Thursday, 12 March 2026

चरक -आस्था का मेला

 

 


मंत्र तंत्र, टोना टोटका, काला जादू, काली विद्या, और भी ना जाने क्या क्या इसी सब में लिप्त एक अलग ही दुनिया जिसमें विश्वास आस्था अंधविश्वास तर्क कुतर्क जैसे शब्द या विचार कुछ क्षणों के लिए सब शून्य हो जाते है. हमारी शिक्षा हमें सही गलत में भेद करना सिखाती है इसलिए हमारा दिमाग तर्क ढूंढता है. लेकिन यह फ़िल्म आपको एक ऐसी विस्मय से भरी दुनिया में ले जाती है कि यह सारे शब्द मानो किसी काली गहरी स्याही में घुल जाते है और कुछ ही समय में यह फिल्म आपको अपने ही रंग में रंग एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जो आपकी वास्तविक दुनिया से बिलकुल विपरीत एक बहुत अलग ही दुनिया है. जहाँ मनुष्य तो है, लेकिन हमारे जैसे नहीं है. यूँ भी बंगाल का काला जादू किसी परिचय का मोहताज नहीं है. जब भी काले जादू की बात होती है सबसे पहले बंगाल का ही नाम दिमाग में आता है.


यूँ तो इस विषय पर फिल्में पहले भी बनी है और बड़े बड़े कलाकारों ने अपने बेहतरीन अभिनय का प्रदर्शन करते हुए लोगों की रूह हिलाई है. लेकिन मुझे तो यह फ़िल्म भी अच्छी लगी हालांकि इस तरह की फ़िल्म को देखने वाली जनता बहुत कम ही होती है लेकिन इस फ़िल्म का गीत संगीत के साथ फिल्माए गए दृश्य एक अलग ही माहौल बना देते है. उस वक़्त आपको ऐसा महसूस होता है की आप दर्शन नहीं बल्कि उसी समुदाय का एक हिस्सा हो जैसे चरक महोत्सव के नाम पर दिखाया गया मेला जिसमें कुछ ऐसी बातें दिखाई गयी है जो आदिवासी मान्यताओं और परम्पराओं को दर्शाती तो हैं लेकिन कहीं उनका नाम नहीं आता. ऐसा मुझे लगता है यह मेरा अनुभव है, हो सकता आपको ऐसा कुछ भी ना लगे.


लेकिन यह फ़िल्म बहुत से विषयों पर प्रश्न उठती है और अपनी इच्छा पूर्ति के नाम पर नर बली जैसे क्रूर कृत्य के विषय में बात करती है. जिसमें अबोध बच्चों की बली दी जाती है. दूसरी ओर यह फ़िल्म मातृत्व जैसे भाव पर भी प्रश्न उठती है कि क्या जन्म देने वाली माँ ही माँ कहलाती है और जो जन्म ना दें सके वो माँ नहीं हो सकती. अक्सर लोग इस वाक्य को मैया यशोदा से जोड़ देते है. लेकिन जन्म तो उन्होंने भी दिया था किसी को वंध्या तो वो भी नहीं थी. फिर जो स्त्री किसी भी कारण से संतान उत्पन्न नहीं कर सकती क्या उसमें मातृत्व की भावना निहित नहीं होती...?? हम हमेशा ऐसे मामलों में यह बात क्यों भूल जाते है कि ईश्वर ने स्त्री को पैदा ही मातृत्व की भावना के साथ किया होता है. तभी तो माँ के बाद मासी, मासी के बाद बहन भी एक पुरुष के जीवन में कभी ना कभी माँ का रोल निभा जाती है.


फिर भी आज तक हमारे समाज का एक बड़ा तपका ऐसी स्त्रियों को सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता. विशेष रूप से कम पढ़े लिखे या अशिक्षित गाँव देहात के वह लोग जो संतान प्राप्ति के लिए आज भी मेडिकल साइंस का सहारा लेने की बनिस्बत तंत्र मंत्र और जादू टोने में अधिक विश्वास रखते है और उसे ही अधिक असरदार मानते है. फिर चाहे खुद की कोख से जन्म देने के लिए, किसी दूसरे की कोख ही क्यों ना उजाड़नी पड़े, उसी चक्कर में बच्चों का अपहरण भी होता है और नर बली के नाम पर बली भी दी जाती है. साथ ही साथ आबा बाबा का कारोबार भी खूब फलता फूलता है. हालाँकि इस तरह के अपहरणों के कई और भी बड़े कारण है.

लेकिन यह फ़िल्म इसी मुद्दे को दिखाती है. यूँ देखा जाये तो आस्था का किसी धर्म कर्म से कोई खास संबंध नहीं होता. यह हर एक व्यक्ति का निजी मामला बन जाती है. जिसके नाम पर लोग अक्सर अंधे हो जाते है और आस्था के नाम पर इतना कुछ ऊल जल्लू करते है जिसे देखकर दिमाग घूम जाता है और यह पिक्चर दिमाग घुमाने वाली ही है. बहुत कुछ ऐसा है जो सच में होता है. लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जो किसी विशेष समुदाय के बारे में कहीं ना कहीं गलत संदेश भी देता है. लेकिन यदि आप भी फ़िल्म मेरी तरह घुसकर देखने वालों में से है तो यक़ीनन यह फ़िल्म आपका भी दिमाग़ घुमाकर रख देगी और आपको एक ऐसी विस्मित दुनिया में ले जायेगी कि बाहर आकर आप यह सोचने पर मजबूर हो जायेंगे कि क्या सच में ऐसी भी कोई दुनिया है हमारे इर्द-गिर्द या फिर हम अभी अभी एक कल्पना लोक से बाहर आये है.

अफसोस तो केवल इस बात का होता है कि ईश्वर के नाम पर लोग क्या कुछ बुरे से बुरा कुकर्म नहीं करते और जो करते है, उसमें भी उसका नाम जोड़ देते है. जिसे आम लोगों में उस परमात्मा पिता परमेश्वर के प्रति गलत संदेश ही जाता है. यह फ़िल्म हमें हमारे समाज के एक ऐसे हिस्से का चेहरा दिखाती है जो आमतौर पर कभी हमारी आँखों के सामने नहीं आता. लेकिन जब आता है, तब उस पर विश्वास करना हमारे लिए कठिन हो जाता है. इस समाज के विविध पहलू है और शायद विविध प्रकार के चेहरे भी, अब जिसका जिस पहलू से सामना होता है उसे वही पहलू ज्यादा घातक,डरावना, या घिनौना महसूस होता है. जैसे देह व्यापार के मामले, मानव तस्करी के मामले, यह फिर यह नर बली का पहलू. कुल मिलाकर विषय वस्तु कोई भी क्यों ना हो हर घिनौने कृत्य के पीछे छिपा है मनुष्य का लोभ लालच और उसका अहम कि यदि मैं नहीं तो कोई नहीं...कुछ नहीं और इस सब का किसी जाति या धर्म से कोई लेना देना नहीं है. यह हर धर्म में होता है, बस दिखाने वालों को केवल हिन्दू धर्म ही मिलता है और ऐसा क्यूँ यह बात भी किसी से छिपी नहीं है. वरना अंधविश्वास की पराकाष्ठा तो सभी धर्मों में समान है.


मैं इस फिल्म को लेकर आप सभी के मन में कोई सस्पेंस या उत्सुकता नहीं बनाना चाहती कि आप सब को भी यह फिल्म देखनी ही देखनी चाहिए. मैं बस इतना कहना चाहती हूँ कि कम बजट में सस्ती और अच्छी फिल्में भी बनाई जा सकती है और यह फिल्म भी उन्हीं में से एक है. जो बहुत ही साधारण किन्तु बहुत ही सटीक तरीके से अपनी बात आपके सामने रखती है कि धीरे धीरे यह फिल्म आप पर असर करने लगती है. ना इसमें कोई बड़े कलाकार है, न फालतू का कोई गीत संगीत जो भी है वो है इस फिल्म का फिल्मांकन अर्थात कहानी को दिखाने का तरीका लाइक “सीधी बात नौ बकवास” तो मुझे तो यह फिल्म अच्छी लगी यदि यह पोस्ट पढ़कर आपका को भी दिल करे कि देखनी चाहिए तो एक बार देखिएगा जरूर  

Friday, 1 August 2025

आखिर क्यों ?

 

आखिर क्यों ?

 आखिर क्यों मानव इतना परेशान है कि लोग हत्या जैसा जघन्य अपराध करने से भी नहीं डर रहे है. क्या यह क़ानून व्यवस्था की कोई कमी है कि लोगों के मन में सजा का डर खत्म होता चला जा रहा है, या फिर यह मामला कुछ और ही है..! हालांकि देखा जाये तो इस दुनिया में सभी बहुत परेशान है क्या मानव क्या पशु पक्षी जिनकी अपनी एक अलग दुनिया होती है जो सिर्फ खुद के जीवन यापन के लिए वो करते है जो मानव समाज में अपराधों की श्रेणी में आता है. जैसे अपनी भूख को मिटाने के लिए किसी दूसरे की हत्या कर देना. हालांकि वो बात अलग है कि किसी जमाने में हम भी वही किया करते थे. आज भी कर रहे हैं तब मजबूरी थी आज स्वाद है. फिर हमने समाज बनाया और फिर धीरे धीरे उससे जुड़े इतने नियम और कानून बना डाले की मानवो के लिए बनाए गए समाज में स्वयं मानवों का ही दम घुटने लगा. प्रतियोगिता के चलते स्वार्थ बढ़ने लगा और फिर स्वार्थ के चलते अपराध और कब हम इतने स्वार्थी हो गए कि हमने ना जनवारों को बक्षा ना मानवों को बक्षा.

खैर आज का मानव कितना स्वार्थी और आत्म केंद्रित हो चुका है कि लोग बस केवल अपना फायदा देख रहे है. फिर चाहे बात छोटी हो या बड़ी, उनका फायदा हो रहा है या नुकसान बस केवल वह ही मायने रखता है और कुछ भी नहीं. यहाँ तक की इंसान की जान की भी आज कोई कीमत नहीं रह गयी है. कोई भी कहीं भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं है. इसलिए किसी पर कहीं भी जानलेवा हमला कर देना, या हत्या कर देना, किसी का भी अपहरण कर लेना, बलात्कार, तेजाबी हमले जैसे गंभीर मामले भी अब सन सनी पैदा नहीं करते. हाँ थोड़ी देर के लिए या यूँ कहे कि कुछ दिनों के लिए हंगामा खड़ा होता है, वह भी न्यूज़ चैनल और सोशल मिडिया की वजह से और फिर समय के साथ हम सब भूल जाते है. आखिर क्यूँ इतने असंवेदनशील हो गए है हम...?

