कि वह प्रतीक होते हैं उस अटल विश्वास और आस्था का, कि चाहे उनकी यात्रा कहीं की भी हो, कैसे भी हो किन्तु उनका ईश्वर उनका गुरु, सदा उनके साथ है ,उनके पास है। गोल घुमावदार रास्तों और ऊँची ऊँची चट्टानों को पीछे छोड़ते हुए हम बस आगे की और चले जा रहे थे। 

बीच में पड़ती लम्बी अँधेरी टनल और उसमें चल रही गाड़ियों की टिम टिमाती लाल पीली बातियाँ कुछ कुछ बचपन के वह दिन याद दिला रही थी जब सर्दियों में रज़ाई के अंदर टॉर्च जलाकर घंटो बातें किया करते थे। कुछ ऐसी ही यादों में कट गया समय और हम पहुँच गए मुंबई के बांद्रा स्टेशन। वहाँ यात्रियों का कोलाहल और राजस्थान जाने की उत्सुकता ने एक अजीब सी खुशी का संचार कर दिया था मेरे अंदर और इसलिए यह कह पाना बहुत कठिन है मेरे लिए कि मैं उस वक्त क्या महसूस कर रही थी। बस इतना कह सकती हूँ कि मैं बहुत उत्साहित थी किसी छोटे बच्चे की तरह, फिर क्या था कुछ ही समय बाद रेल चली रास्ते भर ना जाने कितने गाँव, शहर और प्राकृतिक सुंदरता का रसपान करने को मिला। तीन अलग राज्यों के विभिन्न संस्कृति को देखने समझने का अनुभव हुआ।  

महाराष्ट्र का तो पहले से ही था क्यूँकि हम रहते वही हैं। किन्तु इस यात्रा के दौरान गुजरात और राजस्थान का भी अनुभव हुआ। हालांकि गुजरात के तो कुछ ही शहरों को छुआ रेल ने लेकिन वहाँ के लोगो जो हमारे साथ उसी रेल में यात्रा कर रहे थे, उनकी बोली और पहनावे से गुजरात की सभ्यता और संस्कृति की झलक देखने को मिल रही थी। कहीं एक दम मीठा तो कहीं एकदम तीखा जैसा मुझे पसंद है। जैसा स्वाद भी मिला खाने को, भला इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है। नहीं....! जैसे जैसे रेल आगे बढ़ती गयी, वैसे वैसे यात्रियों की बोली और पहनावा ही उनकी पहचान बताने लगा था। 

यूँ ही यात्रा का आनंद लेते-लेते हम लोग रात के तीन बजे पहुँचे चित्तौड़गढ़, अब आप लोग सोच सकते हैं एक तो पहले ही राजस्थान, ऊपर से दिसंबर का महिना और रात के तीन बजे का समय भाई साहब...कड़ाके की ठंड और हम महाराष्ट्र वासी जो बिचारे कभी ठंड का अनुभव ही नहीं कर पाते। उनके लिए कैसी ठंड रही होगी, ऊपर से देर रात के चलते वहाँ कि आम जनता कंबल और वह पतली वाली राजई वो क्या कहते हैं उसे ....वही ओढ़े घूम रहे थे सब के सब ऐसे संदिग्ध दिखाई दे रहे थे, कि पूछिये ही मत। गर्म कपड़े एवं कंबल आदि से इतने ज्यादा ढके हुए थे लोग कि ना तो उनका चेहरा ही दिखाई देता था ना शरीर केवल आवाज़ ही सुनाई देती थी।  

हम लोग उतरते ही ठंड से काँप उठे थे। इसलिए पहले यह तय हुआ कि पहले चाय पी जायेगी फिर होटल की ओर रवाना हुआ जाएगा। सो भईया पहले चाय पी गयी। फिर वहीं गरम कपड़े जैसे जैकेट, स्वेटर आदि निकाले गए जो मैंने पहले ही ऊपर रखे हुए थे और डटा लिए गए। सो चाय के समापन के बाद चला कारवां आगे। जो सीधा होटल पहुंचा चार बजे। वहाँ पहुँचते से ही चेक-इन करने के बाद दो घंटे आराम करने के उठे, फिर नहा धोकर नाश्ता किया और सबसे पहले चित्तौढ़गढ़ का किला घूमना तय हुआ। सफर की थकान के कारण हमें निकलने में देर हो गयी निकलना था 9 बजे किन्तु 10 बज चुके थे। राजस्थान में उन दिनों, दिन तो गरम था, किन्तु रात उतनी ही ठंडी हुआ करती थी।  

खैर वहाँ पहुँचकर मन का उत्साह इतना था मानो आज ही किसी एतिहासिक व्यक्ति से भेंट हो जायेगी। सब जानते हैं ऐसा कुछ नहीं होना था, यह तो बस मन का उत्साह और कहानियाँ पढ़-पढ़कर कल्पनाओं में बने चरित्रों की देन थी। 

अब बात आती है मेवाड़ की राजधानी कहे जाने वाले उस शहर की जिसे हम सब चित्तौड़गढ़ के नाम से जानते हैं और वहीं बना है वो भव्य चित्तौड़ का किला जिसे देखने के लिए आज भी सैलानी हर साल दूर दूर से आते हैं। जहां का गौरव शाली इतिहास आज भी उन्हें अपनी ओर खींच खींच कर बुलाता है। वह भव्य किला जो 700 एकड़ ज़मीन में फैला हुआ है। जिसे देखने के लिए आपको सर्व प्रथम नीचे से टिकट लेना होगा। किले तक पहुंचने का रास्ता आसान नहीं है। आपको यहाँ पहुँचने के लिए एक खड़े और गुमादार रास्ते से एक मील चलना होता है। इस किले के 7 नुकीले दरवाजे हैं। जिनका नाम हिन्दू देवताओं के नाम पर रखा गया है। इतना ही नहीं इस किले के अंदर महारानी पद्मिनी और महाराणा कुंभा के भव्य महल भी है। दुर्ग के मुख्य द्वार में प्रवेश करने से पहले आपको सात 7 द्वार पार करने पड़ते है, जिन्हे पोल कहा जाता है। पदन पोल, भैरों पोल, हनुमान पोल, गणेश पोल, जोरला पोल, लक्ष्मण पोल और आखिरी राम पोल। जो नीचे से शुरू होते हैं, अरे...अरे घबराई ये नहीं ...टॅक्सी/टेम्पो ऊपर तक जाती है। आपको पैदल चलने की जरूरत नहीं है। यह सात द्वार पार कर लेने के बाद ही मुख्य द्वार में प्रवेश मिलता है। इन सातों द्वारों को पार करने का रास्ता घुमादार बनाया गया है। ताकि दुश्मन आसानी से किसी भी द्वार को भेद कर किले के अंदर प्रवेश ना कर सके।....सो हमने भी अपनी यात्रा नीचे से आरंभ की और बीच-बीच रुककर देखा हर एक द्वार को और पहुँच गए ऊपर फिर क्या हुआ यह जानने के लिए प्रतीक्षा कीजिये । 


आगे आँखों देखा हाल अर्थात अपना अनुभव अगले भाग में ....