 क्या एक मानव होने के नाते अपने अंदर कि मानवता को बचाये रखना हमारा धर्म नहीं है...? बात की जाये यदि हत्या कांडो की तो अब तक न जाने कितनी बार और कितने ही भयावह ढंग से स्त्री का पहले बलात्कार किया जाता है और बड़ी ही बेरहमी और निर्ममता से उनकी हत्या कर दी जाती रही है.  इतने पर भी जब कातिल के दिल को सुकून नहीं मिलता तो लाश के भी टुकड़े -टुकड़े कर के कुत्तों को खिला दिया जाता है और हम यानी की आम जानता क्या करती है, बस एक- दो केन्डील मार्च, थोड़ी नारे बाजी और बस बात खत्म. क्या बस इतना ही कर्तव्य रह गया है हमारा...? कोलकाता में एक डॉ के साथ हुए बलात्कार और फिर उसकी निर्मम हत्या के बाद क्या किया हमनेकुछ नहीं सब भूल गए क्यूँ क्यूंकि वह हमारे घर की बेटी थोड़ी ही ना थी. फिर वो (श्रद्धा) जिसकी लाश के टुकड़े करके उसे फ्रीज में छिपा दिया गया था और उसका प्रेमी हर रोज एक टुकड़ा ले जाकर कुत्तों को खिला दिया करता था. यह सब कोई बहुत पुराने मामले तो नहीं है. फिर तब तो लोगों के मन में विवाह को लेकर कोई डर नहीं समाया. फिर आज दो चार पुरुषों के हत्याकांड क्या सामने आये संसार हिल गया... पुरुषों का ...क्यूँ...?

माना के वह बेचारे निर्दोष थे, बेगुनाह थे. लेकिन बावजूद इसके यह संसार सालों से दहेज़ के चक्करों में प्रताड़ित होती हुई बेटियों के मामलों में क्यूँ नहीं हिला. जबकि ना जाने कितनी ही मासूम बेटियों को दहेज़ की आग में ज़िंदा जला दिया गया. और कितनी ही लड़कियां आज भी घरेलू हिंसा और ना सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक उत्पीड़न का भी शिकार बन रही है. फिर भी यह दहेज प्रथा कम होने के बजाये दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ती ही चली जा रही है.  क्या उनका दर्द, उनकी तकलीफ इन पुरुषों से कम थी...? तंदूर कांड के बाद भी किसी के दिल में यह क्यूँ नहीं आया कि शादी विवाह एक बहुत बड़ा जुआ है, बिना पूरी तरह से जांच पड़ताल किए नहीं किया जाना चाहिए. फिर अब जब यह इंदौर के (सोनम रघुवंशी और राजा) का मामला सामने आया है जिसे मीडिया ने खूब भुनाया है तब से या फिर वो (नीले ड्रम) में बंद कर देने वाले हत्या काण्ड के मामले के बाद से ही पुरुष समाज में इतना हँगामा क्यूँ है बरपा...?? जानते हैं ऐसा क्यूँ हुआ क्यूंकि यह नया था स्त्रियों के विषय से जुड़े अपराध, हिंसा, आदि सुनने के हम आदि हो चुके है और शायद असंवेदन शील भी लेकिन पुरुषों से जुड़ी प्रताड़णा के यह मामले कम देखने और सुनने में आते है. बस शायद इसलिए लोग हैरान है. 

खैर जिस पर बीतती है वही परिवार जानता है कि अपनों को खोने का दर्द क्या होता है. फिर चाहे इस तरह समय से पूर्व हत्या किए जाने के कारण जाने वाला बेटा हो या बेटी इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. लेकिन ऐसा कब तक चलता रहेगा, जनता कब तक न्यूज़ चैनल या सोशल मिडिया के इशारों पर नाचती रहेगी...? और बिना पूरा सच जाने बस आधी अधूरी जानकारी को सही मानकर अपना वक्तव्य देती रहेगी....? आखिर कब तक..? कब हम अपनी सोच अपने विचारों के बल पर मानवता दिखाते हुए मानव होने का परिचय देंगे और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठा सकेंगे. एक समय था जब हम अनेकता में एकता का प्रतीक माने जाते थे और अब एकता तो दूर की बात है, अब तो बस हम रेत के महल की तरह बस बिखरते ही चले जा रहे है. चारों और बस बिखराव ही बिखराव है अशांति ही अशांति....!इस दिखावे के दंश ने हमें ऐसी मार मारी है कि कहीं के नहीं रहे.

 इस संसार में बल्कि मैं तो कहूँगी पूरे ब्रहमाण्ड में कोई सुखी नहीं है, हर जगह हर कहीं जीवन में बस टकराव ही टकराव है, रिश्तों को तो जैसे नज़र ही लग गयी है. प्रेम, दुलार, समर्पण, त्याग, ईमानदारी, मौन, शांति जैसे शब्द तो विलुप्त ही हो गए है. शेष रह गया धोखा, क्लेश, मन मुटाव, तुलना, आरोप, प्रत्यारोप, शक, शिकवे शिकायतें जिसका कोई इलाज नहीं ....! ऐसे हालातों में ज़ाहिर सी बात है  जब जीवन इन सब प्रताड़नाओं से भरा होगा तो मन चौबीस घंटे बस खिन्नता और इर्षाओं से ही तो भरा होगा...नहीं ? तो ऐसा मन, एक ना एक दिन क्रोध में हत्या को ही तो अंजाम देगा और भला दे ही क्या सकता है फिर चाहे इस सब के पीछे का कारण बढ़ती जनसंख्या, बेरोजगारी, गरीबी, सरकार, अकेलापन, कुछ भी हो सकता है. ऐसे में हम किसी एक पर उंगली नहीं रख सकते क्यूंकि इन सब के मिले जुले मिश्रण का ही नतीजा है समाज और उससे जुड़े यह कारण...आपको क्या लगता है...?    

 

Friday, 19 January 2024

कल्पना


आज मैं जो कुछ भी लिखने जा रही हूँ वह एक ऐसी घटना है जिसे यदि आप जीना चाहते हैं तो अपनी कल्पना शक्ति को बढ़ाईये. जितना ज्यादा आप अपनी कल्पना के घोड़े दौड़ाएंगे
, उतना ही ज्यादा आपको इसे पढ़ने और फिर देखने में मजा आएगा... जी हाँ, ‘सही पढ़ा आपने’ देखने में भी मजा आयेगा. तो मान लीजिये आप एक 'रग्बी' जो की (खेल है) की टीम का हिस्सा हैं और आप अपनी टीम के अन्य साथियों के साथ एक हवाई यात्रा कर रहे हैं इसलिए इस वक़्त केवल हवाई यात्रा के विषय में ही सोचिये उड़ने से पहले होने वाले रोमांच और खुशी के बारे में सोचिये, सोचिये आप इतने खुश है कि आप ना सिर्फ अपने परिवार वालों के साथ बल्कि पूरे क्रू मेंबर्स के साथ भी फोटो खिंचवा रहे है. यह एक ऐसी यात्रा है जो उरुगुए से चिली एक चार्टड जहाज से शुरु होती है, ऐसे में आप अपने साथ के अन्य सभी यात्रियों को बस केवल नाम से जानते है और कुछ को बस उनके चेहरे से पहचानते है कि यह व्यक्ति आपके साथ पूरी यात्रा में रहेगा. इसके अतिरिक्त आपका और उस व्यक्ति आपस में कोई ओर सम्बन्ध नहीं है. हालांकि कुछ ऐसे भी लोग हैं जिन्हें आपकी टीम का सदस्य होने के नाते, आपकी उनसे गहरी मित्रता है. आपका उनसे एक अलग किस्म का लगाव, है जुड़ाव है.

फिर बारी आती है आपके ठीक बगल में बैठे आपके उस सहयात्री की जिसे आप अपना एक औपचारिक परिचय देते है. बदले में वह अभी आपको अपना एक सूक्ष्म परिचय देता है. कुछ देर बाद आप अपने सभी सह यात्रियों के साथ अपने गंतव्य की और उड़ान भरते है. पूरी यात्रा के दौरान आप और आपके सभी सह यात्री खुश है कुछ गीत गा रहे है, कुछ बाते कर रहे है, सभी अपने अपने तरीके से अपना और अपने साथियों का मनोरंजन कर रहे है. कुछ देर तक सभी कुछ सामान्य चल रहा है. कुछ ही देर में मौसम ख़राब होने की घोषणा होती है और सभी को अपनी जगह से ना हिलने और अपनी अपनी कमर की पेटी बाँध लेने की हिदायत दी जाती है. आप सब अपनी अपनी कल्पनाओं में इस बात का ध्यान रखें की यह कोई आजकल की साधारण उड़ान नहीं है, बल्कि यह उस समय की बात है जब हवाई यात्रा सभी के लिए आसान नहीं हुआ करती थी. खैर अब जरा सोचिये आपकी चील गाड़ी अर्थात हवाई जहाज अचानक एक ऐसी जगह जाकर गिर जाए मतलब क्रेश हो जाए, जहाँ का न्यूनतम तापमान इतना कम हो जिसके विषय में आप सोचना तो छोड़िये, आप वो भी नहीं कर सकते जो मैंने करने को कहा है... अर्थात कल्पना.

लेकिन रुकना नहीं है कल्पना तो करते ही रहिये. कल्पना कीजिये -30 तापमान की अर्थात ठंड की पराकाष्ठा, हाँ तो हम कहा थे प्लेन क्रेश होने पर, तो भई अब क्या....? सोचिये इतनी भयानक ठंड की खून जम जाये, आपके आस -पास के लोग जो अब तक आपके सह यात्री थे ठंड से मरने लगे, आपके पास ना खाने को कुछ है ना ही गरम कपड़ों की कोई व्यवस्था अर्थात जो आप पहनकर चढ़े थे बस वहीं आपका है. दूर दूर तक जीवन का कोई नामों निशान नहीं, सिर्फ बर्फ ही बर्फ, सर्द रातें और बर्फ़ीली हवाएं चल रही है. ना सिर्फ ठंड बल्कि भूख और प्यास से भी आपके आस पास के लोग तड़प तड़पकर मर रहे हैं. तो कोई एक यह निर्णय लेता है कि अब आपको अपने मरे हुए साथियों को काटकर खाने के अलावा जिंदा रहने के लिए कोई ओर विकल्प नहीं है. तो क्या होगा. ? आधे से अधिक लोग इस बात के लिए तैयार नहीं है. पर कुछ लोग तैयार हैं और उन्होंने प्लेन के उस टूटे हुए हिस्से से दूर जाकर ऐसा किया भी, ऐसा लगा जैसे मनुष्य अचानक राक्षस में बदल गया. और बहुत से भूखे लोग उस लाश पर टूट पड़े.

दिन बहुत बीत चुके थे कोई भूख से मर रहा था तो कोई ठंड से, कुछ जो घायल थे वह संक्रमण का शिकार हो चले थे. अधिकतर लोगों को उस समय भगवान याद आ रहे थे. तो किसी किसी ने उम्मीद का दामन अब भी नहीं छोड़ा था. इतने मुश्किल समय में भी साथ रहने पर लोगों को एक दूसरे की अहमियत समझ आने लगी थी. कुछ लोगों के बीच दोस्ती गहराने लगी थी. जरा सोचिये कोई एक आपके पास एक इंसान की लाश का एक कच्चा टुकड़ा लेकर आता है और कहता है इसे बर्फ के साथ खा लो दोस्त, खाने में आसानी होगी और पता भी नहीं चलेगा.... तो क्या आप खाएंगे...? यह दृश्य देख कुछ की आँखों में डर है, तो कुछ की आँखों में दुःख के आँसू, तो कोई हताश निराश यह सोच रहा है कि उसके मरने के बाद उसकी लाश भी उसके साथियों के काम आएगी. लोग दिल पर पत्थर रख बस अपने ही साथियों की लाशों के टुकड़े कच्चे ही खा रहे हैं. बस सिर्फ इसलिए कि वह ज़िंदा रहना चाहते है. इस तरह जीते -जीते अब केवल 17 लोग शेष रह गए हैं. कुछ और समय बीत जाने के बाद लगभग 57 दिन, तीन लोग यह निर्णय लेते हैं कि वह जीवन की तलाश में निकलेंगे. बाकी के 14 लोग  चौदह लोग उनमें विश्वास दिखाते है और उनके साथ भोजन के लिए वही मांस के टुकड़े बाँध देते हैं.

किसी तरह बर्फ़ीली पहाड़ियों पर खुद को ज़िंदा रखते हुए वह एक ऐसे स्थान पर पहुँच जाते हैं, जहाँ से वह एक दूसरे व्यक्ति के जरिये मदद माँगने और उन्हें अपने साथियों के विषय में बताते है साथ ही वह यह भी बताते हैं कि वह कौन से वाले प्लेन क्रेश में बचे हुए लोग हैं. सरकार तुरंत हरकत में आती है और तुरंत ही निर्णय लेती है और बाकी बचे 14 लोगों के लिए हैलीकाप्टर भेजती है. जिसमें वो व्यक्ति भी बैठकर जाता है, जिसने यह निर्णय लिया था कि वह जीवन की खोज में निकलेगा...और उसका दूसरा साथी वहीं रुककर अपने अन्य साथियों के आने का इंतजार करना पसंद करता है और अपने साथ लाए हुए अपने सह यात्री की लाश के उन टुकड़ों को मिट्टी में दफन करता है जिन्हें वह ज़िंदा रहने के लिए खाने को लाया था क्यूंकि तब वह भी यह नहीं जानता था कि उसे मंजिल मिलेगी भी या नहीं.कुल मिलाकर सभी लोग ऐसी हालत में 72 दिन रहे थे जरा सोचिए कैसे रहे होंगे और जीवन बच जाने के बाद भी उन्हें इस सब से मानसिक रूप से निकालने में कितना समय लगा होगा. 

 लेकिन उसे मंजिल मिली, इसलिए ईश्वर का शुक्रिया अदा करते हुए वह लाश के उन साथ लाये हुये टुकड़ों को मिट्टी में दफना कर अपने उसे मृत साथी की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करता है और इस तरह बाकी 45 लोगों में से केवल बचे 16 लोगों को सकुशल बचा लिया जाता है...यह कहानी एवं दृश्य है netflix पर दिखाई गयी एक फ़िल्म, जिसका नाम है."society of the snow" में दिखाया गया है. जो की एक सत्य घटना पर आधारित फिल्म है. जिसका ना सिर्फ फिल्मांकन बल्कि कहानी निर्देशन सभी कुछ बहुत ही जबर्दस्त है. जिसे देखकर आप भी बहुत कुछ सोचने पर मजबूर हो जाएँगे और आपके भी रोंगटे खड़े हो जाएंगे. यदि आपको इस तरह की कहानियाँ पसंद हो तो एक बार यह फिल्म ज़रूर देखें. क्यूंकि न जाने कब कहाँ और किस की ज़िन्दगी क्या क्या और कैसे कैसे मंजर दिखायेगी यह कोई नहीं जानता.


Wednesday, 4 October 2023

सुखी ~



कुछ भी शुरु करने से पहले यह बताती चलूँ कि मैं कोई फ़िल्म समीक्ष नहीं हूँ इसलिए कृपया इस पोस्ट को समीक्ष की दृष्टि से ना देखा जाय पर हाँ मैं 'जनता' जरूर हूँ. तो मुझे अपना मत रखने का पूर्ण अधिकार है. तो बस मैं अपने उसी अधिकार का निर्वाह करते हुए इस फ़िल्म को केवल तीन ही सितारे दूँगी. हाँ हाँ....मैं जानती हूँ जिस फ़िल्म को एक ओर आठ सितारे मिल रहे हों, वहाँ तीन का अंक शंका पैदा करेगा ही करेगा. वैसे इस फ़िल्म की निर्देशक सोनल जोशी है जिन्होंने इस फिल्म से पूर्व कई और फिल्मों में सहायक निर्देशक के रूप में काम किया हैं. पर फिर भी उनकी यह फ़िल्म 'सुखी' मुझ जैसों को बहुत सुखी ना कर सकी.

लेकिन वो कहते है ना "रहिमन इस संसार में भांति भांति के लोग" तो बस उन्ही में से मैं भी एक हूँ. मुझे लगता है बड़े सितारों से फ़िल्म में बहुत फर्क पड़ता है क्यूंकि कुछ भी हो बड़ा कलाकार बड़ा ही होता है. ग्रहणीयों के महत्व को दर्शाने वाली यह कोई पहली फ़िल्म नहीं थी. इससे पहले भी इस विषय पर बहुत सी फिल्मे बन चुकी हैं. जिसमें मुझे "इंग्लिश वइंग्लिश" बेहद पसंद है. उस फ़िल्म को लेकर एक खासा सा जुड़ाव है मेरे मन में, उसके दो कारण है. एक तो यह कि वो श्रीदेवी अभिनीत फ़िल्म है और वो मेरी पसंदीदा अदाकारा में से एक रही हैं. दूजा उस फ़िल्म को देखते हुए मुझे यह महसूस होता है कि यह कहीं ना कहीं मेरी अपनी ही कहानी है.

लेकिन इस फ़िल्म 'सुखी' को देखते हुए मुझे ऐसा जरा भी महसूस नहीं हुआ. जबकि मैं भी एक ग्रहणी ही हूँ पर जो सादगी जो अपनापन उसमें था जिसके कारण वो फिल्म बहुत अपनी सी लगी थी वो इस फ़िल्म में मुझे जरा भी महसूस नहीं हुई. जैसा अभिनय श्रीदेवी ने किया था शिल्पा जी शायद उस किरदार को वैसा छू भी नहीं पायी. बाकी तो सब का अपना-अपना नज़रिया है। विशेष रूप से उन चार सहेलियों के बीच की बौंडिंग को लेकर. जिसे हर तरह से ऐसा दर्शाने की कोशिश की गयी है कि फिल्म देखने आने वाली महिलाएं उसे अपने से जुड़ा हुआ महसूस कर सकें. इसलिए उसमें थोड़ी सी गलाइयाँ और दोआर्थि संवाद भी डाले गए हैं. ताकि दोस्ती वाली फीलिंग आए. लेकिन जो दोस्ती की गर्माहट महसूस होनी चाहिए थी वो फिर भी ना हो सकी. वैसे भी जहाँ तक मेरा मानना है, दोस्ती पर आधारित फ़िल्म श्वेत श्याम वाली 'दोस्ती' या 'शौकीन' 'जो जीता वही सिकंदर' 'दिल चाहता है' 'ज़िंदगी न मिलेगी दोबारा' फ़िल्म वाली दोस्ती से लेकर 'थ्री इडियट' तक जो गर्माहट, जो अपना पन लड़कों की मित्रता में महसूस होता है. वो लड़कियों की फिल्मों में जाने क्यूँ नहीं हो पता.
इस फ़िल्म में भी सब बहुत औपचारिक सा लगा. बाकी रही बात कहानी की तो बीस साल बहुत होते हैं, एक इंसान में हर तरह के परिवर्तन के लिए. लेकिन इस फ़िल्म की अभिनेत्री 'शिल्पा शेट्टी' जोकि बीस साल बाद अपने दोस्तों से मिलती है अपने जीवन को जीने के लिए. या यूँ कहें की खुद को रिचार्ज करने के लिए तो उसमें कोई परिवर्तन ही नहीं आता है. जो कि अमूमन एक स्त्री के जीवन मे माँ बन जाने के बाद स्वाभाविक रूप से आ ही जाता है, जो की इस फिल्म के किरदार में जरा भी नहीं दिखाया गया है जबकि आजकल तो मेकअप के माध्यम से क्या कुछ नहीं किया जा सकता. लेकिन नहीं सहाब ....ऐसा कैसे, वो तो आज भी उतनी ही खूबसूरत और उतनी ही परफेक्ट है, हर उस काम में जितना की बीस साल पहले थी. हाँ यह बात अलग है ही कि शिल्पा शेट्टी वास्तविक जीवन में भी उतनी ही प्रफेक्ट हैं जैसा की किरदार में दिखाया है लेकिन फिल्म मे तो उन्होने एक आम स्त्री की भूमिका निभाई है ना तो उसके हिसाब से मुझे थोड़ा संदेह हुआ की ऐसा कैसे, भई असल ज़िंदगी में ऐसा थोड़ी ना होता है.

अरे भई, कोइ ग्रहकार्य को लेकर ऐसा कुछ दिखाते तो मैं एक बार को मान भी लेती. हाँ यह बात अलग है की हर कोई गृहकार्य में भी दक्ष नहीं होता. कुछ होती है, टॉमबॉय टाइप लड़कियां. लेकिन बीस साल एक ग्रहणी का जीवन जीने के बाद उनमें भी वो पहले जैसी बात नहीं रह पाती. लेकिन घुड़सावारी....! ना ना भई मुझ से तो यह बात बर्दाश ना हुई क्यूंकि ऐसे खेलों में आपका स्टेमना भी होना चाहिए और प्रैक्टिस भी. तभी जाकर आप रेस जितने का हौसला रख सकते हो...नहीं ? पर भईया मैडम को तो इतना चतुर दिखया गया है कि मैं क्या ही बोलूं. मात्र गिनती के कुछ ही दिनों में ही मैडम ने जैसे बीस साल पहले थी वैसी के वैसी ही हो गयी. इतनी की घुड़सवारी की रेस भी जीत ली "भई वाह गजब"....! इस मामले में तो मुझे 'साक्षी तंवर' अभिनित एक शार्ट फ़िल्म 'घर की मुर्गी' ज्यादा अच्छी लगी थी. जिसमें यही ग्रहणीयों के महत्व का मुद्दा इस 'सुखी' फ़िल्म से ज्यादा प्रभावशाली तरीके से दिखाया गया था और साक्षी तंवर तो हैं ही एक बेहतरीन अदाकारा इसमें तो कोई दोराय नहीं है. आप यूट्यूब पर ढूंढेगे तो आपको वो फ़िल्म आसानी से मिल भी जाएगी. तब आप खुद ही तुलना कर के देख लेना कि मैंने सही कहा था या गलत.

बाकी तो हम ग्रहणीयोंनका महत्व, कभी आज तक किसी को समझ में ना आया था, ना आया है, ना आने वाले समय में आएगा. इसलिए तो हम गृहनियाँ अपने जीवन से जुड़े विषयों पर जैसे ही कोई फ़िल्म आती है देख लेती है और बस उसे तुरंत हिट करा देती है. इस उम्मीद से कि शायद यह फिल्म हमारे परिवार वालों को हमारा महत्व समझने में कारगर साबित हो. क्यूंकि हम हमेशा ही एक दूसरे से सांत्वना रखती है और यह सोच लेती है कि चलो यह हमारी कहानी ना सही किन्तु हमारे जैसी ही किसी और बहन की कहानी तो होगी ही. तो उसके लिए ही सही. पर अफ़सोस की हमें अपने ही परिवार में आज भी जब, भारत चाँद को अपना बना चुका है अपने ही लोगों को अपना महत्व समझाने के लिए फ़िल्म दिखानी पडती है. इससे ज्यादा और दयनीय स्त्तिथी और क्या हो सकती है एक ग्रहणी के लिए. जरा सोचिये.

इस फिल्म को देखने के बाद मेरे मन मे जो विचार आए मैंने आपके समक्ष रखे हैं. यह पूर्णतः मेरे अनुभव ही हैं. आगे फ़िल्म देखकर फैसला करना आपके हाथ में है कि आप इस फिल्म को कितने सितारे देना पसंद करेंगे. राम राम 🙏🏼

Saturday, 22 April 2023

मशीनी युग और मानसिक शांति

 

मशीनी युग और मानसिक शांति

आधुनिक युग में मशीनों के बिना जहां जीवन की कल्पना भी नहीं कि जा सकती, वहाँ मानसिक शांति की बात करना शायद एक ना समझी ही साबित होगा। लेकिन बदलते वक़्त ने अब हर चीज़ के मायने बदल दिये हैं, फिर चाहे वह मनोरंजन के साधन हो या मानसिक शांति। अब लगभग सभी चीजों की परिभाषा बदल रही है या बदल गयी है। आप इस विषय में क्या सोचते हैं, यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है। मैं यहाँ जो कुछ भी कहना चाह रही हूँ । वह पूर्णतः मेरे विचार है। जिस तरह आजकल सस्ती लोकप्रियता का चलन चल रहा है, जिसे पाने कि खातिर लोग अपने स्तर से गिर रहे है। ठीक उसी तरह मानसिक शांति पाने के लिए भी अब लोग को प्रकृति का सामीप्य नहीं चाहिए, बल्कि मशीने चाहिए एक यंत्र चाहिए जिसे वर्तमान हालातों में यदि अलादीन का चिराग कहा जाए तो शायद गलत नहीं होगा। क्यूंकि आजकल कि दुनिया में हो रहे सभी तरह के क्रियाकलाप इसी यंत्र में समाहित है। फिर चाहे वह हितकर हों या अहितकर लोग उसे अपनी अपनी सुविधाओं के अनुसार उपयोग में लाते हैं। बस ज़रा उँगलियाँ फेरी और बस आपके जिन ने आपके समक्ष सम्पूर्ण जानकारी परोस दी जो आपने चाही थी।

कितनी अजीब बात है, आज लोग हरियाली वाला वाल पेपर लगाना तो बहुत पसंद करते हैं किन्तु सुबह जल्दी उठकर उस प्रकृतिक सौंदर्य का अपनी आँखों द्वारा साक्षात आनंद लेना कोई नहीं चाहता । सब को जैसे सभी कुछ चाहिए तो है मगर असलियत में नहीं नकली पने में, जंगल, खेत, नदियां, समंदर, फूल, पत्ती, बाग बगीचे, सभी को बहुत पसंद होते हैं, इसमें कोई दो राय नहीं है। इनके समीप जाकर कुछ देर शांति से बैठकर जिस मानसिक शांति का अनुभव होता है उसकी तो कोई उपमा दी ही नहीं जा सकती। परंतु यह केवल वही जान सकता है जिसने यह सब वास्तव में अनुभव किया हो। मुझे खेद है कि आज की पीढ़ी इन बहुत ही साधारण और छोटे छोटे अनुभवों से वंचित है। बाकी ना सिर्फ आज की पीढ़ी बल्कि हम सब भी तो वैसे ही हो गए हैं, “मशीनी युग के गुलाम” हमें भी तो खुद को मनोरंजित करना हो तो या किसी भी प्रकार का चिंतन मन्नन करना हो तो, सर्वप्रथम मशीन ही दिखाई देती है। अब उसका रूप कोई भी होसकता है फिर चाहे वह स्मार्ट फोन हो, टीवी हो, लैपटाप हो, आईपेड हो, वो कोई भी मशीन हो सकती है। लेकिन हम में से किसी के दिमाग में यह नहीं आता कि चलो किसी बाग में घूमकर आते है या किसी नदी किनारे चलते हैं या नदी न मिले तो झील ही सही मगर प्रकर्ति के निकट चल के बैठते हैं।

नहीं साहब, ऐसा कुछ करने लगे तो दकियानूसी ना कहलाने लग जाए कहीं, इसलिए यह सारे सुख जो हमें ईश्वर ने मुफ्त दिये हैं अपना तनाव कम करने के लिए उस पर भी पैसा डालो और ऐसी एप्लिकेशन खरीदो जो तनाव कम कर सकती हो क्यों? वह भी किसी खेल के साहारे क्यूंकि आजकल लोग बहुत व्यस्त हैं। किसी के पास समय नहीं है, ऐसा सब करने के लिए। जबकि मेरी नज़र में लोग “बिज़ि विदाउट वर्क” ज्यादा है। तभी तो खाली समय में भी मशीन में घुसकर ही समय काटते हैं और कहते है हमारे पास समय का अभाव है।  दोगली दुनिया के दोगले लोग, खुद ऑफिस में बैठकर खाली समय में भी एक मशीन से निकलकर दूसरी मशीन में ही घुसने का मौका ढूंढते फिरते हैं और वहीं यदि घर की ग्रहणी अपना सारा काम निपटने के बाद अपने लिए मिले हुए समय में से थोड़ा सा समय अलादीन के चिराग में लगा दे, तो कोई कहने से नहीं चुकता कि इनके पास कोई काम नहीं है, जब देखो जब फोन में ही घुसी रहती है। जबकि घर की गृहनियों के यदि छोटे बच्चे हों तो आधे से ज्यादा समय तो आज के यह मशीनीयुग के बच्चे खा जाते हैं।  मानो पैदा इंसान ने नहीं मशीन ने ही किया हो इन्हें और तंज़ झेलती है ग्रहणी, यह भी कोई बात हुए भला।

खैर अब युग मशीनी है तो तनाव होना तो निश्चित ही है। इसलिए तो आजकल मशीनों पर भी तरह तरह कि एप्लिकेशन और सॉफ्टवेअर उपलब्ध है। बच्चों के स्कूल से लेकर ऑफिस तक में तनाव कम कैसे किया जाये को लेकर आए दिन सेमिनार होते रहते हैं। लेकिन मेरा ऐसा मानना है कि यदि थोड़ी देर के लिए यह समय के अभाव के नाटक को एक ओर रख के सोचा जाये तो तनाव मुक्त जीवन जीना इतना भी बड़ी समस्या नहीं है, जितना इसे गा गाकर बना दिया गया है। तनाव का कारण केवल काम का भार ही नहीं होता, तनाव का मुख्य कारण होता आपके अंदर का डर जो किसी भी प्रकार का हो सकता है। जिसका कोई एक रूप निश्चित नहीं होता। पर अधिकतर हार अर्थात पराजय का डर और उसके बाद सामाजिक दबाव ही इंसान को गलत कदम उठाने पर मजबूर कर देते हैं। जबकि इस डर को मिटाने का सीधा सा उपाए है डर के कारण को जानकार उस पर काम किया जाये। और अधिकतर मामलों में इन सब चक्करों के चलते सबसे पहले यदि कुछ खोता है तो वह है इंसान के मन की शांति और जहां तक मेरा मानना है, हर इंसान को खुद यह बहुत अच्छे से पता होता है कि उसे उसके मन की शांति कहाँ और कैसे मिलेगी। जैसे मुझे लिखने से मानसिक शांति मिलती है।

ठीक इसी तरह हर एक इंसान के मन की शांति, किसी ना किसी काम में होती है, पर कई बार या तो उन्हें पता नहीं होता या फिर उन्हें समझ ही नहीं आता कि अपनी रुचि पर काम करके भी अपने तनाव को बहुत ही आसानी से कम किया जा सकता है। जैसे किसी को खाना बनाकर उसके मन शांति मिलती है, तो किसी कोई तस्वीरें बनाना पसंद होता है, किसी को संगीत से लगाव होता है, तो किसी को नृत्य से, पर अफसोस की हम तनाव के वक़्त केवल समस्या पर ध्यान देते है उसके समाधान पर नहीं और फल स्वरूप तनाव बना रहता और लगातार बढ़ता रहता है। ऐसे में हमें अपने मन की शांति के लिए कुछ उपाय करना बेहद जरूरी होता है जो समान्यता हम नहीं करते जिसे अंगेजी में "माइंड डाइवर्ट" करना कहते हैं और यह काम हम अपनी रुचि के आधार पर बहुत ही आसानी से कर सकते हैं। जैसा की मैंने उपरोक कथन में कहा कि हर किसी को पता होता है कि उसकी उसकी 'रुचि' उसके 'मन की शांति' उसे क्या करके मिलेगी। मगर अपनी समस्या और तनाव के चलते वह व्यक्ति उस पर ध्यान नहीं दे पाता। तब भी यदि वह थोड़ी देर के लिए प्रकृतिक रूप से प्रकर्ति के समीप जाकर अपनी समस्या का समाधान खोजेगा ना तो उसे कोई न कोई हल मिल ही जाएगा क्यूंकि जो सुकून, जो शांति प्रकृति के समीप्य में जाकर मिलती है न, उसका कोई तोड़ नहीं है। फिर भी एक बार को में यह मान भी लूँ कि आजकल की भाग दौडभाग भरी ज़िंदगी में किसी के पास समय ही नहीं बचता। तो भी उसे अपनी रुचि के लिए समय ज़रूर निकालना चाहिए । ताकि वह बिना किसी मशीन के सहारे अपने तनाव को कम कर सके। यह उतना भी कठिन नहीं है कि इस काम के लिए भी आपको मशीनों की अवश्यकता पड़े। याद रखिए इंसान ने मशीनों को बनाया है, मशीनों ने इंसान को नहीं।          

Friday, 24 March 2023

नवरात्र और मैं ~



मार्च का महीना यानी हिंदू नववर्ष का प्रारम्भ जो माता रानी जगत जननी माँ अम्बे के आशीर्वाद के साथ प्रारम्भ होता है। यानी "गुड़ी पड़वा" अर्थात "चैत्र नवरात्र" का प्रथम दिवस और पूरे नो दिन धूम मचाने के बाद हमारे हम सब के प्रिय श्री राम लला का जन्मोत्सव और क्या ही शुभ शगुन चाहिए नववर्ष के आरंभ के लिए. यूँ तो साल में चार नवरात्र आते है मगर मुझे इस विषय में अब तक कोई जानकारी नहीं थी जैसे 
1. शारदीय नवरात्र 
2. गुप्त नवरात्र 
3. चैत्र नवरात्र 
4. गुप्त नवरात्र 
ऐसा माना जाता है कि मंत्र तंत्र और सिद्धि प्राप्ति के लिए इन "गुप्त नवरात्रों" का विशेष महत्व है. पर ऐसा कोई ज़रूरी नहीं है कि ऐसा कुछ करना हो तो ही आप यह नवरात्र मनाए इन्हें भी कोई भी मना सकता है अर्थात बाकी नवरात्रों की तरह साधारण पूजन आदि इन नवरात्रों में भी कि जासकती है. ठीक इसी तरह हर महीने "महाशिवरात्रि" जिसे "मासिक शिवरात्रि" भी कहते हैं हर माह ती है. यह भी मुझे पता नहीं था, यह जानकारी मुझे शिवपुराण सुनने और पढ़ने के बाद प्राप्त हुई. दोस्तों मैं मध्यप्रदेश की रहने वाली हूँ. जहाँ सभी त्यौहारों को बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है. फिर चाहे वह किसी भी धर्म का त्यौहार ही क्यों ना हो. मैंने भी हर त्यौहार को खूब हर्षोल्लास के साथ मनाया है. लेकिन फिर भी मेरा अनुभव यह कहता है कि एक स्त्री के लिए त्यौहारों का जो महत्व है या यूँ कहिये कि त्यौहारों का जो असली मजा है वह केवल माता पिता के संरक्षण में ही आता है. विवाह उपरांत नहीं, क्यूंकि फिर तो जैसे सारा मजा रसोई घर के चुल्ले में ही फुक जाता है. कम से कम सयुंक्त परिवार में तो ऐसा ही होता है और रही बात एकल परिवारों कि तो होली, दिवाली जैसे त्यौहार तो वह भी परिवार के संग ही मनाना पसंद करते है. बाकि तो आजकल स्विग्गी और ज़ोमेट्टो वालों ने घर के बने खाने या पकवानों कि एहमियत पहले ही खत्म कर दी है, तो आगे कुछ कहना ही बेकार है. खैर वह मुद्दा अलग है. आज तो मैं बात कर रही हूँ अपने जीवन के उन सुनहरे दिनों की जब गन्नू भईया अर्थात हमारे प्यारे "गणपति बाप्पा" के जन्मदिन से जो त्यौहार शुरु होते थे तो दिवाली तक मन एक अलग ही ऊर्जा से भरा रहता था. 
विशेष रूप से शारदीय नवरात्र को लेकर तो पागल ही हो जाया करते थे सब, झाँकियां देखने जाना, माता रानी के दर्शन के लिए घंटों लाइन में खड़े रहना, प्रसाद के लिए मरे जाना. मेले का आनन्द जम के उठाना चाट पकोड़ी पालकी का झूला, लॉटरी के टिकट, जो आज तक कभी नहीं लगा पर फिर भी दस बीस रुपए से अधिक लेने की अनुमति नहीं होती थी. कितना सुकून, कितना आनंद था इन छोटी छोटी खुशियों में, और तो और घर में माता रानी की भक्ति से सकारात्मक ऊर्जा का घर घर विचरना, सुबह शाम की आरती में शामिल होना सिर्फ मेवे के प्रसाद के लिए क्यूंकि नवरात्री में विशेष रूप से मम्मी पंच मेवा का भोग लगाया करती थी. घर में हवन सामग्री और धुपबत्ती की महक जैसे हर रोज जीवन में एक अदबुद्ध रस का संचार कर दिया करती थी. उन दिनों व्रत करने का बहुत मन किया करता था मगर अनुमति नहीं हुआ करती थी. ना उन दिनों घर में मांसाहार बनेगा ना कोई बाहर जाकर खायेगा. जैसी हिदायतें भी बहुत सख्ती के साथ दी जाती थी और सभी उसका नियम पूर्वक पालन भी किया करते थे सच वो समय ही कुछ ओर था. 
ऐसे में अधिकतर लोग दशहरे का इंतजार किया करते थे. बाकि वर्णों का तो पता नहीं लेकिन कायस्थ बंधुओ के यहाँ तो ज्यादा तर ऐसा ही होता था. तब यह सुन सुनकर बहुत आश्चर्य हुआ करता था कि लोग,  लोंग पर, तुलसी के पत्ते पर, केवल चाय पर, व्रत कैसे रख लिया करते थे...! तब मम्मी कहती थी कि यदि श्रद्धा सच्ची हो तो खुद माता रानी आपको हिम्मत देती है और उन दिनों आपको बिलकुल भी भूख नहीं लगती. जबकि आप अपने लिए छोड़कर पूरे घर के लिए भोजन बनाते हो पर तब भी आपका मन भोजन के प्रति नहीं लालाचाता. पहले तो इस बात पर यकीन नहीं होता था. लेकिन फिर जब शादी के बाद खुद यह व्रत रखे,  तो बिलकुल वही अनुभव हुआ जो मम्मी ने कहा था और आज भी यह प्रथा कायम है. वैसे तो माता रानी के सभी नवरात्र अत्यधिक महत्वपूर्ण हैं. लेकिन उन सब में यह "चैत्र नवरात्रोन" का विशेष महत्त्व है. यह उन दिनों समझ में नहीं आता था क्यूंकि इन नवरात्रो के समय अधिकांशतः वार्षिक परीक्षा हुआ करती थी तो ज्यादा कुछ जोश ओखरोष या हर्षोल्लास महसूस नहीं होता था.  उपर से स्पीकर पर बजते भजन से पढ़ाई में और मन नहीं लगता था. 
लेकिन त्यौहार मानाने का जोश कभी खत्म नहीं होता था. एक वो दिन थे और एक आज के दिन है. जब हर त्यौहार को मनाने की सिर्फ औपचारिकता ही शेष रह गयी है. विशेष रूप से उन घरों में जहाँ बेटियाँ नहीं है ,सिर्फ बेटे ही हैं. वहाँ कब कौन सा त्यौहार आया और आकर चला गया का पता ना पहले कभी चल पाता था ना आज चल पाता है.सच बेटियों से ही घर घर कहलाता है.   

Thursday, 23 February 2023

तुम करती ही क्या हो ...? व्यंग

 

आज सुबह सवेरे में प्रकाशित 


तुम करती ही क्या हो...?

एक औरत दूसरी से तुम क्या करती हो...? मैं एक गृहणी हूँ. हाँ वो तो ठीक है, पर तुम करती क्या हो.? ‘आई मीन यू नो...? तुम घर में कैसे रह लेती हो यार, मेरा तो जी घबराता है, बुखार आजाता है. अच्छा, तो तुम क्या जंगल में रहती हो.? व्हाट रबिश... मेरे कहने का मतलब था कि "घर के काम एंड ऑल" ओह.! तो उसमें क्या है, तुम जैसों के लिए घर को घर बनाते है और क्या. अरे घर में काम ही क्या होता है.आजकल तो सभी घरों में अधिकतर झाड़ू पोंछे और बर्तन के लिए बाई लगी होती है. बस सिर्फ खाना ही तो बनाना होता है और थोड़ी बहुत साफ सफाई, बस और तुम फ्री.अच्छा...! तुम्हें कैसे पता कि उसके बाद हम फ्री..? तो और क्या बढ़िया खाओ और सौ जाओ चैन की नींद. ओह...! तो बच्चों को लाना, उनके आने के बाद उन्हें समय से खिलाना, पढ़ना, उनके साथ समय बिताना, खेलना और समय से उन्हें सुलाना. यह सब तो अपने आप ही हो जाता है. है ना...! और कपडे भी खुद ही अपने आप चेक होकर मशीन में टेलीपोर्ट होकर खुद ही धुल जाते हैं और पता है कमाल की बात तो यह है कि खुद ही अपने आप बाहर जाके सूखकर, छटकर, प्रेस के लिए भी अपने आप ही चले जाते है. नहीं....! बताओ...! कित्ता ज़माना बदल गया है भई... मुझे तो सही में अब तक पाता ही नहीं था. एक कुटिल मुस्कान के साथ, नहीं ...?
खैर, मेरी छोड़ो तुम क्या करती हो...? मैं एक कंपनी में मैंजर हूँ. हो.....! मतलब तुम कुछ भी नहीं करती...? तुम्हारे लिए सब दूसरे ही कर के देते हैं. वाह...! क्या मतलब है तुम्हारा ? पूरी टीम को मैंनेज करती हूँ मैं, किसी से काम करवाना आसान नहीं होता. कभी करा के तो देखो, तब पता चले. कितना मुश्किल होता है इतने सारे लोगों को मैंनेज करना...ओह...! बाईयों से काम करना तो बहुत आसान होता है...वो भी जब, जब वो बहुत ही कम पढ़ी लिखी होती है. मगर दुनियादारी बखूबी जानती है और बच्चे संभालाना, वो तो चुटकीयों का काम है. क्योंकि वो तो नासमझ होते है, तो दिन भर सवाल करते हैं... और उनके सभी सवालों का सही सही जवाब देना तो....दिमाग लगाने की जरूरत ही नहीं पड़ती “यू नौ” कुछ भी नहीं रखा है इसमें, नहीं...! और तुम तो पढ़े लिखे बहुत ही समझदार लोगों को संभालती हो...सही है. तो अब तुम मुझे बताओ कि तुम करती ही क्या हो...?

Sunday, 19 February 2023

कुछ तो गड़बड़ है तारा ~एक व्यंग ~

~कुछ तो गड़बड़ है तारा ~ 
सुबह सवेरे में प्रकाशित मेरा लिखा एक व्यंग 


अरे सीमा तुम यहाँ रसोई में क्या कर रही हो बेटा जाओ जाके पढ़ाई करो. कितनी बार कहा है तुम से, यह जगह तुम्हारे लिए नहीं है.... एक बार पढ़ लिखकर अपने पैरों पर खड़ी हो जाओ. फिर इस काम के लिए हज़ारों पड़े है अपने हिंदुस्तान में, पर माँ मुझे यह सब करना अच्छा लगता है, यह तड़के की खुशबु, यह फूली फूली गुब्बारे नुमा रोटियाँ मुझे बहुत आकर्षित करती हैं. मैंने कहा ना तुम से....नहीं मतलब नहीं. एक बार में बात समझ नहीं आती है क्या तुमको...? चलो जाओ अपने कमरे में, फिर थोड़ी देर बाद तुषार लाओ माँ मैं बना देता हूँ. रसोई में खाना बनाना तो मुझे भी बहुत पसंद है. पता है कल ही मैंने खाना खज़ाना वाले संजीव कपूर का वीडियो देखा. क्या लाजवाब दम आलू बनाया था उन्होंने, देखकर ही मुँह में पानी आगया. हे भगवान....! क्या होगा इस घर का सभी खाँसामा ही बनाना चाहते हैं यहाँ, यह नहीं कि कोई पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बनने की बात करे.

"कुछ तो गड़बड़ है तारा" मन ही मन तारा ने सोचा. चलो ना माँ आज ट्राइ करते हैं बड़ा मज़ा आएगा. मैं खाना बनाऊंगा और तुम मेरा वीडियो बनाना, ठीक है ? फिर अपन इसे यूट्यूब पर डालेंगे. पागल हो गया है क्या....? यह सब तेरे काम नहीं है. इतना भी नहीं जनता क्या कि यह सब औरतों के काम है. तेरी बीवी आएगी ना, उससे करना यह सब काम. अच्छा..? और जो उसकी रूचि ना हो इन सब कामों में तो, तो क्या, घर के काम तो बेटा तब भी करने ही पड़ते हैं हम औरतों को, छोड़ो ना माँ क्यों झूठ बोलती हो. अरे मैंने क्या झूठ बोला, सच ही तो कहा। अच्छा तो फिर दीदी को क्यों नहीं करने दिया तुमने....माँ एकदम चुप कहे तो क्या कहे...खून का घूंट पीके रह गयी। अरे दीदी तुम्हारी नेल पेंट कितनी अच्छी है, मुझे भी दो ना मैं भी लगाऊंगा...और फिर तुम्हारा दुपट्टा ओढ़कर डांस भी करूँगा। यह देखते ही अब तो जैसे तारा के पैरों तले मानो ज़मीन ही निकल गयी। यह मेरा बेटा क्या कह रहा है। अब तो पक्का कुछ गड़बड़ है तारा, इससे पहले कि सच में कुछ गड़बड़ हो, कुछ कर तारा... कुछ कर.....! हाय राम...! एकता कपूर के धारावाहिक कि तरह उसने मन ही मन तीन बार कहा नहीं....नहीं....नहीं.....ऐसा नहीं हो सकता...बेबसी के भाव लिए, तारा ने तुषार से कहा यह क्या कह रहा है बेटा, भूल मत तू लड़का है....जरा तो लड़कों जैसी हरकतें कर बेटा....लड़कों जैसी....तारा की पड़ोन शीतल ने भी यह सब अपनी आँखों से देखा और कहा... तू कर क्या रही है तारा ? एक तरफ तो अभी अभी कॉलेज में महिला दिवस पर इत्ता कुछ कह रही थी अधिकारों के हनन को लेकर और अब खुद अपने ही घर में अपने ही बच्चों के अधिकारों का हनन... “कुछ तो गड़बड़ है तारा”.... जरुर कुछ तो गड़बड़ है...

Friday, 10 February 2023

कहानी लेलो कहानी ~व्यंग

 


भोपाल से निकलने "सुबह सवेरे" समाचार पत्र में प्रकाशित मेरा लिखा एक व्यंग 

कहानी ले लो भाई साहब, कितने की दी ? भईया एक कहानी मात्र ढाइसो कि है। अरे बाप रे ! यह तो बड़ी महंगी है। थोड़ी सस्ती में देते हो तो बताओ। अच्छा कितना दाम लगाओ गे आप बताओ ? डेढ़सौ में दे रहे तो बात करो। अरे नहीं नहीं...। इतने में तो केवल लघु कथा ही मिल सकती है, यह नहीं। यह तो बड़ी कहानी है, इतने में तो नहीं पड़ेगी। अच्छा तो ठीक है फिर, रहने दो कभी ओर देखेंगे। अच्छा ठीक है भाई साहब, कहानी लेलो भई कहानी छोटी बड़ी सभी तरह कि कहानियाँ...! आगे चलकर फिर किसी ने आवाज दी अरे भईया जरा सुनना तो सही, एक कहानी कितने में दी ? अरे दीदी ज्यादा नहीं बस ढाईसौ । क्या ....! इतनी महंगी ? कहाँ दीदी, यह तो केवल महनतना ही मांग रहे हैं। वरना असल कीमत तो हमने अभी तक लगायी ही नहीं है।

अरे नहीं भईया तब भी बहुत मंहगी है। हाँ तो दीदी बड़ी भी तो है, ऊपर से आप लोग शब्दों का प्रतिबंद अलग लगा देते हो, कभी सोचा है कि स्व्छंद लिखने वाले को कितनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है और एक आप हो उसमें भी मोल-भाव कर रही हो। लेलो न एक कहानी दीदी, आपका क्या जाएगा। आप तो खुद भी इतना लिखती हो कि आपके हाथ के नीचे  से निकलने वाली छोटी मोटी पत्रिका वह भी वो वाली जो अखबार के साथ अलग से आती है, तक में केवल दो पन्ने तो आपके ही होते हैं। ऐसे में हमारा लिखा भी थोड़ा सा लेलोगी तो आप क्या बिगड़ जाएगा। 

बस बस ज्यादा बकवास करने कि जरूरत नहीं है। जितना पूछा जाए उतना ही बताओ और हाँ ठीक ठीक भाओ लगाओ वरना और भी बहुत लोग हैं लाइन में, जिन्हें अपनी कहानियाँ और कवितायें बेचनी है हमें। एक तुम ही  अकेले नहीं हो। हाँ हाँ...! दीदी यह बात तो हम बहुत अच्छे से जानते है। आप यह लघु कथा लेलो मात्र डेढ़सौ कि है। नहीं भाई तुम अब तक मेरी बात का सही अर्थ नहीं समझे। लघु कथा वह भी डेढ़सौ कि बहुत महगी है। ऐसा करो एक बड़ी कहानी के साथ एक लघु कथा नहीं तो एक व्यंग या फिर एक कविता मुफ्त दे दो तो हम यह कहानी अभी खरीद लेते हैं। नहीं दीदी, यह न हो पाएगा। सोच लो भईया...! जो मैंने कहाँ वही सबसे अच्छा सौदा है कम से कम कुछ नहीं से कुछ तो मिल रहा है। नहीं दीदी, ना हो पाएगा। आगे चलेते हुए फिर कहानी ले लो कहानी...

सुनो भईया मेरे पास तुम्हारे लिए एक योजना है कहो तो बताऊँ ? अरे साहब सुबह से कहानियाँ बेचने निकला हूँ अब तक बौनी नहीं हुई और आप एक और नयी योजना ले आए हो, न ना मेरे पास टेम ना है। अरे कम से कम योजना सुन तो लो, नहीं जमे तो ना लेना। अच्छा ठीक है, बताओ क्या है आपकी योजना। द्खो मैं भी यही रहता हूँ और एक अखबार चलता हूँ। जिस तरह तुम्हारी कहानियाँ नहीं बिक रही उसी तरह मेरा अखबार भी कोई खास नहीं बिक रहा है। तो क्यूँ ना साथ में मिलकर धंधा किया जाये। तुम हमारे अखबार कि सदस्यता लेलो हम तुम्हारी कहानियाँ वहाँ छाप दिया करेंगे जिससे थोड़े ही दिनों में तुम्हारा नाम भी हो जाएगा और हमें भी कंटेन्ट मिल जाएगा। अरे बाबू जी, तो इसमें मेरा क्या भला होगा। सारी मलाई तो आपको मिल जाएगी। अरे तुम्हारा भी तो भला हो रहा है, रोज़ छपोगे और यदि प्राइम मेम्बर शिप लोगे तो एक ही पेज पर तुम्हारी एक से अधिक रचनाओं को स्थान दिया जाएगा।

अरे वाह रे बाबू जी आपको हमारे माथे पे क्या लिखा दिखा जो आप यह योजना हमारे पास लेकर आए हैं। हमारी ही कहानी हम से ही पैसा लेकर, यदि आपने छाप भी दी तो कौना सा बड़ा अहसान किया बात तो तब होती जब आप मुझे मेरे महंताने के साथ मेरी कहानी को अपने अखबार में स्थान देते। रहने दो बाबू जी रहने दो।

कहानी ले लो कहानी एक कहानी के साथ एक कविता, एक कविता के था एक लघु कथा, और एक लघु कथा के साथ एक व्यंग मुफ्त ..... 

Friday, 13 January 2023

फेसबुक वाल और व्हाट्सप्प स्टेटस के बीच उलझी ज़िंदगी~


फेसबुक वाल और व्हाट्सप्प के स्टेटस में उलझी ज़िंदगी सुनने में अजीब लगता है है ना ! लेकिन आज की जीवन शैली का यही सर्वभोमिक सत्य है। क्यूंकि सोश्ल मीडिया आज के समय की शायद सबसे बड़ी अवश्यकता है। इंसान एक दिन बिना भोजन के रह सकता है, बिना जल के भी रह सकता है। लेकिन बिना इंटरनेट के नहीं रह सकता। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तो आपको समस्त स्त्रियॉं के निर्जले वर्त और त्यौहारों पर बड़ी ही सुलभता से देखने मिल जाएंगे। इन वर्तों में या उपवासों में भले ही पूजा जरूरी हो या न हो, किन्तु फोटो खींचना और उसे सोशल मीडिया के तमाम प्लेटफार्मों पर डालना सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य सिद्ध होगया है। दूजा आप यदि किसी भी वजह से खुश है, जो कि ईश्वर करे आप सदा खुश रहें। तो भी दुनिया को कैसे पता चलेगा कि आप आज बहुत खुश हैं। तो भई फेसबुक और व्हाट्सप्प स्टेटस से ही तो सब को पता चलेगा ना कि आज आप बहुत खुश है। वहीं दूसरी और यदि आप किसी कारण वश बहुत परेशान है या दुखी है तो यह भी तो सब को पता चलना चाहिए न है कि नहीं ? नहीं आप बताओ है ना ! तो इसके लिए भी फेसबुक की दीवार और इंसटाग्राम हैं ना दुख भरी पोस्ट सांझा करने के लिए।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण कारण यदि आपको ऐसा लगे कि आज आप बहुत ही खूबसूरत लग रहे हैं। तब तो फिर बात ही क्या जनाब...! अब इतनी जोरदार बात भी तो सभी को पता चलनी चाहिए, है कि नहीं! तो बस ज्यादा कुछ नहीं करना है आपको, बस सेल्फी टाइम का टेग चिपकाकर अपनी तसवीरों कि भरमार से भर दीजिये अपनी फेसबुक की दीवार, व्हाट्सप्प स्टेटस, इंसटाग्राम आदि पर, और क्या चाहिए। वैसे इसमें कोई बुराई नहीं है। ना ना, मैं इस सब के खिलाफ नहीं हूँ। मैं तो खुद भी इस सब का हिस्सा हूँ । आखिर मैं भी आप सब में से ही एक हूँ। हालांकि मैंने तो यहाँ बहुत ही आम उपयोग में आने वाले केवल दो एप्स्स को ही सम्मिलित किया है। वरना आज कि तारिक में तो न जाने कितने ऐसे प्लेटफॉर्म है सोश्ल मीडिया पर जिन पर जाकर लोग अपनी भावनाएं प्रकट किया करते है। पर असल मुद्दा यह नहीं है कि ऐसा कुछ भी करना उचित है या अनुचित है।

बात तो यह है कि इस सोश्ल मीडिया ने हमारी जिंदगी जितनी आसान बना दी, उतना ही कहीं न कहीं हमे वास्तविकता से दूर कर दिया है। इतना दूर कि आज हम कैसा महसूस कर रहे है उसकी भी तस्वीरें ले लेकर दूसरों को दिखाना पड़ रहा है। जरा सोचिए, भावनात्मक स्तर पर जब हमारा यह हाल है तो इस आभासी दुनिया में जीते जीते हम खुद आभास हीन होते चले जा रहे हैं और हमे पता भी नहीं चल रहा है। बस भेड़चाल में भेड़ बने, बिना कुछ सोचे, बिना कुछ समझे, बस चले जा रहे हैं। ना रस्तों का पता है, न मंजिल का पता है। सबसे ज्यादा अफसोस तो तब होता है, जब इन्ही माध्यमों पर हमें अपने उन लोगों कि झूठी तस्वीरें दिखाई देती है, जिनकी असल ज़िंदगी के बारे में हम बहुत करीब से जानते है कि वह व्यक्ति वास्तव में अंदर से कितना दुखी है। यही से एक सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न कि उत्पत्ति होती है कि आखिर ऐसी क्या बात है इस दुनिया में कि यह आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता बन गयी है।

जहां तक मेरी समझ कहती है, जीवन की अपूर्णता ही इस आभासी दुनिया की सबसे बड़ी जरूरत है। जब आपको अपने निजी जीवन में ऐसे लोग नहीं मिलते, जो आपके लिए थोड़ा सा समय निकालकर आपसे बात कर सकें, आप पर ध्यान दे सकें, आपसे दो बोल प्यार के बोल सकें। ज्यादा कुछ नहीं तो कम से कम इतना ही पूछ लें कि आज आप कैसे हो, या आज आप बहुत अच्छे लग रहे हो, या ऐसी कोई भी बात जो आप चाहते हो कि कोई आप से पूछे, आप किसी से मिलो, तो आप उससे पूछो और बातों का सिलसिला चले। कुछ मन बदले, यह आम जीवन की वह बातें हैं, जिसकी आशा हम अक्सर अपने आस पड़ोस वालों से या अपने घरवालों से रखते हैं।

लेकिन जब आजकल की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में जहां किसी को किसी के लिए समय नहीं है। यहाँ तक के परिवार के सदस्यों तक के पास इतना समय नहीं है कि वह एक साथ मिलकर खाएं, बैठें और आपस में एक दूसरे से इस तरह कि बातें पूछें और बताएं, बात करें और जब यही छोटी छोटी बातें हमें यह सोश्ल मीडिया के किसी प्लेटफार्म पर मिलती हैं। तब बहुत ही आसानी से हम वास्तविक दुनिया को भूलकर इस आभासी दुनिया कि ओर मुड़ जाते है। या यूं कहे कि इस दुनिया में खुश रहना सीख जाते हैं, तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। फिर धीरे-धीरे ज़िंदगी इस फेसबुक कि दीवार और इस व्हाट्सप्प  के स्टेटस में उलझ के रह जाती है और वास्तविक रिश्तों में दूरियाँ आती चली जाती है। इसी से यह पता चलता है कि जीवन में इन छोटी छोटी बातों का कितना बड़ा महत्व होता है। तो इन्ही बातों का ध्यान रखते हुए, अपने रिश्तों को बचाइए क्यूंकि रिश्ते दिखावे से नहीं बल्कि प्यार से निभाय जाते हैं।  

Wednesday, 4 January 2023

~अश्लीलता परोसता इंटरनेट ~

 

बात गंभीर है इसे हल्के में ना लिया जाये पर आज का कटु सत्य यही हैं। माना कि इंटरनेट आज हमारी सबसे बड़ी जरूरतों में से एक है इसके बिना जीवन संभव नहीं है। आज इंटरनेट है तो हम है और उसी की कृपा से मैं आज यहाँ यह सब लिख पा रही हूँ।  इंटरनेट ना होता तो पेंडमिक साल में लोग मानसिक रूप से गंभीर बीमारियों की चपेट में आसानी से आ गए होते। लेकिन इस इंटरनेट ने ऐसा होने से सभी को बचा लिया। बड़ी कृपा है इस इंटरनेट कि जिसके माध्यम से हमारे बच्चों की शिक्षा छूटने से बच गयी। अगर सभी अध्यापकों ने ऑनलाइन क्लासेस ना ली होती तो दसवीं और बारहवीं वाले बच्चों के लिए सबसे बड़ी मुसीबत खड़ी हो जाती।  बच्चों के साल बर्बाद होते वो अलग, इसलिए सभी अध्यापकों का आभार सहित धन्यवाद है।  इंटरनेट के बिना अपनी दुनिया की कल्पना तक नहीं की जा सकती। यदि यह ना होता तो महिलाओं के अंदर छिपा हुनर बाहर निकल के ना आ पाता। कई लोगों को पेंडमिक के दौरान इसी इंटरनेट ने भूखों मरने से बचाया है। यूँ देखो तो आज की आधुनिक जीवन शैली का ना सिर्फ एक अहम् हिस्सा है इंटरनेट बल्कि कइयों के लिए तो यह भगवान है इंटरनेट। यदि मैं ऐसा कह रही हूँ तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए और मैं यदि इसके इस मोबाइल नामक यँत्र की जितनी तारीफ़ करूँ कम ही होगी। लेकिन वही दूसरी ओर अब जो कुछ भी मैं कहने जा रही हूँ, वह भी इस इंटरनेट के इस मोबाइल नामक खतरनाक यँत्र की वह देंन है, जो इंटरनेट का एक बहुत ही घिनौना और भयावह रूप लेकर हमारे सामने आता है।

यह कोई आज की बात नहीं है, लेकिन आजकल इन बातों का प्रचलन पहले की तुलना में इतना अधिक बढ़ गया है कि सोचते ही रोंगटे खड़े हो जाते है। आजकल जहां देखो वहाँ हर वैबसाइट पर इस तरह के विज्ञापन आने शुरू हो जाते हैं और गलती से भी यदि मोबाइल देखते वक्त आपके अंगुलियों के स्पर्श से ऐसे किसी लिंक पर हाथ लग जाये। तो फिर तो, कहना ही क्या। तब जैसे इस तरह की सामग्री की तो जैसे बाढ़ ही आ जाती है। हर जगह बस उसी से संबन्धित विडियो ही आपके सामने आकर आपको शर्मिंदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। यूं तो हम देश के विकास की बात करते है, गाँव के सुखद जीवन और ज़मीन से जुड़े रहने की बातें करते हैं, हमारे और आपके लेखन में भी गाँव की गलियों से लेकर गाँव की पगडंडियों तक का ज़िक्र होता है, खेत खलियानों का ज़िक्र होता है, गाँव की शुद्ध हवा और साधारण से देखने वाले नेक लोगों का जिक्र होता है। खेतों की बात निकलते ही हम अपने बचपन की स्मृतियों में खो जाना चाहते है। लेकिन आज इस इंटरनेट की दुनिया ने जैसे यह सब धूमिल कर के रख दिया है। आज वही गाँव के रहने वाले और साधारण से दिखने वाले लोग ही खेतों में जाकर ऐसे ऐसे अश्लील विडियो बना रहे हैं कि देखते ही, सर चकराने लगता है, आँखों के आगे अंधेरा छा जाता है या फिर आँखें इस कदर चौंधिया जाती है कि दिखाई देना बंद हो जाता है और गाँव के लोगों के संस्कारों की धज्जियां बिखर जाती है। हमारे देश की संस्कृति और सभ्यता की बातें जैसे मुंह छिपाने लगती है। और ऐसा सिर्फ गांवों में नहीं होता शहरों में भी बहुत बड़े दर्जे पर हो रहा है और शहरों की ही यह जहरीली हवा है जिसने गाँव की शुद्ध हवा को भी दूषित कर कचरे में गिरा दिया है।  

अब आप सोच रहे होंगे कि मुझे यह सब कैसे पता ? है ना ! तो मैं यहाँ यह बताती चलूँ कि मुझे ऐसी सामग्री देखने में कोई दिलचस्पी नहीं है। लेकिन आजकल जो यह “रील” बनाने और देखने का सिलसिला चल निकला है ना ! यह बस उसी की देन है। अब कोई माने या ना माने पर सच तो यही है कि हर कोई जब भी अकेले बैठता है तो मोबाइल पर चाहे खुद रील बनाए या ना बनाए लेकिन समय काटने के लिए रील देखता ज़रूर है। और बस यही से उसकी जिंदगी बर्बाद होने की शुरुआत हो जाती है।  क्यूंकि जब तक आप अच्छी सामाग्री देख रहे हो, तब तक तो ठीक है।  लेकिन इस बीच यदि ऐसा कोई भी कनटेंट आ गया जिसे हम अश्लील की श्रेणी में रखते है तो बस समझ लीजिये फिर आपका मोबाइल इस तरह की सामग्री परोसने का गढ़ बन जाएगा और आपके मान सम्मान और प्रतिष्ठा की लंका लगा देगा। कभी कभी सोचती हूँ तो लगता है जब हम जैसों का यह हाल है तो जरा उन उम्र दराज़ व्यक्तियों के विषय में सोचिए। जिन्हें ठीक से दिखाई नहीं देता या फिर जिनकी अगुलियाँ ठीक से काम नहीं करती। जब वह बुजुर्ग लोग इंटरनेट के माध्यम से खुद को मनोरंजित करने का प्रयास करते हैं या समय काटना चाहते हैं, तो वह क्या करें ? उनके हाथों से तो अक्सर ऐसी गलतियाँ हो जाया करती हैं और हम उनके चरित्र पर तुरंत उँगलियाँ उठाने और अपशब्द कहने में देर नहीं करते।

अभी तो बात बुज़ुर्गों तक ही है। जरा युवा पीढ़ी के बारे में सोचिए। वह तो दिन रात इंटरनेट पर ही बिताते हैं। चौबीसों घंटे उनका समय चाहे पढ़ाई से संबन्धित हो या खेल से संबन्धित इंटरनेट पर ही बीतता है। क्या उनकी आँखों के सामने से यह सब नहीं गुज़रता होगा ? बिलकुल गुज़रता होगा। कई युवा तो इसी पर ध्यान देते भी होंगे, तो कई इसे नज़र आंदज करके आगे भी निकल जाते होंगे। अब जरा उन छोटे बच्चों के विषय में सोचिए, जिनके स्कूल का बहुत सा काम इंटरनेट से जुड़ा होता है। आमतौर पर हम इतने छोटे बच्चों को अलग से मोबाइल देना उचित नहीं समझते। तो वह या तो अपनी मम्मी या पापा के मोबाइल पर ही अपना सारा काम देखते समझते और करते हैं। वैसे अधिकतर मम्मियों का मोबाइल ही होता है पापा लोग अपना मोबाइल बच्चों को देना पसंद नहीं करते। शायद “चोर की दाढ़ी में तिनका” वाली कहावत यहाँ सच बैठती हो। खैर यह तो मज़ाक वाली बात हो गयी। तो हम बात कर रहे थे बच्चों की, तो बच्चे अपना सारा काम मम्मी के मोबाइल पर करने के बाद फिर थोड़ी देर मोबाइल पर खेलने की ज़िद भी करते हैं। कई बार यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म पर अपनी पसंद की कोई कार्टून फिल्म देखना भी पसंद करते हैं और आपको गाहे बगाहे उन्हें अपना मोबाइल देना ही पड़ता है। तो आपको क्या लगता है ऐसे में आपका बच्चा इस प्रकार की सामाग्री देखने से कितना सुरक्षित है क्यूंकि आप एक व्यस्क है और यूट्यूब पर कब कौन से लिंक के नीचे आपको क्या लिंक देखने को मिल जाये इस बात की गारंटी शुरू से ही यूट्यूब पर नहीं होती।   

चलिये एक बार को मान लेते हैं कि इतने छोटे बच्चे तो फिर भी इस सब से बचे रहते हैं क्यूंकि उन्हें उस दौरान केवल अपने कार्टून से मतलब होता है और किसी चीज़ से नहीं। लेकिन हमारे युवा होते बच्चों का क्या ? उनके मन में तो हार्मोनल लोचों के चलते इन सब चीजों के प्रति वैसे ही बहुत कोतूहल और जिज्ञासा पनपती रहती है। ऐसे में बिना सही जानकरी प्राप्त किए उन्हें यह सब इंटरनेट पर खुल्लमखुल्ला देखने को मिल रहा है। जिसके कारण सही जानकारी के अभाव में उन्हें पथभ्रष्ठ होने में जरा समय नहीं लगता। भले ही दिखाये जाने वाले विडियो में लड़का और लड़की किसी भी तबके या प्रांत के क्यूँ ना दिखाई दे रहे हों, भले ही लड़की को देखकर यह साफ पता चल रहा हो कि वह सभ्य परिवार की ना होकर किसी देहव्यपार वाली जगह से लायी गयी है। कौन जाने उसकी ऐसी क्या मजबूरी है जो उसे अपने काम के बदले में मिलने वाले पैसे के लिए यूं इस तरह, वीडियो में भी शामिल होकर देह प्रदर्शन भी करना मंजूर किया होगा।

खैर कारण चाहे जो भी हो, लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि महिलाओं के प्रति बढ़ते बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों के पीछे कहीं न कहीं इस तरह के विडियो, रील्स आदि भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जितना कि ऐसा कुकृत्य करने वाला अपराधी। क्यूंकि कहीं न कहीं पैसा कमाने के चक्कर में आज गाँव से आया सीधा सदा आदमी जब अपना परिवार गाँव में छोड़कर शहर आता है और जब यहाँ आकर उसके हाथ सफलता कम और निराशा ही ज्यादा हाथ लगती है तो वह अपराधबोध का शिकार हो जाता है फिर शहर में रहना है तो मोबाइल रोटी से अधिक अवश्यक चीज़ बन जाता है। क्यूंकि अब तो किसी कि मेहनत का मेहनताना हो या वेतन केवल मोबाइल पर ही दी जाती है। फिर यदि मेहनत करने वाली स्त्री हो तो फिर भी पैसा बचाकर अपना स्तर ऊपर उठाने का प्रयास करती है। लेकिन वहीं जब कोई पुरुष हो तो वह नशे की लत में पड़ अपना पूरा वेतन नशे की सामग्री में ही उड़ा दिया करता है और ऊपर से यह मोबाइल पर परोसे जाने वाली अश्लील सामाग्री उसे कहीं का नहीं छोड़ती। फिर वो अपना फ्रस्टेशन मिटाने के लिए मासूम लड़कियों को अपना शिकार बना डालता है।

वैसे तो इस प्रकार की भूख मिटाने के लिए ही शायद यह देहव्यापार के अड्डे बनाए गए हों। लेकिन वहाँ भी पैसा ही बोलता है और नशे में पड़े व्यक्ति के पास पैसा बचता ही कहाँ है, जो वहाँ जाकर अपनी भूख मिटा सके। फिर भूख तो भूख ही होती है जो कब  इंसान को इंसान से जानवर बना दे इस बात का पता खुद इंसान को भी नहीं चलता। अफसोस की इन भूखे भेड़ियों का शिकार बन जाती है हमारी मासूम बेटियाँ। इसलिए मैं चाहती हूँ कि साइबर सिक्योरिटी वाले इस सिलसिले में ऐसा कोई कदम उठाएँ कि इस तरह का वयस्क कंटैंट सभी के हाथों इतनी आसानी से ना पड़े  जितनी आसानी से आज के समय में उपलब्ध है ।   

वैसे तो यह बहुत ही गंभीर विषय है पर एक स्त्री होने के नाते मैंने यह विषय उठाया है तो निश्चित ही मुझ पर बहुत से सवाल उठेंगे और मेरा इस आलेख को कहीं कोई स्थान नहीं मिलेगा। क्यूंकि इसकी सामग्री में अश्लील शब्द जुड़ा है। यूं भी हमारे देश में लोग अश्लीलता देखना पसंद कर लेते हैं लेकिन पढ़ना पढ़ना कोई पसंद नहीं करता। इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं हमारी आजकल की फिल्में  खैर वह एक अलग मुद्दा है। लेकिन मैं तो बस इतना चाहती हूँ कि इस आलेख को कहीं ऐसी जगह स्थान अवश्य मिले जहां से यह विषय जन जन तक पहुँच सके और लोग इस विषय को गंभीरता से सोच सकें। मेरा इस आलेख के माध्यम से खुद का प्रचार प्रसार करने का कोई इरादा नहीं है। मैं तो बस विषय कि गंभीरता को आमजन तक पहुंचाना चाहती हूँ। 

तो जो कोई भी पत्र पत्रिका या समाचार पत्र मेरे ब्लॉग से ब्लॉग उठाए कृपया सूचित अवश्य करें। ताकि मुझे यह पता चल सके कि मेरा विषय आमजन तक पहुंचा या नहीं। धन्यवाद

Thursday, 24 November 2022

Fair & lovely / glow & lovely


 

Fair & lovely / glow & lovely 

21नवम्बर  को सुबह सवेरे में प्रकाशित  मेरा लिखा यह आलेख

https://epaper.subahsavere.news/view/184/bhopal/8

कहने को तो यह विषय बहुत पुराना है और बहुत ही संवेदनशील भी है। लेकिन इन दिनों मैं कुछ अलग सा ही महसूस कर रही हूँ। यहाँ बात केवल रंग रूप कि नहीं बल्कि व्यवहार कि भी है। मैंने देखा है, इन दिनों कि जिस किसी व्यक्ति में कोई कमी ऐसी हो, जो देखने मात्र से दिखाई दे जाए।  तो वह व्यक्ति अब पहले कि तरह खुद को हीन नहीं समझता, जो कि एक बहुत ही अच्छी बात है, समझना भी नहीं चाहिए। लेकिन शत प्रतिशत ऐसा होता भी नहीं है। कम से कम मुझे ऐसा लगता है कि वास्तव में वह व्यक्ति अंदर ही अंदर डरा हुआ होता है और उसका वह डर उसे घमंडी और चिड़चिड़ा बना देता है। क्यूंकि कहीं न कहीं उसके मन में यह बात बैठ जाती है कि उस कि उस कमी की वजह से लोग उस पर ताने कसेंगे या फिर उसे अजीब दृष्टि से देखेंगे या उसके विषय में अपशब्द कहेंगे। क्या ऐसा होना सही है??


मेरे विचार में तो कदापि नहीं, ध्यान रहे कि मैं यहाँ किसी शारीरिक विकलांगता को लेकर बात नहीं कर रही हूँ। बल्कि रूप रंग में आये हुए कुछ बदलावों या कमियों कि बात कर रही हूँ। जैसे सफेद दाग़ की बिमारी, जिसे अंग्रेजी में शायद (लुकॉडर्मा) कहते हैं। खासकर स्कूल में युवा होते बच्चों में अगर यह किसी विद्यार्थी को हो, तो फिर कभी आप उससे बात कर के देखिये। वह अपने आपको को कुछ इस तरह दर्शाने का प्रयत्न करता है, मानो अपने स्कूल का सबसे काबिल छात्र /छात्रा एकमात्र वही है। सब से खास, उसके जैसा और कोई दूजा विद्यार्थी पूरे स्कूल में कोई नहीं है और एक अलग ही तरह का घमंड जो शायद सामजिक आसविकार्यता के कारण उसमें आया है। वह अपने उस डर को, अपने उस घमंड के पीछे छिपा देना चाहता है। ताकि कोई गलती से भी उसकी कमी को लेकर उस पर कोई प्रश्न चिन्ह ना खड़ा कर दे।


मैंने देखा है, ऐसा कुछ श्याम वर्ण के लोग को, वह भी ऐसा ही कुछ महसूस करते है। क्यूंकि  उनका रंग भी कहीं ना कहीं उनके लिए परेशानियों का कारण बन जाता है। यहाँ गेहूंये या भूरे रंग कि बात नहीं हो रही है। यहाँ उन लोगों कि बात हो रही है, जो वास्तव में काली कमली वाले के रंग से मेल खाते हैं। जो सच्ची में गहरे श्याम वर्ण के कहलाते है। चंद श्वेतवरण ही अच्छा होता है, जैसा भ्र्म पालने वाले लोगों के ताने उन्हें आत्मसमान से जीने नहीं देते। जिसके चलते उनके मन में आत्मविश्वास कि भारी कमी आजाती है और वह विद्रोह का व्यवहार धारण कर लेते है। फिर हर बात में वह अपने आपको को दूसरे से कहीं ज्यादा उच्च दिखाने कि कोशिश करने लगते है। फिर चाहे वह कोई भी क्षेत्र क्यों ना हो, वह यह स्वीकार नहीं कर पाते कि हाँ मुझे इस क्षेत्र कि कोई जानकारी नहीं है। बल्कि वह विद्रोह पर उतर आते हैं कि वह ही सही है। क्या आपको नहीं लगता कि उनके इस तरह के व्यवहार के लिए कहीं न कहीं हम ही जिम्मेदार हैं नहीं ?


ऐसा किसने कहा, या ऐसा कहाँ लिखा है कि श्याम वर्ण के लोगों को अच्छा दिखने या अच्छा लगने का अधिकार नहीं है या अन्य व्यक्तियों कि तरह उन्हें सौंदर्य प्रसाधन खरीद ने और उन्हें उपयोग करने का अधिकार नहीं है। वह भी इंसान है और बाकी आम इंसानो कि तरह उनकी भी वही इच्छा होती है कि वह भी अच्छे दिखें, तो इसमें गलत क्या है? आजकल तो सौन्दर्य प्रसाधनों में भी हर तरह के वर्ण के लिए, सभी तरह के प्रसाधन उपलब्ध हैं। फिर भी किसी को यह ताना देना कि अरे तुम (मेकअप) लगा के क्या करोगी। दिखेगा तो कुछ है नहीं, उल्टा पैसों कि बर्बादी और करोगी।  ऐसा करो, तुम तो रहने ही दो, जितना सादा रहोगी उतना ही अच्छा है तुम्हारे लिए, क्यूंकि यूँ भी अगर तुमने कुछ लगा भी लिया तो या तो वह तुम्हारी त्वचा पर दिखेगा ही नही या फिर बहुत ही बुरा दिखेगा।


मैं जानती हूँ शायद मेरी भाषा यहाँ बहुत कड़वी लगे। लेकिन यह कुछ लोगों के जीवन कि सच्चाई है ना जाने हम लोग गुण कि जगह रंग को क्यों प्राथमिकता देते हैं।  क्यों हमेशा fair को ही लवली कहते है। क्यों किसी dark को ग्लो एंड लवली नहीं कह पाते। विशेष रूप से तब तक तो बिलकुल  नहीं, जब तक वह इंसान हमसे ऊपर ना हो। अर्थात हम उसके मुंह पर ताना मारने के काबिल ना हो। पर सच्चाई तो यही है कि हम उस समय उस व्यक्ति के मुँह पर कुछ बोल पाए या नहीं, पर सामने वाले व्यक्ति के रंग रूप को देखते ही, हमारे मन में कुछ विचार जरूर आते है। जिसे हम बड़ी आसानी से अपनी मुस्कान के पीछे छिपा जाते है। शायद यह मानवीय व्यवहार है।

मुझे आज भी अच्छे से याद है। मेरा बेटा जब छोटा था तब उसके सभी मित्र एकदम काले इस शब्द का प्रयोग करने के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ, थे। मतलब समझ रहे हैं ना आप ?एफरो अमेरिकन टाइप के बच्चे, तो किसी ने मुझसे पुछा था। इसके सारे दोस्त सब के सब काले ही क्यों हैं? किसी गोरे से इसकी दोस्ती क्यों नहीं है। अब यह भी कोई बात हुई भला ?? दोस्ती भी क्या रंग देख के होती है। वह भी बचपन में जब वो केवल चौथी पाँचवी कक्षा में पढ़ रहा था। अब ऐसी मानसिकता का क्या ही जवाब हो सकता है।


मैं तो सुनकर ही दंग रह गयी थी, किस हद तक लोग colour obsest होते हैं। मुझे तो चिंता इस बात कि होती है कि आजकल यूँ भी लोग जरा जरा सी बात पर अवसाद का शिकार हो जाते है। तो इस तरह कि बातों पर तो निश्चित ही किसी भारी मानसिक तनाव से गुज़रते होंगे। यूँ भी जब बनाने वाले ने किसी में भेद नहीं किया, तो फिर हम और आपको कौन होते हैं किसी को कुछ कहने वाले। किसी से कुछ पूछने वाले। अच्छा तो यही होगा कि हम व्यक्ति को नहीं बल्कि उसके व्यक्तित्व को देखे। ताकि ऐसे बहुत से लोगों में पुनः आत्मविश्वास जगाया जा सके क्यूंकि हर व्यक्ति ख़ास है और व्यक्ति से बड़ा उसका आत्मविश्वास है। जिसे किसी भी कीमत पर कम नहीं होने देना चाहिए। हमारे जीवन का और कुछ नहीं तो कम से कम एक यही लक्ष तो होना चाहिए।